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लाहुली
लोक गीत,
अनुवादक और प्रस्तुत कर्ताः--सतीश कुमार लोप्पा
लोक गीतों को कविता की श्रेणी में रखा जाए या नहीं? यह सवाल
उठना वाजिब भी है, क्यों कि लोक गीतों का कोई एक रचियेता नहीं
होता, ये समग्र समाज की सामूहिक भावना के वाहक होते हैं, इनके
सुरों में एकत्व का राग और जीवन रस की शक्ति होती है जो
दिन- प्रति दिन के संघर्ष को मृदु बनाते हुए सहभागिता की आस्था से
जोड़ती है। इनका काल व समय का निश्चित नहीं, फिर भी इन्हें हमेशा
अपने काल से पूर्ववर्ती माना जाता है। यही कारण है कि लोक गीतों को
"हमारे अग्रज" की श्रेणी में रखने में कोई समस्या नहीं। यही कारण
है हम इस बार देश के उत्तरी पर्वतीय भाग लाहुल से लोक गीत लेकर आए
हैं। जिसे सतीश कुमार लोप्पा ने अपने दादा जी की सहायता से संकलित
एव अनुदित किया है।
लाहुल देश का वह हिस्सा है जो पूरे देश से काफी अलग और कटा हुआ
माना जा सकता है। जीवन की तीव्र गति ने इस भू भाग को भी प्रभावित
किया है, यही कारण है कि यहाँ के लोक गीत लुप्त होने की कगार पर आ
खड़े हुए। सतीश कुमार लोप्पा ने इन्हें अपने दादा जी श्री कुन्जंग
की सहायता से संकलित किया और फिर हिन्दी में अनुदित किया। निसन्देह
यह सराहनीय कार्य है।
सतीश कुमार लोप्पा लाहुल के निवासी हैं, जिन्होंने होनहार छात्र के
रूप में स्नातक तक शिक्षा पाई किन्तु पारम्परिक व्यवसाय, कृषिपालन
की अवहेलना किए बिना पुश्तैनी खेती बाड़ी को सम्भालते रहे। कृषि
पालन ने उनके साहित्यिक चिंतन को कम नहीं किया और वे संस्कृति के
संरक्षण के बारे में चिन्तन करते रहे। लाहुली लोक गीत व गाथाएँ
आपका प्रिय विषय रहा है। आपने अपने दादा जी के द्वारा गाए गए गीतों का संकलन
किया और उन्हें अनुदित किया। सतीश के दादा जी श्री कुन्जंग का जन्म
1908 में गाँव लोट में हुआ था। ये यद्यपि पढ़े- लिखे नहीं थे किन्तु
अपनी नीति कौशल के कारण इलाके भर में प्रसिद्ध थे। जीवन बड़े संघर्ष
से बीता, तिब्बत की व्यापारिक सहायक के रूप में भी अनेक यात्राएँ
की, संभवतः इसी यायावरी ने उन्हें गीतों के इतना निकट ला दिया।
उन्हे लाहुल के तमाम लोक गीत मुँह जबानी याद थे, जिन्हे बाद में
सतीश कुमार ने संकलित किया, साथ ही हिन्दी में अनुदित भी किया। हम
उन्हीं अनुदित गीतों को प्रस्तुत कर रहे हैं
सूर्य चन्द्र की बहन का हरण
कहों माँ सच- सच, प्यारी हंसुली कहाँ गई
साग चुनती होगी, यहीं कहीं
बहुत पुकारा, खोजा साग- वालियों में
प्यारी हंसुली न मिली कहीं
कहों माँ सच- सच, प्यारी हंसुली कहाँ गई
पनिहार को गई होगी , यहीं कहीं
बहुत पुकारा,पनिहारिनो में ढूँढ़ा
प्यारी हंसुली न मिली कहीं
कहों माँ सच- सच, प्यारी हंसुली कहाँ गई
गाय चराने को गई होगी यहीं कहीं
बहुत पुकारा, ग्वालिनों में ढूँढा
प्यारी हंसुली न मिली कहीं
कहों माँ सच- सच, प्यारी हंसुली कहाँ गई
बकरी चराने गई होगी , यहीं कहीं
बहुत पुकारा,बकरी चराने वालियों में ढूँढ़ा
प्यारी हंसुली न मिली कहीं
कहों माँ सच- सच, प्यारी हंसुली कहाँ गई
राण्ड हो माँ तुम, सब बताती क्यों नहीं
बकरी चराने गई थी हँसुली यहीं कहीं
हर कर ले गया दुष्ट राहू वहीं से

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करते आखेट जा पहुँचे
सूर्य चन्द्र राहू के पनाले
वहां काम में लगी एक स्त्री
करने लगे वे छेड़ा- छेड़ी
लगे पूछने अता- पता
" राहगीर हो, अपनी राह लगों
मुझ से क्या लेना देना"
सूर्य चन्द्र लगे पूछने
कौन हो तुम, कौन माता- पिता?
