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केरल में चाहे बरसात का मौसम
बीत जाए, दरख्तों के घने पत्तों पर सुबह-सवेरे एक अजीब सा भीगापन
पसरा रहता है। लेकिन शायद ही कोई होगा जिसे इस भीगेपन में भीगने का
मौका मिले। पूरे प्रान्त से गाँव गायब से हो गए हैं, हर कोई
भागमभाग में, छात्र हैं तो ट्यूशन पर जाने की भागमभाग, नौकरी पेशा
हैं तो नौकरी की। शहरों में तो हर गली सड़क विदेशी पैसों से बनी
इमारतों से अटी पड़ी है। उस दिन कालडी विश्वविद्यालय के प्रांगण में
बनें होस्टल से मैं यूँ ही सुबह साड़े चार--पाँच के समय बाहर
निकल पड़ी, आसमान में कालापन फीका सा पड़ गया था, सलेटी रंग एक अजीब
सी चमक लिए तारों के ऊपर तना पड़ा था, चाँद अभी दरख्तों के सिर पर
ही था, कि बेहदजल्दबाजी में सलेटी चादर सिमटने लगी, आसमान जल्द से
जल्द सफेद होने लगा, पूरब की ओर दरख्तों की जड़ों पर से सिन्दूरी
आभा गोलाकार में ऊपर की ओर उभरती जा रही थी,
कि सारा परिसर अजीब सी
चहचहाट से भर गया, तरह-तरह की चिड़ियाँ, कबूतर, कौए दिल खोल कर सुबह
का स्वागत करने लगे। मुझे दुख हुआ कि आजतक मैं इस आनन्द से वंचित
क्यों रही। सुबह की ताजी हवा फैफड़ों में भर कर लौटी तो साथियों की
डाँट का सामना करना पड़ा... सुबह- सुबह ओस में खुले सिर निकल गई,
तबियत खराब हो जाएगी आदि आदि... मुझे पूरा विश्वास था कि ऐसा कुछ
मेरे साथ नहीं होने वाला है.... किन्तु दूसरे दिन ही छाती में कफ
जम गया....और मैं बिस्तरे पर थी।

मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या था उस खूबसूरती में जो मेरी देह को
हजम नहीं हो पाया, शायद जरूरत से ज्यादा आराम, या फिर कृत्रिमता का
अभ्यास... जिन्दगी को मशीनों के आसपास इस तरह से ढाल लिया कि पूर्ण
प्राकृतिक सौन्दर्य हजम ही नहीं हो पाता है। यही बात मुझे साहित्य
में भी दिखाई दे रही है, जिन्दगी की बात करते- करते हम जिन्दगी से
कितनी दूर आ गए हैं, यह बात समझ से परे होती जा रही है। कविता में
हम पेड़- पौधों से बात करना भूलते जा रहे हैं। इन्ही दिनो मुझे
क्रिस्टीना की कविता पढ़ने का मौका मिला, मुझे लगा कि वे युद्ध जैसी
भयावहता की बात करते हुए भी प्रकृति को नहीं भूलतीं। प्रकृति उनके
जेहन में इस तरह से बैठी है कि वह कठोर वास्तविकता को बाधित नहीं
करती। बिल्कुल ही वैसे ही जैसे कि डा जानस्ज कोर्जाक अनाथ बच्चों
के साथ गाते- गाते गैस चैम्बर में चले गए थे। मौत निश्चित है, क्रूर
भी, उन्होंने समझ लिया था । संगीत उससे बचा नहीं सकता, लेकिन उसके
डर को तो कम कर सकता है.... गाते- गाते मरना, मरते- मरते गाना...काफी
कविताई लगता है, किन्तु असत्य नहीं.... क्या यह समय नहीं कि हम
अपने- अपने गैस चैम्बरों में जरा बहुत सुर लय गति को आने दें...
इस बार की कृत्या डा कोर्जाक के लिए और
उसी चार बजे की अनुपम
प्रकृति के लिए...
इस बार प्रिय कवि के रूप में प्रस्तुत हैं कन्नड़ के प्रमुख कवि एवं
आलोचक शिवरुद्रप्पा, जो अपने आस- पास कि तुच्छ सी दिखने वाली चीजों
को भी नहीं भुला पाते। हमारे अग्रज में हम याद कर रहे हैं कवि
शिरिमणि सूरदास को.. और कविता के बारे में युवा राहुल झा के कुछ
विचार लेकर आएँ हैं। इस अंक के चित्रकार हैं Stefano Oliva, जिनके
चित्रों में प्रकृति अपने आदिम रूप में जीवित है।

नए वर्ष की शुभकामना सहित
रति सक्सेना
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