स्वप्न और कविता

राहुल झा

श्रीमती महादेवी वर्मा ने साहित्य सम्मेलन में कभी कहा था कि कवि को वास्तविक द्रष्टा के साथ स्वप्न द्रष्टा भी होना चाहिए। ‍

अपारे काव्य संसारे कविरेव प्रजापति।
यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते।।
                                                   अग्निपुराण

स्वप्न में भी परिवर्तन होता है। स्वप्न संबन्धी परिवर्तनों को फ्रायड ने CONDENSATION या DISPLACEMENT कहा है। स्वप्न के परिवर्तन प्रायः अस्पष्टता आते हैं और कुछ विकृति भी उत्पन्न करते हैं किन्तु कविता के परिवर्तन स्पषटता और सुष्ठुता का संपादन करते हैं। कवि की रुद्ध और दबी हुई अभिलाषाएँ तथा वासनाएँ निर्झर के स्त्रोत की भाँति फूट पड़तीं हैं और वह अपने अभिलषित संसार का स्वप्न द्रष्टा की भाँती मानसिक प्रत्यक्ष कर लेता है। कविता की पंक्तियाँ कवि के सुख- दुख की वाहिनी बन जाती हैं।

कवि जिस उत्कृष्ट रूप को देखना चाहता है उसी के वह रूपक,  उत्प्रेक्षा आदि अलंकार बना लेता है। उत्प्रेक्षा का अर्थ ही है- उत्कट प्रेक्षण इच्छा। रूपक का भी अर्थ है- रूप का आरोप। स्वप्नों में भी प्रायः रूप का आरोप रहता है।
कवि की कल्पना कभी‍- कभी दिवा स्वप्नों की भाँति असंकल्पित और अनियंन्त्रित रूप से चलती है- "बादल से बंधे आते हैं मंजनू मेरे आगे" ‌और कभी उसमें प्रयास से भी नए चित्र लाने पड़ते हैं। जब कवि की कल्पना अधिक प्रबल हो जाती है और उसका प्रवाह कुछ अनियन्त्रित रूप से चलता है तब उसे फेंटेंसी कहते हैं।
सभी कविताएँ किसी ना किसी रूप में कवि का स्वप्न होती हैं अर्थात् वह वास्तविकता को जिस रूप में देखता है, इस बात की वे परिचायक होती हैं।
स्वप्नों की भाँति कविता में भी भविष्य की स्थिति की ओर संकेत होता है और कभी- कभी उससे क्रियात्मक लाभ भी उठाया जा सकता है।
कवि हमेशा अपने ही स्वप्नों का वर्णन नहीं करते हैं वरन् वे सिद्ध योगी की भाँति दूसरे के शरीर में प्रवेश कर उसके स्वप्न देख कर मग्न होते हैं। दूसरे के भावों को अपना बना लेने को फ्रायड ने EMPATHYकहा है। SYMPATHY में सहानुभूति और करुणा होती है, EMPATHY में भाव तादात्म्य कर कवि स्वयं को नायक की स्थिति में रख लेता है।
दार्शनिकों ने अब तक दुनिया की जो व्याख्या की है, उसमें इसी जरूरत को माना गया कि दुनिया को एक खूबसूरत स्वप्न में बदल दिया जाए। कविता उसी की ओर एक कदम है।

 


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