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त्रिलोचन की कविताएँ
सरलता, सहजता एवं जिन्दगी से जुड़ाव त्रिलोचन की कविताओं के
त्रिलोचन हैं जो उन्हें पठन और पाठ के बीच आत्मीयता स्थापित करते
हैं। कविता शब्द नहीं, मात्र भाव भी नही
जीवन की समग्रता होती है। त्रिलोचन जी की कविताएँ इस बात का समर्थन
करती हैं। जैसा कि वे स्वयं कहते हैं कि --
अब मैं लिखा करता हूँ
अपने अन्तर की अनुभूति बिना रँगे चुने
कागज पर बस उतार देता हूँ ।
कृत्या के इस अंक में हम हिन्दी के वरिष्ठ कवि त्रिलोचन जी को
प्रिय कवि के रूप में प्रस्तुत करते हुए प्रसन्नता अनुभव
कर रहे हैं।
ललक
(कालीदास से साभार)
हाथ मैंने
उँचाए हैं
उन फलों के लिए
जिनकों
बड़े हाथों की प्रतीक्षा है
फलों को
मैं देखता हूँ
जानता हूँ
चीन्हता हूँ
और
उनके लिए
मुझे ललक भी है।

हाथ मैंने
उँचाए हैं
उन फलों के लिए
जिनको
बड़े हाथों की प्रतीक्षा है
डर नहीं है
हँसा जाऊँगा!
1978
तुम्हें जब मैंने देखा
पहले पहल तुम्हें जब मैंने देखा
सोचा था
इससे पहले ही
सबसे पहले
क्यों न तुम्हीं को देखा
अब तक
दृष्टि खोजती क्या थी
कौन रूप क्या रंग
देखने को उड़ती थी
ज्योति-पंख पर
तुम्ही बताओ
मेरे सुन्दर
अहे चराचर सुन्दर की सीमा रेखा
1953
तुम्हें सौंपता हूँ
फूल मेरे जीवन में आ रहे हैं
सौरभ से दसों दिशाएँ
भरी हुई है
मेरा जी विह्वल है
मैं किससे क्या कहूँ

आओ
अच्छे आए समीर
जरा ठहरो
फूल जो पसन्द हों, उतार लो
शाखाएँ, टहनियाँ
हिलाओ, झकझोरो,
जिन्हें गिरना हो गिर जाये
जायँ जायँ
पत्र-पुष्प जितने भी चाहो
अभी ले जाओ
जिसे चाहो, उसे दो
लो
जो भी चाहो लो
जिसे चाहो, उसे दो
लो
जो भी चाहो लो
एक अनुरोध मेरा मान लो
सुरभि हमारी यह
हमें बड़ी प्यारी है
इसको सँभालकर जहाँ जाना
ले जाना
इसे तुम्हें सौंपता हूँ
1959
आत्मालोचन
शब्द
मालूम है
व्यर्थ नहीं जाते हैं
पहले मैं सोचता था
उत्तर यदि नहीं मिले
तो फिर क्या लिखा जाए
किन्तु मेरे अन्तर निवासी ने मुझसे कहा-
लिखा कर

तेरा आत्मविश्लेषण क्या जाने कभी तुझे
एक साथ सत्य शिव सुन्दर को दिखा जाए
अब मैं लिखा करता हूँ
अपने अन्तर की अनुभूति बिना रँगे चुने
कागज पर बस उतार देता हूँ ।
1982
विपर्याय
मैं ने कब कहा था
कविता की साँस मेरी साँस है
जानता हूँ मेरी साँस टूटेगी
और यह दुनिया
जिसे दिन- रात चाहता हूँ
एक दिन छूटेगी
मैं ने कब कहा था
कविता की चाल मेरी चाल है
जानता हूँ मेरी चाल रुकेगी
और यह राह
जिसे दिन-रात जानता हूँ
और और भड़केगी।
1963
अगर चाँद मर जाता
अगर चाँद मर जाता
झर जाते तारे सब
क्या करते कविगण तब?
खोजते सौन्दर्य नया?
देखते क्या दुनिया को?
रहते क्या, रहते हैं
जैसे मनुष्य सब?
क्या करते कविगण तब?
प्रेमियों का नया मान
उनका तन-मन होता
अथवा टकराते रहते वे सदा
चाँद से, तारों से, चातक से, चकोर से
कमल से, सागर से, सरिता से
सबसे

क्या करते कविगण तब?
आँसुओं में बूड़-बूड़
साँसों में उड़-उड़कर
मनमानी कर- धर के
क्या करते कविगण तब
अगर चाँद मर जाता
झर जाते तारे सब
क्या करते कविगण तब?
१९४२
समुद्र किनारे
आज हम समुदर के किनारे हैं
जीवन का ज्वार यहाँ
आता है तो आता हैं
क्या क्या साथ लाता है
शंख, सीप, घोंघे
जलचर जीव
और भी बहुत कुछ
जीवन का ज्वार यहाँ
आता है तो आता है
हरियाली और बढ़ आती है
उदासी उड़ जाती है
लजाती हुई वेला
चादर को जरा और खींच लेती है
ज्वार
फिर ज्वार
फिर ज्वार
ज्वार ज्वार ज्वार
अट्टहास फेनिल तंरगो का
लगातार
थोड़ी देर बाद

सभी लहरें
एक- एक
वहीं लौट जाएँगी
जहाँ से बढ़ आई हैं
फिर
भीगी वेला रह जाएगी
समीर यहाँ आएगा
समुद्र की कहानी कह
आगे बढ़ जाएगा
1981
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