क्रिस्टीना पिकोज की कविता

घर वापिसी*

1

जमीन भूल गई उसे,
बच्चा ही तो था वह
जब घर छोड़ कर गया, सेब का दरख्त
जिसे लगवाने में उसने मदद की थी
फलने को तैयार है, फिर से
करीब साठ फसलों के बाद,
उसके जाने के बाद की

आर्किड को भी याद नहीं कि
कितनी नाजुकता से
उसने जड़ों के पास की गन्दगी
साफ की थी, और
झुक कर टेड़ी हुई डाल के करीब
हौले से मिट्टी थपथापाई थी

दरख्तों को याद है केवल कलियाँ
और उनका खिलना, फल
और फसल, फिर सर्दी के मौसम में
एक गहरी लम्बी नीन्द

केवल उसे ही याद है उसकी
वह जो सबसे बूढ़ी है, बहुत कम बताती है
उसके काम से भरे लम्बे दिन
काम, काम

सेब झड़ कर सड़ रहे हैं,
काम बढ़ गया है, चुनना और पकाना
आधे दिन तक आग सुलगाना,
फिर असन्तुष्ट नीन्द।

2

सूरज पार चला गया
खेतों और आलुओं ने
सफेद माँसपेशियों को ढीला छोड़ दिया
गीले खेतों में।

3

मेरे पिता एक दूसरी जिन्दगी को याद करते हैं
एक जो तन्दूर में जला दी गई
एक जो जमीन में दफना दी गई

कौन शोक मनाता है यहूदियों के लिए?
भुला दिए गए लोग, विदेशी
जो ईसा को नहीं पूजते
लेकिन इंतजार करते रहे उसका
जब तक वे खुद ही मिट गए

मेरे पिता भी इंतजार करते हैं
सोचते हैं कि, काश वे भी यहीं रहते
और मर सकते उनके साथ
वे जो दूकानदार,
लाल सिर वालीं औरतें
और बच्चे,  बतखें और बकरियाँ चराने वाले।

* पोलेण्ड में

( क्रिस्टीना पिकोज की अन्य कविता )


अनिल जनविजय की कविताएँ

**
पहुँच अचानक उसने मेरे घर पर
लाड़ भरे स्वर में कहा ठहर कर

‘‘अरे...सब कुछ पहले जैसा है
सब वैसा का वैसा है...
पहले की तरह...’’

फिर शान्त नज्ञर से उसने मुझे घूरा
लेकिन कहीं कुछ रह गया अधूरा

उदास नज्ञर से मैंने उसे ताका
फिर उसकी आँखों में झाँका

मुस्काई वह, फिर चहकी चिड़िया-सी
हँसी ज्ञोर से किसी बहकी गुड़िया-सी

चूमा उसने मुझे, फिर सिर को दिया ख़म
बरसों के बाद इस तरह मिले हम
पहले की तरह

( अनिल जनविजय की अन्य कविताएँ)


शहरयार की गजल

शंख बजने की घड़ी

आँख मन्दिर के कलश पर रखो
शंख बजने की घड़ी आ पहुँची
देवदासी के कदम रुक- रुक कर
आगे बढ़ते हैं
जमीं के नीचे
गाय को सींग बदलने की बड़ी जल्दी है
बुलहवस आखों ने फिर जाल बुना
खून टपकाती जबाँ फिर से हुई मसरुफे-सफर
साधना भंग ना हो अब के भी
जोर से चीख के श्लोक
पुजारी ने पढ़े
आँख मन्दिर के कलश पर रक्खो

( शहरयार की अन्य गजलें )


सविता सिंह की कविता

रात का दरवाजा

कितनी अपनी है अब भी रात
सुनती है किस धीरज से रुदन विलाप
रहस्य की तरह बचा उल्लास
किस तरह छिपाये रखती है
कौतुहल उस स्वप्न के आगमन का
जिसे पाने के बाद वह सदा के लिए बदल जायेगी

अब भी कितनी अपनी
बचाये हुए उस नीले दरवाजे को
जिससे अनन्त निकला जा सकता है यातनाओं के पार

( सविता सिंह  की अन्य  कविताएँ)


वंशी महेश्वरी की कविता

उद्भव

जीवन उद्गम में
जीवन के बाहर होने का
संदेह छिपा है

मृत्यु
संशय के बाहर हो कर
अपनी अथाह शान्ति के
पवित्र आलोक मे
प्रकाशित होती है
संपूर्ण।
जीवन उद्गम में
जीवन के बाहर होने का
संदेह छिपा है

