धर्मवीर भारती की दो लम्बी कविताएँ
धर्मवीर भारती से कौन हिन्दी प्रेमी परिचित नहीं, लम्बे अरसे तक वे
धर्मयुग के माध्यम से घर- घर में साहित्य
के वाहक बने रहे। स्वयं उनकी
कृतियाँ अंधायुग आदि बेहद प्रसिद्ध रहे। किन्तु कभी-कभी
प्रसिद्ध कृतियों के कारण अनेक वे कृतियाँ पश्चातल में रह जाती
हैं, जो कवि की मुख्य धारा से भिन्न होती हैं, मुझे लगता है कि इस
तरह की कृतियाँ कवि के विचार तत्व खुलासा देती हैं, इस बार कृत्या
में हम धर्मवीर भारती की कुछ अपरिचित लब्बी कविताओं को दे रहे हैं।
निर्माण योजना
( कविता की मिनिस्ट्री द्वारा प्रस्तुत)
बाँध
बाँधों !
नदी यह घृणा की है
काली चट्टानों के
सीने से निकली है
अन्धी जहरीली गुफाओं से
उबली है!
इसको छूते ही
हरे वृक्ष सड़ जाएँगे
नदी यह घृणा की हैः
लेकिन नहीं है निरर्थक यह
बँधने से इसको भी अर्थ मिल जाता है।
इसकी ही लहरों में
बिजली के शक्तिवान घोड़े हैं सोये हुए!
जोतों उन्हें खेतों में, हलों में--
भेजों उन्हें नगरों में, कलों में--
बदलों घृणा को उजियाले में
ताकत में, नये- नये रूपों में साधो--
बाँधों--
नदी यह घृणा की है!

यातायात
बिना किसी बाधा के
नित नयी दिशाओं में
जाने की सुविधा दो
बिना किसी बाधा के
श्रम के पसीने से
सिंची हुई फसलों को
खेतों से आँतो तक जाने की
सुविधा दो
बिना किसी बन्धन के
हर चलते राही को
यात्रा में
अकसर थक जाने पर
मनचाहे नये गीत गाने की
सुविधा दो
कभी-कभी अजब-सी रहस्यमयी पुकारों पर
मन को अपरिचित नक्षत्रों की राहों में
जाकर खो जाने की सुविधा दो!
कृषि
ये फसलें काटो.....
पिछले जमाने में
बीज जो बोये विषमता के
आज वहीं साँपों की खेती उग आयी है!
धरती को फिर से सँवारो
क्यारी में बीज नये डालो
पसीने के, आँसू के
प्यार के, हमदर्दी के
मेंड़े, मत बाँधों
भूमि सबकी,
दरद सबका है!
स्वास्थ्य
वे सब बीमार हैं
वे जो उन्मादग्रस्त रोगी- से
मंचों पर जाकर चिल्लाते हैं
बकते हैं
भीड़ में भटकते हैं
वात- पित्त- कफ के बाद
चौथे दोष अहम से पीड़ित हैं!
बस्ती-बस्ती में
नये अहम् के अस्पताल खुलवाओ
ये सब बीमार हैं
डरों मत तरस खाओ!
तटस्थताः तीन आत्म कथ्य
रुक्मी की सेना
( महाभारत शुरु होने पर अपनी विशाल सेना लेकर रुक्मिणी का भाई
युधिष्ठिर के पास गया। उन्होंने सहायता लेना स्वीकार नहीं किया।
फिर वह दुर्योंधन के पास गया। उसने भी उसे स्वीकार नहीं किया। यह
महाभारत के अट्ठारहों दिन सेना लेकर पड़ा रहा, युद्धक्षेत्र के पास
ही।)
युद्ध

