सैय्यद मोहम्मद बशीर, बद्र की गजल

तेरा हाथ मिरे काँधे पे दर्या बहता जाता है
कितनी खामोशी से दुख का मौसम गुजरा जाता है।

नीम पे अटके चाँद की पलकें शबनम से भर जाती हैं,
सूने घर में रात गये जब कोई आता-जाता है।

पहले ईँट, फिर दरवाजे, अब के छत की बारी है
याद नगर में एक महल था, वो भी गिरता जाता है।

(सैय्यद मोहम्मद बशीर, बद्र की अन्य गजलें )


नरेश अग्रवाल की कविताएँ

मनाली में

ये सेब के पेड़ कितने अजनबी हैं मेरे लिए
हमेशा रहा सेब से रिश्ता मेरा
आज ये पेड़ बिल्कुल मेरे पास
हाथ बढ़ाऊँ और तोड़ लूँ
लेकिन इन्हें तोड़ूँगा नहीं
फिर इन सूने पेड़ों को
खूबसूरत कौन कहेगा?

( नरेश अग्रवाल की अन्य कविताएँ)


आर एस भास्कर की कोंकणी कविताएँ

नुकसान

बचपन में
मुझे युवा बनने की अदम्य इच्छा थी
पर आज
किसने किसको भुला दिया?
किसको क्या नष्ट हुआ?
क्या मेरा बचपन खो गया है?
या बचपन को मैं नष्ट हो गया हूँ?

अनुवाद डा. अरविन्दाक्षण
(आर एस भास्कर की अन्य कोंकणी कविताएँ)


गिरिराज जोशी की कविता

सिर्फ तुम्हारे लिए

जब से तुम्हे देखा है
जी करता है
कुछ ना कुछ लिखूँ
तेरे गालों पे लिखूँ
चाहें बालों पे लिखूँ
तेरे लबों पे लिखूँ
चाहे नैनों पे लिखूँ

मगर कुछ ना कुछ लिखूँ
ऐसा,
जैसा किसी ने ना लिखा हो
एकदम नया, एकदम फ्रेश
तेरा चेहरा फूलों की तरह खूबसूरत हैं
तेरे होंठ गुलाब की पंखुड़ियों से नरम हैं
तेरे गालों के उभार, मानो छोटे-छोटे पर्वतों के शिखर हैं
तेरी आँखे झीलों सी निर्मल, समुन्द्र सी गहरी हैं
तेरी बातों में एक अजब सी जादूगरी है

मगर
यह सब तो पहले ही लिख चुके हैं
बहुत से कवि
मैं तो लिखना चाहता हूँ
कुछ नया
जो सिर्फ तुम्हारे लिए हो
सिर्फ तुम्हारे लिए
जैसे मैं हूँ
सिर्फ तुम्हारे लिए

मगर जाने क्यूँ
कुछ भी नहीं सूझ रहा
मेरी कलम भी आज खामोश हैं
शायद नहीं बचा
अब कुछ भी नया
लिखने के लिए
या फिर
तुम्हे शब्दों में पिरो पाना संभव नहीं
कम से कम मेरे लिए

मगर फिर भी मैं कोशिश करूँगा
कुछ ना कुछ लिखने की
तुम्हारे लिए
क्योंकि मेरा जी करता है
लिखूँ
कुछ ना कुछ नया
तुम्हारे लिए
सिर्फ तुम्हारे लिए

( गिरिराज जोशी की अन्य  कविताएँ )


अजेय की कविता

कविता नहीं लिख सकते
( खाड़ी युद्ध में एक बागी सैनिक के उद्गार)

अच्छे मौसम में

हम मैच देखते हैं
बड़े से स्टेडियम में लाखों मस्त लोगों के साथ
कुरते और ट्राउजर उतार कर
गाढ़े चश्मे पहन कर
हमारी चिकनी चमड़ियों पर
झप झप धूप झरती है अच्छे मौसम मे।
उमंग से ऊपर उठता है झंडा
राष्ट्रीय धुन के साथ
हम खड़े हो जाते हैं सम्मान में
अपने भावुक राष्ट्रपति का अनुकरण करते हुए
होंठों में बुदबुदाते हैं अधबिसरे राष्ट्र-गान
आँखो के कोर भर आते हैं
बूँद बूँद खुशियाँ गुलाबी गालों पर
छप छप छलकतीं है
हमारे बगलों में सुन्दर मस्त लड़कियाँ होती हैं
कामोत्तेजक पिंडलियों वाली उछलती फुदकती
हवा उड़ाती है
स्कार्फ और मुलायम लटें
बिखेरती हैं इत्र की गंध ताजी
रविवार की सुबह
कुदरत शरीक होती है,रोमांचित-
हमारे उत्सव में
नीला आकाश
हरी घास
युद्ध से दूर.........

