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अजेय
का खत--
--विद्रोह की कविता के नाम
आज कवि की दूसरी नोटबुक पढ़ी। अराजक कविता का पुनर्पाठ? महत्वपूर्ण
बात यह है कि गैर हिन्दी भक्त कवियों की विद्रोह भावना को रेखांकित
किया गया।
यहीं नहीं उनके पुनर्पाठ की जरूरत की बात भी की।
www.kritya.in पर रति
सक्सेना व अग्निशेखर ने "ललद्यत" पर प्रचुर मात्रा में सामग्री
उपलब्ध करवाई है। मेरी जानकारी में
अक्का और ललद्यत जैसे अनजान कवि हिन्दी में पहली बार कृत्या में ही
मिलते हैं। मैं कहना चाह रहा था कि अभी तक तो हिन्दी पाठक द्वारा
प्रथम पाठ हुआ ही नहीं, तो पुनर्पाठ कैसे। मैंने मिलारेपा के गीतों
के अनुवाद किए हैं, मुझे लगता है कि हिन्दी के पाठकों को इस तरह
के साहित्य की सख्त जरूरत है। आजकल हिन्दी की बात करते वक्त किसी
विदेशी साहित्यकार को कोट करना हिन्दी का स्वभाव बन गया है, आंचलिक
साहित्यकारों और साहित्य को सिरे से खारिज कर दिया जाता है। मानो
भारत में हिन्दी के अलावा किसी अन्य भाषा में महत्वपूर्ण साहित्य
लिखा ही नहीं गया हो। हम तो इतना तक सोच लेते हैं कि हिन्दी के
अलावा और किसी भाषा में श्रेष्ठ साहित्य लिखा ही नही गया है। दरअसल
हिन्दी वाले हिन्दी को केन्द्र में रख कर ही सोचते है, उससे बाहर
जाते तक नहीं हैं, "हमारी प्यारी हिन्दी पट्टी"...
इंटरनेट पर
www.kritya.in ललदेई, अक्का
महादेवी के साथ साथ मिला रेपा पर भी साम ग्री आई, पर लगता है कि
साहित्यकारों का इस ओर ध्यान गया ही नहीं है। क्यों कि हमारे यहाँ
तिब्बत के साथ- साथ बौद्धिक परंपरा को भी विदेशी मान लिया गया है।
भीतरी हिमालय और ट्रांस हिमालयी पठारों में वज्रयानी बौद्ध परम्परा
में भी ऐसे कवि हुए हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं में अपने विद्रोही
तेवर मुखर किए हैं। भूटान के "डुग्गाकनलेग"जो कि पागल भिक्षु के
नाम से जाने जाते है, इस परंपरा के कुख्यात संत हुए हैं। इनकी अलग-
अलग दो आत्मकथाएँ उपलब्ध हैं। एक में सद्कर्मों का वर्णन है तो
दूसरे में असद कर्मों का। कहा जाता है कि उन्होंने समाज कि किसी भी
टेबू को स्वीकार नहीं किया, उनकी कविताओं में अश्लीलता सीमाओं को
लाँघ गई है। यह सब उनके जीवन के अनुभव भी रहे हैं।
12 वीं सदी में तिब्बती संत कवि
मिलारेपा इन अराजक कवियों के प्रतिनिधि माने जाते हैं। इस घुमक्कड़
बौद्ध साधक ने हिमालय के दोनो ओंर भ्रमण करते हुए एक
लाख से अधिक गीत
गाये। प्रायः निर्वस्त्र रहने वाले इस योगी ने सांसारिकता को नकारा, साथ ही भौतिकता का निषेध भी किया। धनिको, धर्मग्रन्थों, मठों
मन्दिरों को लताड़ लगाई। यूरोपीय यात्रियों ने बीसवी सदी के आरंभ मे
ही हिमालय का कोना- कोना खंगाल कर इन गीतों को खोज निकाला जिन्हें
घुमन्तु भिखारी गाया करते थे। अंग्रेजी में इन गीतों के चार संकलन
प्रकाशित हो चुके हैं किन्तु हिन्दी के पाठक प्रायः अपरिचित हैं।
मैं इस बात से सहमत हूँ कि वैष्णव कविता में वह वह प्रखरता देखने
को नहीं मिलती जो शैव परम्परा में मिलती है। मैं तौ इससे आगे बढ़ कर
तांत्निक परम्परा की बात करूंगा जो बौद्ध सम्प्रदाय में भी देखने को
मिलती है। वस्तुतः हिन्दी प्रदेश वैष्णव भक्ति रस से ओतप्रोत रहा
है। इस परंपरा में मनुष्य की नैसर्गिक विद्रोह चेतना को मर्यादा और
नैतिकता के उपकरणों से कुन्द कर दिया गया है। बहुत भीतर, प्रकट
होने के साथ- सा चिन्हों को दमित कर दिया गया है। अतः हिन्दी के
क्षेत्र में अपने खोल से बाहर झाँक कर सच को जानने, समझने, देखने
तथा सामना करने का माद्दा बहुत कम है। कबीर और मीरा जैसे अपवाद हुए
हैं लेकिन क्या वे भी सामाजिक संस्कारों और रूढ़ियों से निजात पा
सके? कबीर अपने राम को निर्गुण निर्गुण कह कर पुकारते रहे, लेकिन
आजीवन नारी की संगति से आतंकित रहे। मीरा विरह में गिरधर को
पुकारती तो रहीं किन्तु अक्का और ललद्यत की तरह विद्रोह नहीं कर
सकीं।

इसी तरह समूची हिन्दी काव्यधारा ने हमे ऐसी भावभूमि दी है जो
निक्रीयता एवं स्वीकार की मनोवृत्ति उपजाती है। ऊपर से हम पड़ोंस
में झाँकने से कतराते हैं कि और जगह क्या हो रहा है। तांत्रिक
परंपरा की विद्रोह भावना भौगोलिक या सामाजिक नहीं है, बल्कि
आध्यात्मिक व दार्शनिक के साथ- साथ राजनैतिक घटकों से भी प्रभावित
है। नहीं तो शून्य से चालीस डिग्री कम तापमान में भी निर्वस्त्र
रहने का क्या तात्पर्य हो सकता है। हमारे तथाकथित प्रगतिशील
साहित्यकार उधर झाँकना भी पसन्द नहीं करते, यही नहीं वे नाथों,
सिद्धों, शैवों,बोद्धौं, शाक्तों को असभ्य, बर्बर, अंधविश्वासी
अतिवादी, वाममार्गी ना जाने क्या- क्या मानते हैं। मैं तो यही जानता
हुँ कि हिन्दी को आगे जाने के लिए इन परम्पराओं का भी पुनर्पाठ
करना चाहिए।
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