"पिता मेरे भगवान विष्णु
माता मेरी धरती है"
लगे ताकने मुँह परस्पर वे
कहती रही वह अपनी गाथा
तीन पुत्रियाँ विष्णु की
बड़ी ब्याही नमों नारायण को
मंझली पाँच पाँडवों को
छोटी थी मैं उन सबमें
गई जब बकरी चराने
हर लाया यह राहू अधम
सूर्य चन्द्र ने फिर पूछा
क्या करती हो तुम राहू के घर
" नौ मंजिलों की झाड़ू- बुहार
तेल में भीगे कपड़ों की धुलाई
कर्थ की चमड़ी को
चीर रोटी पकाना
चकमक पत्थर को
कूट- काट भात पकाना
यही सब करती मैं
सुनी बाते , देखा एक दूजे को
समय गँवाये बिना
भाई चन्द्र ने जाँघ चीरी
छिपा बहन को भीतर
हो गया तुरन्त रफूचक्कर
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सूर्य चन्द्र का पीछा करते
आ पहुँचा राहू निकट
सूर्य चन्द्र ने फैंकी कंघी
बन गया झाड़- झंकार बीहड़
पार किया झाड़- झंकार बीहड़
आ पहुँचा राहू निकट
सूर्य चन्द्र ने फैंका पत्थर
बन गया वह पहाड़ विकट
पार किया पहाड़ विकट
आ पहुँचा राहू निकट
सूर्य चन्द्र ने फैंका शीशा
बन गया वह बर्फीला नील नग
छूटी पीछे राहू की माया भूमि
दूर निकल आए सकुशल
सूर्य चन्द्र बहन हँसुली संग।
नोटः लाहुली मान्याता के अनुसार चन्द्रमा में जो धब्बे दिखाई
देते हैं उनके सामुहिक अक्स को चन्द्रमा की बहन माना जाता है, जिसे
वह अपनी जंधा में छिपा के राहू के चंगुल से छुड़ा आया था। लाहुली
मिथक में नारायण के दो अर्थ निकलते हैं, एक अग्नि दूसरा शिव।
संभवतः इसी लिए विष्णु की बड़ी पुत्री को नारायण की पत्नी कहा गया
है।

पाणडवों का गीत
माँ कुन्ती, तुम्हारे पुत्र पाँच
तुम्हारे पुत्र पाँच
पाँच पुत्र, पाडंव ये कहलावें
पाडंव ये कहलावें
ज्येष्ठ पुत्र, क्या तुम्हारा नाम
क्या तुम्हारा नाम
ज्येष्ठ पुत्र, धर्मराज तुम्हारा नाम
धर्मराज तुम्हारा नाम
धर्मराज, क्या तुम्हारा काम
क्या तुम्हारा काम
धर्मराज, राजपाठ तुम्हारा काम
राजपाठ तुम्हारा काम
तत्कनिष्ठ, क्या तुम्हारा नाम
क्या तुम्हारा नाम
तत्कनिष्ठ, सहदेव तुम्हारा नाम
सहदेव तुम्हारा नाम
सहदेव पंडित, क्या तुम्हारा नाम
क्या तुम्हारा नाम
सहदेव पंडित, क्या तुम्हारा काम
क्या तुम्हारा काम
सहदेव पंडित, पठन पाठन तुम्हारा काम
पठन पाठन तुम्हारा काम
तत्कनिष्ठ, क्या तुम्हारा नाम
क्या तुम्हारा नाम
