अजेय का खत--
                           
पुनर्पाठ की आवश्यकता--- बहस जारी है

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डायरियों और नोटबुक्स में लोग बहुत स्वतंत्र होकर आत्यंतिक सच्चाइयों को उजागर कर देते हैं। पहल‍-84 में छपी राजेश जोशी की नोटबुक में भी कुछ ऐसी ही बातें थीं। इस पर अजेय ने लम्बी प्रतिक्रिया दी। कृत्या ने उस प्रतिक्रिया को हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में प्रकाशित किया। www.kritya.in

इस पत्र पर व्यापक प्रतिक्रियाएँ आ रहीं हैँ। योजना तो यह थी पुनर्पाठ की आवश्यकता पर गोष्ठियों की एक सीरीज आरंभ की जाए ‌और शुरुआत केलाँग से हो, लेकिन भौगोलिक विवशताओं के कारण यह संभव नहीं हुआ। बहरहाल विभिन्न स्थानों से ई-मेल, फोन आदि पर जो चर्चाएँ हुईं, उनके कुछ अंश प्रतिक्रिया के रूप में दिए जा रहें हैं। ताकि बहस जारी रहे। ई- मेल की सामग्री को सीधे- सीधे अनुदित किया गया है, जबकि फोन पर चर्चाएँ शब्दशः ट्राँसक्राइब नहीं हो पाई हैं। तदापि पूरा ध्यान रखा गया हैं कि बयानों में फेरबदल ना हो। प्रतिभागियों के सही आशय ही प्रस्तुत किए जा सकें। )


मुम्बई से अनूप सेठी ( आन लाइन )-- हाँ तुमने सही प्रश्न उठाया है। हिन्दी वाले आत्ममुग्ध हैं। समृद्धि के लिए उनमें बहुत कम ललक है। पाश्चात्य (परंपराओं / विचारों )से अपेक्षकृत अधिक सम्पर्क है और यह तथा कथित प्रगतिशीलता के लक्षण हैं।यदि कोई अपनी परंपरा की ओर झुकता है तो उस पर दक्षिणपंथी का ठप्पा लगा दिया जाता है। प्राचीन संस्कृति का अध्ययन करने पर रामविलास शर्मा को भी प्रगतिशीलों ने घेरना शुरु कर दिया था।
तुम्हारे स्वर में हिमालय की अनदेखी के प्रति कुछ विद्रोह सुनाई पड़ता है। यह "सबआल्टर्न" के स्वर हैं जो उत्तर आधुनिक विमर्श का प्रमुख घटक है। यह अकेले राजेश जोशी की गलती नहीं है। मिलारेपा की कृतियाँ हिन्दी में उपलब्ध नहीं हैं। ( हो सकता है कि मैं गलत हूँ ) इसलिए तुम कैसे कर सकते हो कि वे इस परंपरा के हिस्से हैं। पहले कोई उसे जाने तो सही। इस सन्दर्भ में तुमने सही कहा कि अभी हमें प्रथम पाठ ही सीखना है।

केलांग से अजेय ( आन लाइन) -- यही तो रोना है। मैं हिमाचल में बैठ कर हिन्दी में कविता करता हूँ तो मुझसे यह आशा की जाती है कि मैं भोपाल, बनारस, इलाहबाद, कन्नौज अथवा पूर्णिया की परंपरा से अवगत हो जाऊँ , तभी अच्छी कविता लिख पाऊँगा। या मार्क्स, हिगल, देरिदा, चोम्सकी को ठीक से आत्मसात कर लूँ, वर्ना मेरी कविता रीजनल लेविल की रह जाएगी। जबकि मेरे पड़ोस में बुल्लेशाह और वारिस हैं। ललद्यत और मिलारेपा है। वे महज इसलिए क्षत्रिय है कि अभी तक हिन्दी में उपलब्ध नहीं हैं? हिन्दी में उन्हें कौन लेकर आएगा। क्यों आज एक भारतीय को मिलारेपा अंग्रेजी के माध्यम में ही उपलब्ध हैं। कोई इन कवियों को तभी जानेगा ना जब हम हिन्दी वालों में बाहर झाँकने का ( पश्चिम को छोड़ कर ) साहस आएगा। मैं मानता हूँ यह समस्या साहित्यिक कम और भाषागत अधिक है। ....लेकिन क्या इससे यह कम महत्वपूर्ण है?

