मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 
 

इस बार पुनः अजेय के खत से ही मैं अपनी बात शुरु करना चाह रही हूँ, यह खत अजेय ने किसी नामी पत्रिका के वरिष्ठ सम्पादक के नाम लिखा है और उसकी प्रति कृत्या को भेजी , इसलिए कि अजेय की बात में कृत्या की भूमिका है। खत में आक्रोश है, किसी व्यक्ति के प्रति नहीं , व्यक्तिवाद के प्रति, और उस अनदिखे तन्त्र के बारे में जो सोच को बहुगामी ना बनाते हुए लकीर का फकीर है। सवाल है पुनर्पाठ का, किन्तु किसका पुनर्पाठ? विषय चुनने के पारे में भी लोग यदि पक्षपात करें तो क्या किया जाए? अजेय का दर्द उन कवियों की उपेक्षा के प्रति है, जिन्हें हिन्दी साहित्य जाने अनजाने नकारता रहा है, ये अधिकतर कवि तथाकथित भद्र कवियों की क्षेणियों में नहीं आते हैं। उन्होंने प्रकृति के साथ रहते हुए प्राकृतिक जीवन जीया, और हर बन्धन को नकारा, किन्तु सामज के सामने आत्मालोचना का इतना सामान रख गए कि समाज उन्हें स्वीकारने में बाध्य रहा। ललद्यत, मिलारेपा, अक्का आदि का नाम इस क्षेणी में लिया जाता है। किन्तु दुर्भाग्य वश हिन्दी साहित्यिक समाज इन्हें नकारता रहा। रति सक्सेना
और »

 

 

तेरा हाथ मिरे काँधे पे दर्या बहता जाता है
कितनी खामोशी से दुख का मौसम गुजरा जाता है।

नीम पे अटके चाँद की पलकें शबनम से भर जाती हैं,
सूने घर में रात गये जब कोई आता-जाता है।

पहले ईँट, फिर दरवाजे, अब के छत की बारी है
याद नगर में एक महल था, वो भी गिरता जाता है।

बशीर,बद्र
*
ये सेब के पेड़ कितने अजनबी हैं मेरे लिए
हमेशा रहा सेब से रिश्ता मेराले से
आज ये पेड़ बिल्कुल मेरे पास
हाथ बढ़ाऊँ और तोड़ लूँ
लेकिन इन्हें तोड़ूँगा नहीं
फिर इन सूने पेड़ों को
खूबसूरत कौन कहेगा?

नरेश अग्रवाल
*
बचपन में
मुझे युवा बनने की अदम्य इच्छा थी
पर आज
किसने किसको भुला दिया?
किसको क्या नष्ट हुआ?
क्या मेरा बचपन खो गया है?
या बचपन को मैं नष्ट हो गया हूँ?
--आर एस भास्कर
और »

 

इंटरनेट पर www.kritya.in ललदेई, अक्का महादेवी के साथ साथ मिला रेपा पर भी सामग्री आई, पर लगता है कि साहित्यकारों का इस ओर ध्यान गया ही नहीं है। क्यों कि हमारे यहाँ तिब्बत के साथ साथ बौद्धिक परंपरा को भी विदेशी मान लिया गया है। भीतरी हिमालय और ट्रांस हिमालयी पठारों में वज्रयानी बौद्ध परम्परा में भी ऐसे कवि हुए हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं में अपने विद्रोही तेवर मुखर किए हैं। भूटान के "डुग्गाकनलेग"जो कि पागल भिक्षु के नाम से जाने जाते है, इस पर्परा के कुख्यात संत हुए हैं। इनकी अलग अलग दो आत्मकथाएँ उपलब्ध हैं। एक में सदकर्मों का वर्णन है तो दूसरे में असद कर्मों का। कहा जाता है कि उन्होंने समाज कि किसी भी टेबू को स्वीकार नहीं किया, उनकी कविताओं में अश्लीलता सीमाओं को लाँघ गई है। यह सब उनके जीवन के अनुभव भी रहे हैं।

अजेय

..और »  
 

पहले पहल तुम्हें जब मैंने देखा
सोचा था
इससे पहले ही
सबसे पहले
क्यों न तुम्हीं को देखा

अब तक
दृष्टि खोजती क्या थी
कौन रूप क्या रंग
देखने को उड़ती थी
ज्योति‍-पंख पर
तुम्ही बताओ
मेरे सुन्दर
अहे चराचर सुन्दर की सीमा रेखा

*

लो
जो भी चाहो लो
जिसे चाहो, उसे दो

लो
जो भी चाहो लो

एक अनुरोध मेरा मान लो
सुरभि हमारी यह
हमें बड़ी प्यारी है
इसको सँभालकर जहाँ जाना
ले जाना

इसे तुम्हें सौंपता हूँ
 

त्रिलोचन

और »  

 

छाँड़ो मेरे ललन! ललित लरकाई!
ऐहों सुन! देखुवार कालि तेरे,
बबै ब्याह की बात चलाई।।१।।
डरिहौं सास ससुर चोरि सुनि,
हँसिहौं नइ दुलहिया सुहाई।
उबटौ न्हाहु, गुहौं चुटिया बलि,
देखि भलो बर करिंहि बड़ाई।।२।।
मातु कह्यो, करि कहत बोलि है
"भई बड़ि बार, कालि तौ न आई।
"जब सोइबो तात यों हाँ कहि
नयन मींचि रहे पौढ़ि कन्हाई।।३।।
उठि कह्यो, भोर भयो, झंगुलि दै
मुदित महरि लखि आतुरताई
बिहँसी ग्वालिजानि तुलसी प्रभु
सकुची लगे जननी उर धाई।।४।।

तुलसी दास
और »

VOL -  II/ PART -X


 (मार्च-
2007)

संपादक :  रति सक्सेना


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए