शीला गुजराल की कविताएँ


शीला गुजराल की कविताएँ सामान्य को चित्रात्मयता से जोड़ती हुई सहज व सरलता भाव मय संसार की ओर ले चलती हैं। प्रस्तुत कविताएँ धरती का आर्त्तनाद नामक पुस्तक से ली गईं हैं।

मानसरोवर

"लिपू लेक" झील पार करते
मेरे मन का सारा बोझ
मोम बन कर पिघल गया!
बन्धन मुक्त मैं सुगमता से
टेढ़े-मेढ़े पहाड़ी पथ पर चलती
पहुँची अनुपम स्थान
कैसा अद्भुत चमत्कार
दिव्य आभा में विलीन हुआ
विशुद्ध तन-मन

अमलतास

झर झर गिरती
अमलतास की आँसू की लड़ियाँ
सुनहरी झील में उमड़ आईं
ऐसा प्रतीत हुआ
मानों भानुदेव मौज में आ
अपनी समस्त कंचन निधि
धरती को लुटा रहे हों

अत्याचार

प्रेमी स्रोत से प्रेमालाप करतीं
झुकी टहनियों पर
लकड़हारे का क्रूर प्रहार

भ्रूण हत्या

उन्मादित हवा
गर्भवती शाखाओं को चूमने
ऐसी उमड़ी
कि नन्हीं कलियों का अवशेष
तक ना बचा!
सूनी कोख माताएँ
मलिन मुख खड़ीं हैं।


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