मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 
 

सुबह साड़े चार--पाँच के समय के बीच बाहर निकल पड़ी, आसमान में कालापन फीका सा पड़ गया था, सलेटी रंग एक अजीब सी चमक लिए तारों के ऊपर तना पड़ा था, चाँद अभी दरख्तों के सिर पर ही था, कि बेहद जल्दी में सलेटी चादर सिमटने लगी, आसमान जल्द से जल्द सफेद होने लगा, पूरब की ओर दरख्तों की जड़ों पर से सिन्दूरी आभा गोलाकार में ऊपर की ओर उभरती जा रही थी। कि सारा परिचर अजीब सी चहचहाट से भर गए, तरह तरह की चिड़ियाँ, कबूतर कौए दिल खोल कर सुबह का स्वागत कर रहे थे। मुझे दुख हुआ कि आजतक मैं इस आनन्द से वंचित क्यों रही। सुबह की ताजी हवा फैफड़ों में भर कर लौटी तो साथियों की डाँट का सामना करना पड़ा... सुबह सुबह ओस में खुले सिर निकल गई, तबियत खराब हो जाएगी आदि आदि... मुझे पूरा विश्वास था कि ऐसा कुछ मेरे साथ नहीं होने वाला है.... किन्तु दूसरे दिन ही छाती में कफ जम गया....और मैं बिस्तरे पर थी।

रति सक्सेना
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आर्किड को भी याद नहीं कि
कितनी नाजुकता से
उसने जड़ों के पास की गन्दगी
साफ की थी, और
झुक कर टेड़ी हुई डाल के करीब
हौले से मिट्टी थपथापाई थी

दरख्तों को याद है केवल कलियाँ
और उनका खिलना, फल
और फसल, फिर सर्दी के मौसम में
एक गहरी लम्बी नीन्द

क्रिस्टीना पिकोज
*
मुझे बगीचे में छोड़ दीजिए
कोयल के गीत न सुन पाने की बाबत
रत्ती भर भी चिंतित न
हो जाऊँगा।।
डाल पर लगे फल के वास्ते
उछल- कूद कर थक‍- हार
जमीन पर गिर जाने पर
बच्चों के समान कूल्हों पर लगी मिट्टी
हाथों से

*
हर कोई
इस फिराक में कि
               किसी तरह
हथिया ले
कोई ना कोई खिड़की

अनश्वर है खिड़की
रति सक्सेना

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स्वप्नों की भाँति कविता में भी भविष्य की स्थिति की ओर संकेत होता है और कभी- कभी उससे क्रियात्मक लाभ भी उठाया जा सकता है।
कवि हमेशा अपने ही स्वप्नों का वर्णन नहीं करते हैं वरन् वे सिद्ध योगी की भाँति दूसरे के शरीर में प्रवेश कर उसके स्वप्न देख कर मग्न होते हैं। दूसरे के भावों को अपना बना लेने को फ्रायड ने EMPATHYकहा है। SYMPATHY में सहानुभूति और करुणा होती है, EMPATHY में भाव तादात्म्य कर कवि स्वयं को नायक की स्थिति में रख लेता है।
दार्शनिकों ने अब तक दुनिया की जो व्याख्या की है, उसमें इसी जरूरत को माना गया कि दुनिया को एक खूबसूरत स्वप्न में बदल दिया जाए। कविता उसी की ओर एक कदम है।

राहुल झा

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महिलाओं की छतरी
विस्मयादिबोधक चिन्ह है
तभी तो वह इतनी सुन्दर
और रंगीन है
दोनों छातों के बीच
जिन्दगी तनी हुई है
प्रश्न से विस्मयादिबोधक तक
नारी के लिए नर प्रश्नचिन्ह है
नर के लिए नारी विस्मय का स्रोत
दोनो बहुत अच्छे जोड़े हैं
क्या उनके निर्माता ने
ऐसा ही नियोजन किया था
या वे ऐसे ही बन पड़े हैं?

*

जो लोग मेरे चारों ओर हैं
और जो मेरे निकट हैं
वे मेरी बातों पर
ध्यान नहीं देते।
यदि वे ध्यान दें भी
तो भी समझते नहीं
और यदि वे समझें भी
वे जो समझ लेतें हैं
जो मैंने कहा
ऐसे में
यदि मैं कुछ बताऊँ
तो दूसरे कैसे समझेंगे?

शिवरुद्रप्पा

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कन्हैया तू नहिं मोहि डेरात।
षटरस धरे छोड़ि कत पर घर चोरी करि करि खात।
बकति बकति तोसो पचि हारी नेकहु लाज न आई।
ब्रज परगन सरदार महर, तू ताकी करब नन्हाई।।
पूत सपूत भयो कुल मेरो अब मैं जानी बात।
सूर स्याम अबलौं तोहि बकस्यो तेरी जानी घात।।

*

सुन री ग्वारि कहौं एक बात।।
मेरी सौं याहि जकरि बाँधौगी बहुतै मोहि खिझाई।
साटन्हि मारि करौं पहुनाई चितवन बदन कन्हाई।।
अजहूँ मानु कह्यो सुत मेरो घर- घर तू जनि जाहि।
सूर स्याम कह्यो कबहुँ न जैहौं माता मुख तन चाहि।।

सूरदास


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VOL -  II/ PART -VIII


 (जनवरी-
2007)

संपादक :  रति सक्सेना


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