उदयपुर हिमाचल प्रदेश से सोरेश विद्यार्थी ( आन लाइन )-- बिल्कुल महत्वपूर्ण है और भाषा ही नहीं , यह प्रश्न गहराई में दार्शनिक परंपराओं से उत्पन्न मानसिकता से भी जुड़ा है, जिसकी ओर आरंभ में जोशी जी ने अपनी डायरी में संकेत किया था।
हिन्दी साहित्य का अल्प ज्ञान है मुझे, लेकिन एक ओरियन्टल कवि मिलारेपा के अस्तित्व का पता ना होना आश्चर्य की बात है। यह तो उसी तरह है जैसे किसी भारतीय संत को बौद्ध धर्म के अस्तित्व का पता नहीं होना।

जे. एन. यू. दिल्ली से प्रमोद तिवारी ( फोन पर )--यह सच है कि हिन्दी का समाज एक बन्द समाज है। उसे अपनी ही दुनिया में आत्ममुग्ध होकर जीना अच्छा लगता है। लेकिन हमारे यहाँ अपवाद भी हैं। हमारे दिग्गज कवियों ने इस परंपरा को तोड़ कर विश्व कविता में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का प्रयास किया, उदाहरण बहुत मिलेंगे। और मैं आपकों बताना चाहता हूँ कि बहुत सारी एकांकी कविता के होते हुए भी हिन्दी में अभी हाल ही में कुछ नई खिड़कियाँ खुलती दिख रहीं हैं। मसलन अकादमिक क्षेत्र मे ही। गत वर्ष NCERT के बारहंवी और दसवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में अक्का महादेवी और ललद्यत को शामिल किया गया, यह एक बड़ी बात है। भविष्य में यह योजना है कि हर बार किसी एकाध अहिन्दी कवि को NCERT पाठ्यक्रम में किसी न किसी रूप में शामिल किया जाएगा। तो ऐसा नहीं है कि हम अपने आपक बन्द रख कर प्रसन्न हैं, जैसा कि आपका यह पत्र संकेत दे रहा है कि विस्तार पाने और समृद्ध होने की चेष्टा आरंभ हो चुकी है। मैं यह सूचित कर देना चाहता हूँ कि JNU के आसपास ऐसे प्रयासों की झलक मिलनी शुरु हो गई है। केदार जी अक्का पर बहुत कुछ लिख चुके हैं। अनामिका के साथ मिल कर उन्होंने भारतीय भाषाओं के 10-15 कवियों को हिन्दी में ताना- बाना शीर्षक से प्रस्तुत किया है।

मनाली से अजय लाहुली पत्रकार ( फोन पर ) --यह सचमुच बड़ी बात है, और सच तो यह है कि NCERT जैसी संस्था अहिन्दी कवियों को पाठ्यक्रम में डालकर उनपर कोई अहसान नहीं कर रही है, आपत्ति यह तो हिन्दी की जरूरत है। आखिरकार सरवाइवल और विकास दोनों के लिए वैराइटी चाहिए। गैर पारंपरिक चीजें पढ़ाने से उनका प्रभाव दूरगामी और व्यापक रहेगा। तभी हमारे साहित्यिक पुरोधा उपेक्षितों को टटोलने की जरूरत महसूस करेंगे।

अनूप सेठी ( फोन पर )--हाँ , बिल्कुल और हम साहित्यिकों पर ही क्यों सारा दोष मढ़ें? सरकारें क्या कर रहीं हैं? राष्ट्रीय स्तर पर एन सी आर टी ऐसा कदम उठा रही है, तो प्रान्तीय शिक्षा बोर्ड क्या कर रहा है? विश्वविद्यालय क्या कर रहे हैं? क्या वहाँ ऐसे पाठ्यक्रमों का प्रावधान है? क्यों न हिमाचल बोर्ड के पाठ्यक्रम में ऐसे स्थानीय युग पुरुषों के लिए जगह रखी जाए जैसे कि कांशी राम जैस लोग भी थे।

अजेय ( फोन पर)‍‍--हाँ, और जैसे भोटी के कवि मिलारेपा, पहाड़ी कवि भरथरी आदि। आखिर सरकारी तंत्र की भी तो जिम्मेवारी है। लेकिन पंजाब, हिमाचल, एवं कश्मीर विश्वविद्यालय में भोटी जैसी उपेक्षित भाषा के चेयर एक अर्से से काम कर रहे है।