हमे सारे दिन
दूर से सुनाई दिया करते था!
हम बड़े जोधा थे, बड़े फोजदार थे
मगर क्या करते हम
दोनों ही पक्षों को हम अस्वीकार थे
भूल कर भी युद्ध में न जाने के हुक्म थे बहुत कड़ेः
( कटता था छावनी में पड़े- पड़े)
अक्सर खेलते थे
दर्शन हाँकते थे
कौन कहाँ सही है, कौन कहाँ गलत है
बड़ी निष्पक्षता से बैठ कर आँकते थे
हममे से लड़ा नहीं
कोई किसी रूप में
खटिया पर लेटे- लेटे
बाहर धूप में
हममें से हर एक युद्ध को, संकट को
बड़े बारीक स्तर पर जिया करता था
बात सिर्फ इतनी थी-शामिल नहीं थे हम
युद्ध हमें दूर से सुनाई दिया करता था!
सम्पाती
( जटायु का बड़ा भाई गृद्ध जो प्रथम बार सूर्य तक पहुँचने के लिए
उड़ा, पंख झुलस जाने से समुद्र तट पर गिर पड़ा। सीता की खोज में जाने
वाले वानर उसकी गुफा में भटक उसका आहार बने)
यह भी अदा थी एक मेरे बड़े बड़प्पन की
कि जब भी गिरूँ तो गिरूँ में समुद्र पारः
मेरे पतन तट पर गहरी गुफा हो एक-
बैठूँ जहाँ मैं समेट कर अधजले पंख
ताकि वे सनद रहें.....
जिनकों दिखा सकूँ कि पहला विद्रोही था मैं
जिसने सूरज की चुनौती स्वीकारी थी
सूरज बेचारा तो अब भी अपनी जगह
उतना ही एकाकी वैसा ही ज्वलन्त है
मैंने, सिर्फ मैंने चुनौतियाँ स्वीकारना बेफायदा समझ कर
बन्द कर दिया है अब!
सुखद है धीरे- धीरे बूढ़े होते हुए
गुफा में लेटकर समुद्र को पछाड़े खाते हुए देखना
कभी-कभी छलाँग कर समुद्र पार करने का
कोई दुस्साहसी इस गुफा में आता है
कहता हूँ मैं आ तू! ओ अनुगामी तू मेरा आहार है!
(क्यों कि आखिर क्यों वे मुझे याद दिलाते हैं
मेरे उस रूप की, भूलना जिसे अब ज्यादा अनुकूल है!)
उनके उत्साह को हिकारत से देखता हुआ
मैं फिर फटकता हूँ अपने अधजले पंख
क्यों कि वे सनद हैं
कि प्रामाणिक विद्रोही मैं ही था, मैं ही हूँ
नहीं, अब कोई संधर्ष मुझे छूता नहीं
वह मैं नहीं
मेरा भाई था जटायु
जो व्यर्थ के लिए जाकर भिड़ गया दशानन से
कौन है सीता।
और किसके लिए बचाएँ? क्यों?
निरादृत तो आखिर वे दोनों ही करेंगे उसे
रावण उसे हर कर और राम उसे जीत कर
नहीं, अब कोई चुनौती मुझे छूती नहीं
........................................
गुफा में शान्ति है...
..................................
कौन हैं ये समुद्र पार करने के दावेदार
कह दो इनसे कि अब यह सब बेकार है
साहस जो करना था कब का कर चुका मैं
ये क्यों कोलाहल कर शान्ति भंग करते हैं
देखते नहीं ये
कि सुखद है मेरे लिए झुर्रियाँ पड़ती हुई पलकें उठा कर
गुफा में पड़े- पड़े समुद्र देखना.......
बलराम
उसने चुना पांचजन्य
मैने लिया हल काँधे
वह बना अगुआ
उसने युद्ध के व्यूह बाँधे
मैं रहा अलिप्त
मैने अथक पद यात्रा की , गाँव-गाँव , खेत-खेत
बीच- बीच में मैंने युद्ध पर निर्णय दिये
भीम गलत और सही है दुर्योधन
( तुम चाहो लड़ो पर मानो मुझे सन्त जन)
मेरा शान्ति प्रवचन
कोई मुझे वैरी नहीं, कोई मुझे प्यारा नहीं
( मुँह दर मुँह मैंने कभी संकट स्वीकारा नहीं)

जिसे युग बदलना हो
वह रहे बदलता
मैं तो सन्तुष्ट हूँ
भोले गाँव वालों की कृपा पर पलता!
न मैं पक्ष में हूँ, न मैं विरोधी हूँ
युग से असंगत हूँ
नहीं किसी पर कुछ मेरा वश चलता
इसीलिए क्रोधी हूँ! |