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बहस अभी खत्म नहीं हुई है, अजेय का कहना
हैः--मुद्दा है --अराजक
परम्पराओं का पुनर्पाठ का, उसकी आवश्यकता का। आज हिन्दी की हिन्दी
की कविता अराजक परम्पराओं के पुनर्पाठ से वंचित रह कर क्या नुक्सान
झेल ही है ? वैष्णव परंपराओं ने कैसे हिन्दी कविता को उस वाईटल
आयाम से "च्युत" रखा। तांत्रिक परम्पराओं में किस तरह की संभावनाएँ
तलाशी जा सकती है? ... बहस जारी रहेगी..
जी हाँ बहस जारी रहेगी, बिल्कुल उसी तरह, जिस तरह "पागलखाने से
परि के खत" ने शुरु कर दी है। हम सब जानते हैं कि यह कविता उजाले
की नहीं, बल्कि अंधेरे की है। शायद इसी लिए इस कविता ने एक
प्रतिध्वनि पैदा की। " विकल्प " नामक पत्रिका ने "पागलखाने से खत", कृत्या की तरफ से लिखी कविता के साथ एक लघु
पत्रिका के रूप में छापा, जिसने कविता के हलके में काफी हलचल मचा
दी। कई स्थानों पर इस कविता का पाठ हुआ, बहस हुई, और स्त्री की
आवाज में एक बुलन्दी मिली।
रति
सक्सेना
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असख्य लाशों के बीच
तुम देख पाओगे
कोई मासूम बच्चा
जिसे तुमने रौंदा है
अपने पैरों तले
वह मरा नहीं है
सीने पर
तुम्हारे जूतों का निशान
लिए वह जिन्दा है
देवांशु पाल
*
तुम्हारे टुकड़े
मेरे भीतर
बाहर मैं
टुकड़े- टुकड़े
जुड़ी
पूरी समूची
मोरिजन बैन्टान फ्ल्याड
*
बकबक के बाद
वह "इटैलिक" में
किनारे चलती है
एक औरत
बेवकूफी की हद तक
खोजती है जगह रुकने को
वाक्य के बीच में, वाक्य रचना को नकारती
ध्वनि को अर्थ संरचना से बाहर निकालती हुई
अपने उदासी के कैदखाने से
मारिया
मैक्लियोड *
क्लास में पढ़ते वक्त मुझे सिखाया गया कि लम्बी ,
पतली उंगलियाँ कलात्मकता की सूचक हैं, मैं निराश थी,
चीम्पांजी की फोटो देखने तक, लम्बी बाहों वाले,
लम्बी पतली उंगलियों वाले चीम्पाजी, जिनका प्रयोंग वे टहनी पकड़ने
या झूलने के लिए करते
जोनेव मेकार्मिक
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मैं हिमाचल में बैठ कर हिन्दी में कविता करता हूँ तो मुझसे यह आशा
की जाती है कि मैं भोपाल, बनारस, इलाहबाद, कन्नौज अथवा पूर्णिया की
परंपरा से अवगत हो जाऊँ , तभी अच्छी कविता लिख पाऊँगा। या मार्क्स,
हिगल, देरिदा, चोम्सकी को ठीक से आत्मसात कर लूँ, वर्ना मेरी कविता
रीजनल लेविल की रह जाएगी। जबकि मेरे पड़ोस में बुल्लेशाह और वारिस
हैं। ललद्यत और मिलारेपा है। वे महज इसलिए क्षेत्रीय है कि अभी तक
हिन्दी में उपलब्ध नहीं हैं? हिन्दी में उन्हें कौन लेकर आएगा।
क्यों आज एक भारतीय को मिलारेपा अंग्रेजी के माध्यम में ही उपलब्ध
हैं। कोई इन कवियों को तभी जानेगा ना जब हम हिन्दी वालों में बाहर
झाँकने का ( पश्चिम को छोड़ कर ) साहस आएगा। मैं मानता हूँ यह समस्या
साहित्यिक कम और भाषागत अधिक है। ....लेकिन क्या इससे यह कम
महत्वपूर्ण है?
अजेय
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बाँध
बाँधों !
नदी यह घृणा की है
काली चट्टानों के
सीने से निकली है
अन्धी जहरीली गुफाओं से
उबली है!
इसको छूते ही
हरे वृक्ष सड़ जाएँगे
नदी यह घृणा की हैः
लेकिन नहीं है निरर्थक यह
बँधने से इसको भी अर्थ मिल जाता है।
इसकी ही लहरों में
बिजली के शक्तिवान घोड़े हैं सोये हुए!
जोतों उन्हें खेतों में, हलों में--
भेजों उन्हें नगरों में, कलों में--
बदलों घृणा को उजियाले में
ताकत में, नये- नये रूपों में साधो--
बाँधों--
नदी यह घृणा की है!
धर्मवीर भारती
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उठों मेरी मालती , सुन्द्रु के मेले चले
मेले के लायक नहीं हैं चोडू
माँग कर लायेंगे, और फिर लौटा देंगे
मेले के लायक नहीं हैं लूंगी
माँग कर लायेंगे, और फिर लौटा देंगे
उठों मेरी मालती , सुन्द्रु के मेले चले
मेले के लायक नहीं हैं कोई कंगन
माँग कर लायेंगे, और फिर लौटा देंगे
मेले के लायक नहीं हैं कोई हार
माँग कर लायेंगे, और फिर लौटा देंगे
हाथ थाम चले हम, साथ चढ़े, उतरें हम
हँसते मुस्कुराते क्रीडा करें हम
उठों मेरी मालती , सुन्द्रु के मेले चले
देखूँ जब पेड़ सफेदा, मालती की देह याद आये
देखूँ जब पूर्ण चन्द्रिका, मालती की छवि याद आये
देखूँ जब मिश्री की धार, मालती की नाक याद आये
देखूँ जब सागरी लहरें, मालती की अँखियाँ याद आवें
देखूँ जब शिलिम पणा, मालती के बाल याद आवें
लाहुली
लोक गीत,
सतीश कुमार लोप्पा
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