( वंशी महेश्वरी की अन्य कविताएँ ))

ss="MsoNormal" style="text-autospace: none">


मलय की कविताएँ

लिखने का नक्षत्र

जब सूरज लिखने के
नक्षत्र पर होता है
लू भी नहीं जलाती
और धूप
हमारी इन्द्रियों तक
उतर आती है

हवा थोड़ी सी
गरम होती सी
हमारी कान कुंडलियों के ओंठों पर
अपनी सीटी बिना बजाए
बैठी रहती है सन्नाई

अन्दर मथते समुद्र तल से
हिलोर रेखाओं में ढलकर
आवाजें आती हैं
जिनमें कोई पहाड़ सा निकलता शंख
गूंजों की भाषा में
खुलने लगता है-धीरे-धीरे
पत्थर की तरह भारी
बैचेन घबराहट
गरजते बादलों की चुप में
बदल जाती है
इन्हीं धड़कते धक्कों में से
खिड़कियाँ कई खुलतीं हैं
जागती दुनिया का सामना
एक बड़े
आइने की तरह होता है
मध्यान्तर का सूरज
हमारी छाती पर से होता हुआ
साँसों के हिसाब में से

समय को तपाकर
छान लेता है

धूप को सौंपता
गायब सा रह कर
हममे से हो होकर
उम्र तक उगा रहता है
लिखने के नक्षत्र पर से
आगे होकर

निकलता
हम में से हो होकर।

( मलय की अन्य कविताएँ )
 


शिखामणि की तेलुगु कविता
अनुवादः डा विजयराघव रेड्डी

घुंघरूवाली छड़ी


मुझे
समुद्र के किनारे
छोड़ दीजिए
मोती ना मिलने की बाबत दुखी नहीं हूँगा

रेत में
घरौंदा बना कर
एक महान साम्राज्य का निर्माण कर लूँगा।।
लहरों के पदचिन्हों की जाँच करते हुए
एक कानी कौड़ी छाँट कर
खुशी से फूल जाऊँगा।।

मुझे बगीचे में छोड़ दीजिए
कोयल के गीत न सुन पाने की बाबत
रत्ती भर भी चिंतित न
हो जाऊँगा।।
डाल पर लगे फल के वास्ते
उछल- कूद कर थक‍- हार
जमीन पर गिर जाने पर
बच्चों के समान कूल्हों पर लगी मिट्टी
हाथों से झाड़ लूँगा।।

मुझे
पतंगे की तरह, या
तितली की तरह
हवा में छोड़ दीजिए
फूल के ना होने या फिर
इन्द्रधनुष के न होने पर भी
अपमानित नहीं होऊँगा।
हवा भाषा की व्याकरण रचना कर
बारीश के बारे में
राज की बातें आप के कान में फूँक दूँगा।।

या फिर मुझे
एक अनाथ लड़के की मानिंन्द
भीड़-भाड़ के
चौरास्ते पर छोड़ दीजिए
पनाह देने वाले के अभाव में
अफसोस महसूस न करूँगा।।
आँख के अन्धे के हाथ की
घुँघरूवाली छड़ी बन
रास्ते को पार करा दूँगा।।

शिखामणि और डा विजयराघव रेड्डी का परिचय  )


रति सक्सेना की कविता

एक खिड़की - चार सलाखें

(रेल की खिड़की से)

1-

भाग रही है खिड़की
      छोड़ती नारियल के बगीचें,
           नमकीन झीलें, जंगल
                 और
           शहरी गन्दगियाँ
चार सलाखे क्या कम हुई
       जिन्दगी की गति बढ़ गई

2-

खुले मैदान में
      चरती हुई गायें
टहलती बतखें
      उंघता कुत्ता
और एक लकीर
      धुँए की

कोई गाँव आ गया
        लगता है

3-

रुक गई खिड़की
       भर गई उमस
            रेल के डिब्बे में
हवा को पसन्द है
       चलना और चलने वाले

4-

हर कोई
      इस फिराक में कि
               किसी तरह
हथिया ले
कोई ना कोई खिड़की

अनश्वर है खिड़की
       नश्वर यात्रा में

( अगले पृष्ठ में जारी )


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