उदयपुर हिमाचल प्रदेश से सोरेश विद्यार्थी ( आन लाइन )--दरअसल मेरी समझ में यह बात नहीं आ रही है कि हिन्दी अहिन्दी की यह खाई चौड़ी क्यों होती जा रही है?
मैं इस समस्या को दार्शनिक आधार पर परखना चाहता हूँ। एक विकासवाद, दूसरा ह्रासवाद। दूसरी सोच यह कहती है कि आरंभ में सब कुछ सही था। समय के साथ मानव के बौद्धिक , सामाजिक एवं आध्यात्मिक चरित्र का ह्रास हुआ। वैषणव परंपराएँ इसी सोच से प्रभावित हैं। आरंभ में सब कुछ धर्म् पर आधारित था। जब अधर्म अपना भीषण चेहरा सामने लाया तो सर्वशक्तिमान ने स्वयं उतर कर धर्म की पुनर्स्थापना की। स्वर्णयुग की वापसी हुई और मानव उस दिव्य रोशनी के पथ पर पुनर्यात्रा पर जा सका। जब कि सच तो यह है कि इसी के समानान्तर एक इतिहास और चला, जिसे इस दूसरी सोच वाले लक्षित नहीं कर पाए। ( कैसे कर पाते ?) हुआ यह कि अनादिकाल से ही तथाकथित अधर्म अपना सिर उठाने से बाज नहीं आया। असुर दस्युयों से लेकर परिव्राजक, आरण्यक, आजीविक,चार्वाक, जैन, बौद्ध जो बाद में त्राटक, हठयोगी, अवधूत, कापालिक, सहजमार्गी,वज्रयानी,सिद्ध, नाथ, भक्त, सूफियों के रूप में विकसित हुए, ने सदा ही तथाकथित धर्म का विरोध किया। बुद्ध, महावीर के हजारों वर्ष बाद भी सरहपा, गोरखनाथ, नानक . कबीर , मिलारेपा पैदा होते रहे, जिन्होंने विद्रोह की परंपरा को अक्षुण्ण रखते हुए अगली पीढ़ी को सौंपा। यह बात अलग है कि इनमें से बहुत सी परम्पराएँ सम्प्रदाय मात्र बनकर रह गईं। किन्तु यह भी सच है कि इसी मंथन के दौरान कार्य- कारण सिद्धान्त का प्रतिपादन भी हुआ। नियतिवाद दर्शन को नकारा भी गया।
परन्तु प्रश्न है कि क्या विद्रोह की इन स्वस्थ परम्पराओं के अध्ययन ( जिन्हें जोशी जी अराजक परम्पराओं का पुनर्पाठ कहते हैं ) को इसलिए स्थगित कर दें कि वह सारा साहित्य हिन्दी में अनुपलब्ध है? पाश्चात्य साहित्यकारों ने खोज- खोज कर इन समान्तर साहित्य का अनुवाद किया है, क्या हमें नहीं करना चाहिए? हम विद्रोह की कविता की खोज में कब तक यूरोप, लैटिन अमेरिका मिडिल ईस्ट में भटकते रहेंगे। जबकि हमारी अपनी भाषाओं में भी प्रचुर रूप में हैं। चाहे वह तमिल हो, मलयालम हो, भोटी हो या कश्मीरी या पंजाबी हो।
तय यह है कि हम अपने भारत की परम्पराओं को नजरअन्दाज करते आएँ हैं तो पुनर्पाठ की बात बेमानी नहीं है क्या? जबकि क्षेत्रिय परम्पराओं की पुस्तकें खोलना ही यहाँ पाप है या पिछड़ापन , क्या हम प्रथम पाठ भी कर पाएँगे? आशा है कि इस विषय को जानकारों के सामने अपने मसले उठाकर हम लाभान्वित हो पाएँगे।

अनूप सेठी (फोन पर)-- ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हम विषय से भटक रहे हैं। इसमें बहुत सारी बातें हैं। एक तो यह विवाद आरंभ हुआ है वह महज डायरी है। डायरी में कई दफा आदमी अपनी रौ में कुछ कह देता है, इसे गंभीरता पूर्वक नहीं लेना चाहिए। दूसरी बात सोरेश बहस को दूसरी दिशा में ले जा रहे हैं। " ह्रासवादी दर्शन" पर उन्हें अलग टिप्पणी मेल करने जा रहा हूँ। खैर यह जुदा मामला है, बेहतर यह है कि हम अपने विषय पर फोकस करें। बहस शायद समकालीन हिन्दी कवियों पर पाश्चात्य विचारधारा पर जरूरत से ज्यादा प्रभाव पर थी। प्रकारान्तर से समकालीन प्रगतिशील हिन्दी कविता के एकाँगी होते चले जाने पर थी। क्या हम अपनी परम्पराओं को आत्सात किए बिना आयातित विचारधाराओं को सम्पूर्ण सत्य की तरह धारण करने की गलती कर रहे हैं? लेकिन एक और जरूरी प्रश्न यहाँ उठाना चाहता हूँ कि उस अर्थ में मिलारेपा को भी भारतीय परम्परा में शामिल करना युक्ति संगत है?

