पुनर्पाठ को लेकर पिछले अंक में जिस बहस को अंजाम दिया गया था, वह जारी है। इसमें कुछ नए स्वर जुड़ें हैं-- जैसे मुम्बई से अनूप सेठी, दिल्ली से प्रमोद तिवारी। बहस दो खण्डों में बँटी दिखाई देने लगी हैः-एक हाशिये पर स्थित आवाज का आक्रमक रूप, दूसरा महानगरीय बेबसी में उलझा बचाव रूप। इस बहस ने कुछ हलचल जरूर मचाई है, हिन्दी कविता के उबासी भरे माहौल की शान्त / थकी / रुकी धारा में एक कंकड़ी मारी है। अन्ततः अजेय का यह वक्तव्य हमारे सामने सोच का पुनर्पाठ जरूर करता है--मैंने उस नोट के अन्य नोट भी बारीकी से पढ़े हैं। (राजेश जोशी की डायरी के जो पहल में छपी थी )वह नोटबुक हिन्दी के सभी कवियों को पढ़नी चाहिए। मुझे तो वहाँ परोक्ष रूप से अपने लिए हिदायतें मिलीं हैं। हिदायतें उन निषिद्ध क्षेत्रों पर दृष्टिपात करने की, जिन्हें मुझ जैसे तमाम नए कवि ( और बहु सारे वरिष्ठ कवि) साहित्यिक टैबू जैसा मानते हुए अक्सर स्किप कर जाते हैं। मसलन नीन्द की कविता, (जागरण ही क्यों?)गुण्डा कवि की कविताई, (गउ कवि ही क्यों?)प्रताड़ित के आर्तनाद का रसास्वादन करने की प्रवृत्ति.....तथा इसी तरह की कुछ बातें जिनसे इधर के कवि अनजाने ही परहेज सा करने लग पड़े हैं। एक कोमल दुनिया में रहने के लिए कंडिशन्ड होते हुए , जहाँ कुछ झकझोरता न हो।
यह बहस अभी खत्म नहीं हुई है, अजेय का कहना हैः--मुद्दा है --अराजक परम्पराओं के पुनर्पाठ का, उसकी आवश्यकता का। आज हिन्दी की हिन्दी की कविता अराजक परम्पराओं के पुनर्पाठ से वंचित रह कर क्या नुक्सान झेल ही है ? वैष्णव परंपराओं ने कैसे हिन्दी कविता को उस वाईटल आयाम से "च्युत" रखा। तांत्रिक परम्पराओं में किस तरह की संभावनाएँ तलाशी जा सकती है? ... बहस जारी रहेगी..( पढ़िये‍--पूरी बहस )
जी हाँ बहस जारी रहेगी, बिल्कुल उसी तरह, जिस तरह "पागलखाने से परि के खत" ने शुरु कर दी है। हम सब जानते हैं कि यह कविता उजाले की नहीं, बल्कि अंधेरे की है। शायद इसी लिए इस कविता ने एक प्रतिध्वनि पैदा की। " विकल्प " नामक पत्रिका ने "पागलखाने से खत", कृत्या की तरफ से लिखी कविता के साथ एक लघु पत्रिका के रूप में छापा, जिसने कविता के हलके में काफी हलचल मचा दी। कई स्थानों पर इस कविता का पाठ हुआ, बहस हुई, और स्त्री की आवाज में एक बुलन्दी मिली। यानी कि एक कविता बिना किसी नाम, पहचान के भाषा के दायरे से निकल कर अपने पाठकों तक पहुँच गई, मुझे लगता है कि यहीं से अजेय के मुद्दे को बल मिलता है। कविता बस कविता है, उसे स्थान, नाम, भाषा आदि से परे रह कर पढ़ना चाहिए। जिस तरह कि हिन्दी भाषा के पाठकों ने परि को पढ़ा। परि की कविता पर ईशिता की प्रतिक्रिया आई है, जिसमें वे बड़ी तल्खी कहती हैं कि ---किसी ने टिप्पणी की थी कि आज की सदी में भी