इस
बार कुछ ऐसा हुआ
धूप ने छलांग लगा दी कुँए में
अँधेरा मुँह ढाँप सोता रहा
आजान ने गुँजा दिया आसमान
लेकिन उजाले का मुँह तक ना खुला
इस बार कुछ ऐसा हुआ
उसने धीमे से खोला दरवाजा
गुम हो गई पदचाप
सिलें होंठों से आँसू ना टपके
कोई शब्द ना गिरे आँखों से
इस बार कुछ ऐसा हुआ
सफर खो गया बीच रास्ते में
तुम हो, तुम ना हो
इसी दुविधा में भुला बैठी कि
क्या भूलना है, ऐसा क्यों हुआ?
दुस्वप्न का जन्मान्तर
एक स्वप्न से
छुटकारा पाने को
इंतजार किया
सुखद स्वप्न का
एक स्वप्न से
दूसरे की यात्रा ही
क्या जन्मान्तर है?
उसका खत
उसने खत लिखा
फिर पता
पते के नीचे खींची लकीर
वहाँ से यहाँ तक
बन गया एक रास्ता

उसने बन्द किया लिफाफा
बन्द हो गई उड़ान
आसमान में चक्कर काटने वाली
लिफाफा आया
साथ आई छुअन
ढेर सारी यादों से घिरी |