अजेय कृत्या के लिएः--मेरे विचार से हाँ। क्यों कि संस्कृति राजनैतिक और भौतिक सीमाओं को नहीं मानती। वह अपनी उर्जा और त्वरा से चारों और फैलती है। वस्तुतः मिलारेपा की विद्रोह चेतना मध्यकालीन भारतीय पुर्जागरण का ही प्रसार है। इसके ऐतिहासिक प्रमाण हैं? ग्यारहवीं सदी में भारत के 84 सिद्धों में से एक " नारोपाद" का तिब्बती शिष्य "मारपा" वज्रयानी तथा सहजयानी ग्रन्थों को भोटी भाषा में अनुवाद कर रहा था। उसी के एक शिष्य मिलारेपा ने इस तथाकथित " नवतंत्र" का प्रचार अपने गीतों के माध्यम से हिमालय के दोनो ओर किया। मिलारेपा के सम्पूर्ण रचनाकर्म पर सहजयानी एवं पूर्ववर्ती भारतीय परम्पराओं का प्रभाव स्पष्ट नजर आता है। ये वे ही अराजक परम्पराएँ हैं। अराजक और खालिस देसी। यदि कोई जिद करता है कि मिलारेपा के तिब्बती होने के कारण ये परम्पराएँ विदेशी हैं तो सम्पूर्ण हिमालय क्षेत्र विदेश है। जहाँ छठी शताब्दी से ही बौद्ध परम्पराएँ विकसित हुई हैं। चाहे सीधे- सीधे भारत से या तिब्बत के मार्फत से। यह जिक्र मैं अपने आधार पत्र में कर चुका हूँ (www.kritya.in)

दूसरी बात डायरी या नोटबक की गंभीरता को लेकर है। यह किसी आम अदमी की नोटबुक नहीं है, राजेश जोशी गंभीर बहुश्रुत कवि हैं। ज्ञानरंजन उनसे भी बड़े गंभीर संपादक। और पहल पत्रिका में कोई भी चीज उठा कर नहीं छाप दी जाती है, इतना तो हम हिन्दी वाले जानते हैं। मैंने उस नोट के अन्य नोट भी बारीकी से पढ़े हैं। वह नोटबुक हिन्दी के सभी कवियों को पढ़नी चाहिए। मुझे तो वहाँ परोक्ष रूप से अपने लिए हिदायतें मिलीं हैं। हिदायतें उन निषिद्ध क्षेत्रों पर दृष्टिपात करने की, जिन्हें मुझ जैसे तमाम नए कवि ( और बहु सारे वरिष्ठ कवि) साहित्यिक टैबू जैसा मानते हुए अक्सर स्किप कर जाते हैं। मसलन नीन्द की कविता, (जागरण ही क्यों?)गुण्डा कवि की कविताई, (गउ कवि ही क्यों?)प्रताड़ित के आर्तनाद का रसास्वादन करने की प्रवृत्ति.....तथा इसी तरह की कुछ बातें जिनसे इधर के कवि अनजाने ही परहेज सा करने लग पड़े हैं। एक कोमल दुनिया में रहने के लिए कंडिशन्ड होते हुए , जहाँ कुछ झकझोरता न हो।

बल्कि डायरी और नोटबुक मेरे लिए हमेशा इस लिए महत्वपूर्ण रहीं हैं कि इन्हीं विधाओं में कोई लेखक पूर्णतया स्वतंत्र हो पाता है। बाकी जगह बहुत सारे अदृश्य दवाबों में चलते वह इतना ईमानदार नहीं हो पाता। बहुत कम छूट मिलती है एक लेखक को, इतना तो हम सब के सब हाथ ऊपर करके मानेंगे ही।

बहरहाल, समस्या यहाँ किसी कवि के देशी या विदेशी होने की तो कदापि नहीं है। डायरी में लिखी बातों को तूल देने ना देने की भी नहीं है। मुद्दा है --अराजक परम्पराओं के पुनर्पाठ का, उसकी आवश्यकता का। आज हिन्दी की हिन्दी की कविता अराजक परम्पराओं के पुनर्पाठ से वंचित रह कर क्या नुक्सान झेल ही है ? वैष्णव परंपराओं ने कैसे हिन्दी कविता को उस वाईटल आयाम से "च्युत" रखा। तांत्रिक परम्पराओं में किस तरह की संभावनाएँ तलाशी जा सकटी है? ... बहस जारी रहेगी..

अजेय
केलांग
मार्च २०, २००७
 


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