स्त्रियाँ धूप,  उजाले, या चौकोर आसमान की बात क्यों करती हैं? लेकिन परि की कथा तो यही कहती है कि औरत का दर्द अभी तक जारी है। ( ईशिता का पत्र letters to editor खण्ड में छपा है ) ईशिता की बात से प्रभावित होकर मैने दूसरे बड़े देशों की स्त्रियों की कविताओं को टटोला, अमेरिका से निकलने वाली 13th moon नामक पत्रिका को पढ़ते हुए मैं चौंक गई, क्यों कि उस अत्याधुनिक समाज में भी वे ही तकलीफें है, जो विकासशील देशों की स्त्रियों को भुगतनी पड़ती हैं। इसी उद्देश्य को लेकर इस अंक में अनेक विदेशी कविताओं का अनुवाद दिया है। अमेरिका की किसी जेल में काम करने वाली जेकी सुलिवन जब कहती हैं कि---- आदमी, जो चाहते हैं /कि उनकी बीबियाँ / गुणवती तो हों / पर / महत्वाकांक्षी ना हो / स्मार्ट /तमीजदार / ईश्वर दया करे, वे बवाल ना खड़ा करे / मधुरभाषी / लेकिन खुलकर न बोलने वाली / गंभीर ‌‌और खूबसूरत / लेकिन मोहाकर्षक कदापि न .... तो छत्तीसगढ़ की निशा भौंसले कहती हैं‍--- लड़की झुकी हुई नजरों से /देती है कुछ / सवालों के जवाब/देती है परीक्षा/हर अंगों के सलामत /होने का सबूत//लड़की/करती है प्रतीक्षा / परिणाम की//अपनी इच्छा जाहिर किये / बिना ही /छोड़ती है फैसला/ अपनी जिन्दगी का//
यानी कि अभी भी औरत अपनी अस्मिता की लड़ाई ही नहीं जीत पाई है, इसका मतलब यह नहीं कि वह अभी तक यही पर स्थित है, हाँ, यह कहा जा सकता है कि तमाम हर क्षेत्र में आगे पहुँचने के बावजूद मौलिक जरूरतों / ख्वाहिशों को पूरा नहीं कर पाई है,  और मतलब यह भी है कि दर्द / आजादी / खुशी आदि का मतलब सभी भाषाओं में समान होता है।
कृत्या भाषा / देश/ सीमा आदि से परे जाकर सिर्फ कविता की बात करना चाहती है, इसलिए इस अंक में भारत से बाहर की कई आवाजों को शामिल किया गया है। हमारे अग्रज में हम लाहुली भाषा के लोक गीत लाएँ है। कविता के बारे में पुनर्पाठ की बहस शामिल है। प्रिय कवि के लिए धर्मवीर भारती की दो लम्बी कविताएँ (नातिप्रसिद्ध ) प्रस्तुत हैं जो आज भी प्रासंगिक प्रतीत होती हैं।
इस अंक के कलाकार हैं---.केरल के कलाकार सुरेश के. नायर, जिन्होंने अपनी कला के माध्यम से देश विदेश में नाम कमाया है। रेखांकन पुनः कृष्णकुमार अजनबी की गुलदस्ता नामक पुस्तक से लिए गए हैं।

कृत्या को निकलते दो वर्ष हो गए किन्तु अभी तक कृत्या का हिन्दी अंक लड़खड़ा कर चल रहा है, न ही रचनात्मक सहयोग मिल रहा है, और ना शाब्दिक प्रौत्साहन। संभवतः यह हमारा रचनात्मक आचरण है। फिर भी पाठकों से सभी तरह के सहयोग की अपेक्षा के साथ हम तीसरे वर्ष में प्रवेश की तैयारी कर रहे हैं।


रति सक्सेना

संपादक के नाम पत्र

कृत्या-- लक्ष्य और सपने

कृत्या के सहयोगी


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