वीरेन डंगवाल की कविताएँ


वीरेन डंगवाल पत्रकार, साहित्यकार हैं। आपका पहला कविता संग्रह " इसी दुनिया में" 1991 में प्रकाशित हुआ जिसे रघुवीर सहाय स्मृति एवं श्रीकान्त वर्मा स्मृति पुरस्कार मिला। प्रस्तुत कविताएँ आपके दूसरे काव्य संग्रह दुष्चक्र में सृष्टा नामक पुस्तक से ली गईं हैं। इन कविताओं में एक ऐसी बैचेनी है जिसका सामान्य सी घटनाओं से सरोकार लगता है, जो छोटी-छोटी होते हुए भी महान सी लगती हैं।

चूना

जहाँ भी पड़ा वहीं खिल गया चूना
रोनी दीवार पर आहा क्या जगर मगर कीन्हा।
हल्दी के संग लगा चोट पर
दे दिया मलहम का काम
कहीं पड़ा अकड़ पान सुर्ती में तो
फाड़ डाला सब जीभ-गाल का चाम
बना सगुन ब्याह - सादी में
नाली तक के गुन गाये
भोले डिजाइनों में भोली आत्माओं के करतब दिखलाए
चमकाया

अंधकार रह न गया सूना!

बाँदा

मैं रात, मैं चाँद, मैं मोटे काँच
का गिलास
मैं लहर खुद पर टूटती हुई
मैं नवाब का तालाब उम्र तीन सौ साल।

मैं नीन्द, मैं अनिद्रा, कुत्ते के रुदन में
फैलता अपना अकेलापन
मैं चाँदनी में चुपचाप रोती एक
बूढ़ी ठठरी भैंस
मैं इस रेस्टहाउस के खाली
पुरानेपन की बात।
मैं खपड़ैल, मैं खपड़ैल।
मै जामा मस्जिद की शाही संगमरमर मीनार
मैं केदार, मैं केदार, मैं कम बूढ़ा कैदार

नीन्दे

नीन्द की छतरियाँ
कई रंगों और नाप की हैं।
मुझे तो वह नीन्द सबसे पसन्द है
जो एक अजीब हल्के गरु उतार में
धप से उतरती है
पेड़ से सूखकर गिरते आकस्मिक नारियल की तरह
एक निर्जन में।
या फिर वह नीन्द
जो गिलहरी की तरह छोटी चंचल और फुर्तीली है।
या फिर वह
जो कनटोप की तरह फिट हो जाती है
पूरे सर में।

एक और नीन्द है
कहीं समुद्री हवाओं के आर्द्र परदे में
पालदार नाव का मस्तूल थामे
इधर को दौड़ी चली आती
इकलौती
मस्त अधेड़ मछेरिन।

 


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