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तुलसी
दास की कृष्ण भक्ति
डा पूर्णिमा आर.
गोस्वामी तुलसी दास की राम भक्ति से तो सभी परिचित हैं, किन्तु
उनकी कृष्ण भक्ति को बहुत कम लोग जानते हैं। तुलसी दास की कृष्ण
भक्ति के सन्दर्भ में एक कथा प्रचलित है..कि एक बार
तुलसीदास नाभादास से मिलने वृन्दावन चले गए, वहाँ उन्होंने गोपाल
मन्दिर में जाकर राम से मिलवाने की प्रार्थना की। भागवान ने उन्हें
राम का रूप धर कर दर्शन दे दिए। हो सकता है इसी घटना से प्रभावित
होकर उन्होंने कृष्ण भक्ति को भी अपना लिया होगा। कृष्णभक्ति में
श्रीकृष्ण का लोकरंजन रूप प्रचलित है, किन्तु तुलसी दास ने उन्हें
लोकरक्षक एवं भक्तवत्सल के रूप में देखा है।
तुलसीदास जी राम के बालकाल्य को अधिक रेखांकित नहीं किया है, इसलिए
कृष्णगीतावली में उन्होंने कृष्ण के बाल्यकाल वर्णित किया है। यही
नहीं उनके राम वहाँ एक आदर्श बालक हैं किन्तु कृष्ण माखनचोर
और
नटखट हैं जिनके सौन्दर्य पर गोपियाँ मरती हैं। तुलसीदास ने गोपियों
के माध्यम से भक्ति के महत्व को उभारा है। वास्तविकता यह है कि
तुलसी दास की कृष्ण भक्ति राम- भक्ति से
हीन नहीं है। कहा जा सकता है कि--
तुलसी को न होई सुनि कीरति
कृष्ण कृपालु भगति पथ राजी।।
बाललीला
छोटी, माटी, मिस्सी रोटी चिकनी चुरि कै तू
दैरी मैय्या! ले कन्हैय्या! सो कब? अबहि तात!
"सिगरियै हौंहि खैहों, बलदाऊ को न देहौं।"
"सो क्यो?""मटु तेरो कहा"कहि इत उत जात।१।।
बाल बोलि डहकि बिरावत, चरित लखि,
गोपि गन महरि मुदित पुलकित गात।
नूपुर की धुनि किंकिनि को कल रव सुनि
कूदि कूदि किलकि किलकि ठाढे ठाढे खात।२।।
तनियाँ ललित कटि, बिचित्र टेपारो सीस
मुनि मन हरत वचन कहै तोतरात।
तुलसी निरखि हरषत बरषत फूल
भूरिभागी वज्रवासी बिबुध सिद्ध सिहात।३।।

गोपी उपालम्भ
माँ कहँ झूठेहु दोष लगावहि।
मैया! इन्हहि बानि पर घर की, नाना जुगुति बनावहिं।।१।।
इन्ह के लिएँ खेलिनों छाड्यो, तऊ न उबरन पावहि।
भाजन फोरि, बोरि कर गोरस, देन उरहनो आवहिं।।२।।
कबहुक बाल रोवाइ पानि गहि, मिस करि उठि उठि धावहिं।
करहि आपु, सिर धरहिं आनके, बचन बिरंचि हरावहिं।।३।।
मेरी टेव बूझी हलधर सों, संतत संग खेलावहिं।
जे अन्याउ करहिं काहू को, ते सिसु मोहि न भावहिं।।४।।
सुनि सुनि वचन चातुरी ग्वालिनि हँसि हँसि बदन दुरावहिं
बाल गोपाल केलि कल कीरति तुलसीदास मुनि गावहिं।।५।।
ललित लरकाई
छाँड़ो मेरे ललन! ललित लरकाई!
ऐहों सुन! देखुवार कालि तेरे,
बबै ब्याह की बात चलाई।।१।।
डरिहौं सास ससुर चोरि सुनि,
हँसिहौं नइ दुलहिया सुहाई।
उबटौ न्हाहु, गुहौं चुटिया बलि,
देखि भलो बर करिंहि बड़ाई।।२।।
मातु कह्यो, करि कहत बोलि है
"भई बड़ि बार, कालि तौ न आई।
"जब सोइबो तात यों हाँ कहि
नयन मींचि रहे पौढ़ि कन्हाई।।३।।
उठि कह्यो, भोर भयो, झंगुलि दै
मुदित महरि लखि आतुरताई
बिहँसी ग्वालिजानि तुलसी प्रभु
सकुची लगे जननी उर धाई।।४।।
वंशी वादन
गावत गोपाल लाल नीक राग नट हैं
चलि री आली देखन, लोचन लाहु पेखन,
ठाढे सुरतरु तर तटिनी के तट हैं।।१।।
मोरचंदा चारु सिर, मंजु गुंजा पुंज धरे,
बनि बनधातु तन ओढ़े पीत पट है
मुरली तान तरंग, मोहे कुरंग विहंग,
जोहै मूरति त्रिभंग निपट निकट हैं।।२।।
अंबर अमर हरषत बरषत फूल
स्नेह सिथिल गोप गाइन के ठट हैं
तुलसी प्रभु निहारि जहाँ तहाँ व्रज नारि
ठगी ठाढ़ी मग लिएँ रीते भरे घट हैं।।३।।

विरह- प्रेम
गोपाल गोकुल वल्लवी प्रिय गोप गोसुन वल्लभ
चरनारविंदमहं भजे भजनीय सुर मुनि दुर्लभ।।१।।
घनश्याम काम अनेक छविलोकाभिराम मनोहरं।
किंजल्क बसन, किसोर मूरति भूरि गुन करुणाकरं।।२।।
सिर केकि पच्छ बिलोल कुंडल, अरुन बनरुह लोचनं।
गुंजावतसं विचित्र सब अंग धातु, भाव भय मोचनं।।३।।
कच कुटिल, सुन्दर तिलक भ्रू, राका मयंक समाननं।
अपहरन तुलसीदास त्रास विहार वृंदाकाननं।।४।।
गोपी- विरह
ससि ते सीतल मोकौ लागै माई री! तरनि।
याके उएँ बरति अधिक अँग अँग दव
ताके उए मिटति रजनि जनित जरनि।।१।।
सब विपरीत भए माधव बिनु
हित जो करत अनहित की करनि
तुलसीदास स्याम सुंदर विरह की
दुसह दसा सो मो पै परति नहीं बरनि।।२।।
द्रोपदी का विलाप
कहा भयो कपट जुआँ जौ हारी।
समर धीर महावीर पाँच पति
क्यों दैहै मोहि होन उधारी।।१।।
राज समाज सभासद समरथ
भीषण द्रोन धर्म धुर हारी।
अबला अनघअनवसर अनुचित
होनि, हेरि करहैं रखवारी।।२।।
यों मन गुनति दुसासन दुरजन

तमक्यों तकि गहि दुहुँ कर सारी।
सकुचि गात गोवतो कमठी ज्यों
हहरी हृदयँ, निकल भई भारी।।३।।
अपनेनि को अपनो विलोकि बल
सकल आस विश्वास बिसारी
हाथ उठाइ अनाथनाथ सों
" पाहि पाहि प्रभु! पाहि पुकारी।।४।।
तुलसी परखि प्रतीति प्रीति गति
आरतपाल कृपालु मुरारि।
बसन बेष राखी बिसेषि लखि
बिरुदाबलि मूरति नर नारी।।५।। |