हम मैच देखते हैं
अच्छे मौसम में
कविता नहीं लिख सकते।

घटिया मौसम में

सूरज मुँह चुपा लेता है गर्द गुबार में
आसमान से बरस रही होती है आग
घटिया मौसम में
रात दिन उड़ते हैं जंगी जहाज
नीन्द नहीं आती
राकेट ‌और बमों के शोर में
तपता रहता है रेत/ दिन भर
मरीचिकाओं में प्रकट होती रहती हैं
फौलादी बख्तरबंद गाड़ियाँ
एक के बाद एक
अनगिनत
रेडियों सिग्नल, आड़े तिरछे बंकर और ट्रेंच
बारूदी सुरंगे,मानव बम, कार बम
रह रह के ग्रेनेड फटते हैं
और कान के पर्दों में घंटिया बजती रहती हैं निरंतर
कंटीली तारों में उलझी हुई जाँघे
कांप रही होती है बेतरह
दुख रहा होता है पसलियों में घुपा हुआ संगीन।
गुड़ मुड़ अजनबी भाषाएँ
बर्बर और भयावह
रौंदती चली जाती है हमारे जख्मी पैरो को
पसीना- पसीना हो जाते है हमारे माथे
हम ची
नहीं पाते
साँसे रोक, आतंकित, फटी आँखो से करते रह जाते है इन्तजार
दुश्मन के गुजर जाने का.....

हम युद्ध झेलते हैं
घटिया मौसम मे
कविता नहीं लिख सकते।

( अजेय की अन्य कविताएँ )) class="MsoNormal" style="text-autospace: none"> ="MsoNorma style="text-autospace: none">


उदय प्रकाश की कविता

करीमन और अशर्फी

शाहनबाज खाँ
तुम अपनी अण्टी से तूतनखामेन की
अशर्फी निकालना।

उधर हाट के सबसे आखिरी छोर पर
नीम के नीचे
टाट पर
कई साल से अपनी झुर्रियों समेत बैठी
करीमन किरानची होगी।

तुम उससे अशर्फी के बदले
लहसुन माँगना।

यह शर्त रही
कि वह नहीं देगी।

(उदय प्रकाश की अन्य कविताएँ )


रति सक्सेना की कविता

खेल खत्म , पैसा हजम

पर्दा उठा रहा है, तने चेहरों से स्याही उतर रही है,धरती तेजी से घूम रही है
टाँगे उता
बादशाह चढ़ा रहे हैं,  बैसाखियाँ एक के बाद एक बेशरम मुस्काने कलेण्डर के पन्नों पर फड़फड़ा रही हैं
जंग शुरु हो जाएगी, दामों में उछाल, अनाज महंगा, कारें सस्ती, लाश बनते जिस्मों फिर भी जान आ गई॔
जंग चलने लगी, पान की पीक गहरा गई, खबरों पर गरम मसाला बुरका गया, बातों को सिलसिला मिल गया
जंग चल रही है, गोया कड़ी तपन के बाद झमाझम हो गई, आग के गोले, तूफानी टेंकरों ,हवाई हमले, हारर फिल्म बासी पड़ गई
जंग चल रही है जोरदार, घरों की छते उड़ीं, फर्श दरके, कंधे उखड़ गए, रुदालियों की आँखों में समन्दर बस गए, झण्डे उठे, नारे उछले॔
बिसात पर गोटियाँ बदली, यह सब होते होते......खेल खत्म पैसा हजम

पर्दा गिर गया
अब आप जा सकते हैं

( रहस्य की बात)

जंग शुरु हुई है अभी- अभी पर्दे के पीछे, तमाम उजड़ी बस्तियों में
जिन्दा रह पाने के जिद में.....


श्यामल सुमन की कविता

झलक
बेबस है जिन्दगी और मदहोश है जमाना।
एक ओर बहते आँसू एक ओर है तराना।।
लौ थरथरा रही है बस तेल की कमी से।
उस पर हवा के झोंके है दीप को बचाना।।
मंदिर को जोडते जो मस्जिद वही बनाते।
मालिक है एक फिर भी जारी लहू बहाना।।
मजहब का नाम लेकर चलती यहाँ सियासात।
रोटी बडी या मजहब हमको जरा बताना।।
मरने से पहले मरते सौ बार हम जहाँ में।
चाहत बिना भी सच का पडता गला दबाना।।
अबतक नहीं सुने तो आगे भी न सुनोगे।
मेरी कब्र पर पढोगे गाकर मेरा फसाना।।
होते हैं रंग कितने उपवन के हर सुमन के।
है काम बागवाँ का हर पल उसे सजाना।।

( श्यामल सुमन की अन्य कविताएँ)


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