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इस बार पुनः
मैं अपनी बात अजेय के खत से शुरु करना चाह रही हूँ, यह खत अजेय ने किसी नामी
पत्रिका के वरिष्ठ सम्पादक के नाम लिखा है और उसकी प्रति कृत्या को
भेजी, इसलिए कि अजेय की बात में कृत्या की भूमिका है। खत में
आक्रोश है, किसी व्यक्ति के प्रति नहीं, व्यक्तिवाद के प्रति, और
उस अनदिखे तन्त्र के बारे में जो सोच को बहुगामी ना बनाते हुए लकीर
का फकीर है। सवाल है पुनर्पाठ का, किन्तु किसका पुनर्पाठ? विषय
चुनने के बारे में भी लोग यदि पक्षपात करें तो क्या किया जाए? अजेय
का दर्द उन कवियों की उपेक्षा के प्रति है, जिन्हें हिन्दी साहित्य
जाने अनजाने नकारता रहा है, ये अधिकतर कवि तथाकथित भद्र कवियों की
क्षेणियों में नहीं आते हैं। उन्होंने प्रकृति के साथ रहते हुए
प्राकृतिक जीवन जीया, और हर बन्धन को नकारा, किन्तु समाज के सामने
आत्मालोचना का इतना सामान रख गए कि वह उन्हें स्वीकारने में
बाध्य रहा। ललद्यत, मिलारेपा, अक्का आदि का नाम इस क्षेणी में लिया
जाता है। किन्तु दुर्भाग्य वश हिन्दी साहित्यिक समाज इन्हें नकारता
रहा।
मुझे याद है कि जब हमने ललद्यत को कृत्या में प्रस्तुत किया था तो
एक पत्रकार ने मुझे पत्र लिखा कि ललद्यत को पढ़ कर लगा कि क्यों
समझ में आया कि क्यों इन्दिरा गाँधी ने अपना प्रिय कवि माना था। इसी तरह अक्का
महादेव को प्रस्तुत करने पर एक पाठक ने लिखा था कि शुक्र है कृत्या
ने अक्का की कविताएँ दी, नहीं तो हिन्दी वाले तो उनके बारे में
जानते ही नहीं। इसी तरह जब अजेय ने मिलारेपा की कविताएँ भेजी तो
मैंने नेट पर मिलारेपा के बारे में सामग्री देखने की कोशिश की, मै
दंग रह गई जब मैंने पाया की अंग्रेजी
में मिला रेपा के बारे मे बहुल सामग्री थी, जबकि हिन्दी पत्रिकाओं
में कभी कुछ पढ़ने को नहीं मिला। यानी कि
हिन्दी साहित्य में किसे हाशिये पर फैंका जाए, किसे प्रसिद्धी दी
जाए यह बात गुणवत्ता पर नहीं बल्कि पूर्वाग्रह से जकड़ी मानसिकता पर
निर्भर करता है।

हम यदि इस बात को भूल भी जाए, तो भी अजेय के सुझाव पर तो विचार करना ही
चाहिए कि हिन्दी साहित्य को निरपेक्ष पुनर्पाठ की जरूरत है, विशेष रूप से उन कवियों
का जिन्हे हाशिये पर डाल दिया गया है, चाहे वे समकालीन हैं या
प्राचीन। अजेय के खत को पाठको के सामने प्रस्तुत किया हैं- कविता
के बारे में नामक खण्ड में। मुझे आशा है कि यह बहस आगे बढ़ेगी।
अंग्रेजी खण्ड में भी हम तुलसी दास की कृष्ण भक्ति को लेकर आए हैं,
जिसे केरल की डा. पूर्णिमा ने शोध का विषय बनाया है। प्रिय कवि के
रूप त्रिलोचन है। समकालीन कविता में कई नए कवि हमारे साथ जुड़े हैं।
कृत्या का अँज्रेजी अंक इतालवी कविता विशेषांक है, इस अंक के
प्रमुख चित्र प्रसिद्ध इतालवी पेन्टिंग्स है, लेकिन अन्य पृष्ठ
चित्रो के कलाकार अमित कल्ला हैं जिनके चित्र कृत्या में पहले भी आ
चुके हैं। भारतीयता का इतालवी सम्मिश्रण कृत्या को अलग रूप देगा,
इस में कोई संशय नहीं है।
इस संक्षिप्त मास में कृत्या की कुछ अल्प सामग्री पाठकों को बाँधे
रखेगी, इसी आशा के साथ....
रति सक्सेना
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कृत्या-- लक्ष्य और सपने
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