तत्कनिष्ठ, अर्जुन तुम्हारा नाम
अर्जुन तुम्हारा नाम
वीर अर्जुन, क्या तुम्हारा काम
क्या तुम्हारा काम
धनुर्धर, शरधन से तुम्हारा काम
शरधन से तुम्हारा काम
तत्कनिष्ठ, क्या तुम्हारा नाम
क्या तुम्हारा नाम
तत्कनिष्ठ, नकुल तुम्हारा नाम
नकुल तुम्हारा नाम
वीर नकुल, क्या तुम्हारा काम
क्या तुम्हारा काम
वीर नकुल, ढोलक तुम्हारा प्रिय वाद्य
ढोलक तुम्हारा प्रिय वाद्य
तत्कनिष्ठ, क्या तुम्हारा नाम
क्या तुम्हारा नाम
तत्कनिष्ठ, भीम तुम्हारा नाम
भीम तुम्हारा नाम
भीमसेन, क्या तुम्हारा नाम
क्या तुम्हारा नाम
भीमसेन,वृहत् तुम्हारा काम
वृहत् तुम्हारा काम
पाँच पुत्र, पाण्डव तुम कहलाते
पाण्डव तुम कहलाते
पाण्डव पंच, राजपाट तुम चलावें
राजपाट तुम चलावें
पांडवी राज में नौ गज का मानुष
नौ गज का मानुष
नौ गजवा के , छिपकलियाँ थी जुएँ
छिपकलियाँ थी जुएँ
पांडवी राज में, सेर का दाना गैंहूँ
सेर का दाना गैंहूँ
सती युग में था पाण्डवों का राज
पाण्डवों का राज
* इस गीत में महाभारत की कथा का दूसरा रूप दिखाई देता है, जो लोक
में प्रचलित है।
प्रेम गीत
उठों मेरी मालती , सुन्द्रु के मेले चले
मेले के लायक सुन्दर जूते नहीं हैं
माँग लेंगे जूते, और फिर लौटा देंगे
मेले के लायक पायजामा नहीं हैं
माँग कर लायेंगे, और फिर लौटा देंगे
उठों मेरी मालती , सुन्द्रु के मेले चले
मेले के लायक नहीं हैं चोडू
माँग कर लायेंगे, और फिर लौटा देंगे
मेले के लायक नहीं हैं लूंगी
माँग कर लायेंगे, और फिर लौटा देंगे
उठों मेरी मालती , सुन्द्रु के मेले चले
मेले के लायक नहीं हैं कोई कंगन
माँग कर लायेंगे, और फिर लौटा देंगे
मेले के लायक नहीं हैं कोई हार
माँग कर लायेंगे, और फिर लौटा देंगे
हाथ थाम चले हम, साथ चढ़े, उतरें हम
हँसते- मुस्कुराते क्रीडा करें हम
उठों मेरी मालती , सुन्द्रु के मेले चले
देखूँ जब पेड़ सफेदा, मालती की देह याद आये
देखूँ जब पूर्ण चन्द्रिका, मालती की छवि याद आये
देखूँ जब मिश्री की धार, मालती की नाक याद आये
देखूँ जब सागरी लहरें, मालती की अँखियाँ याद आवें
देखूँ जब शिलिम पणा, मालती के बाल याद आवें
रिन्चेंन जंगपो ( Rinchen Zangpo)
सांस्कृतिक एवं साहित्यिक सभा केलंग द्वारा प्रकाशित गीत-अतीत नामक
पुस्तक से साभार |