देवांशु पाल की कविताएँ

जब तुम लौट आओगे

जब तुम्हारी सारी
बन्दूक की गोलियाँ
खत्म हो जाएगी
तिब्बत की सड़कों पर
दनदनाते बरसाते हुए
जब तुम्हारे सारे गोले बारूद
खत्म हो जाएंगे
घर बाजार शहर
वीरान करते हुए
तब तुममे से कोई एक
आना मेरे साथ
मैं तुम्हें ले जाऊँगा
उन सड़कों पर
जहाँ तुमने की है हत्या
निहत्थे निरपराध असहाय
तिब्बतियों की

असख्य लाशों के बीच
तुम देख पाओगे
कोई मासूम बच्चा
जिसे तुमने रौंदा है
अपने पैरों तले
वह मरा नहीं है
सीने पर
तुम्हारे जूतों का निशान
लिए वह जिन्दा है

कोई बूढ़ा सा आदमी
जिसके सीने पर
तुमने दागी थी
बन्दूक की गोलियाँ
वह भी मरा नहीं
उसकी आवाज तुम
सुन सकते हो
कैसे गरज रहा है बह

उन असख्य लाशों में
कोई माँ होगी
जिसको तुमने किया है
निर्वस्त्र
खेला है उसकी कोख से
एक आग होगी
उसकी कोख में
तुम देख सकते हो
उस आग की लपटे
कैसे आसमान की तरफ बढ़ रहीं हैं

जब तुम लौट जाओगे
उन लाशों को लाँघते हुए 
तब तुम्हें ऐसा लगेगा
तुम जीत कर भी हार गए

(देवांशु पाल की अन्य कविताएँ )


ईशिता की कविता

शरद का ठण्डा पीला चान्द

चुक गई
चाँद की सारी मोहकता
चरखा कातती बुढ़िया वाले
बाल,  हैंगिंग से अधिक
और कुछ नहीं रह गए इसमें

गली मुहल्ले के
आँगन वाले खेलों की तरह
कितना जिन्दा था कभी
शरद का ठण्डा पीला चाँद।

पता नहीं
इसका आकर्षण बुझ गया
या फिर
मैं ही हो गई भाव हीन!

( ईशिता की अन्य कविताएँ )


मोरिजन बैन्टान फ्ल्याड की कविता

टुकड़े

तुम्हारे टुकड़े
  मेरे भीतर
बाहर मैं
  टुकड़े- टुकड़े
 जुड़ी
पूरी समूची


 (13th मून नामक पत्रिका से साभार)
class="tip">
(मोरिजन बैन्टान फ्ल्याड की अन्य कविताएँ)


निशा भोंसले की कविता

दंगा

दंगों में मुस्लमानों के घर जलते हैं
न हिन्दुओं के घर जलते हैं
दंगों में
बस घर जल जाते हैं
घर के भीतर पलता
बच्चों का बचपन
बुजुर्गों का बुढ़ापा
युवाओं के सुनहरे सपने
जल जाते हैं

दंगों में
सिर्फ राम और रहीम के
घर ही नहीं जलते
इंसानों की पहचान
जल जाती है।

( निशा भोंसले की अन्य  कविताएँ )


जैकी सुलिवन

खूबसूरत झुर्रियाँ

झुर्रियाँ
झाँइयाँ,
झुण्ड
गहरी लकीरों का
चमड़ी खाल
भूलभुलैया बनाती है
चेहरे पर
बूढ़ी महिला के

लकीरे जो
दिखलाती हैं
जिन्दगी की
सड़क की
टूट- फूट का
नक्शा
खुशी से लेकर
आल्हाद
चिन्ता
दुख
गुस्सा
डर

लकीरे, जो
एक जिन्दगी की
सूरज की
चौंधियाहट
हवा
अंधकार
और दूरी
ने बनाई

लकीरे दिखाती हैं
एक भरपूर जीयी गई
जिन्दगी
आँखों के घेर लेती है
यादें

भूतकाल की

 (13th मून नामक पत्रिका से साभार)

( जैकी सुलिवन अन्य कविता)) class="MsoNormal" style="text-autospace: none"> ="MsoNorma style="text-autospace: none">


मारिया मैक्लियोड

बकबक के बाद
वह "इटैलिक" में
किनारे चलती है
एक औरत
बेवकूफी की हद तक
खोजती है जगह रुकने को
वाक्य के बीच में, वाक्य रचना को नकारती
ध्वनि को अर्थ संरचना से बाहर निकालती हुई
अपने उदासी के कैदखाने से

(मारिया मैक्लियोड कविता, गद्य, कहानी आदि सभी विधाओं में लिखती हैं, आप फिलहाल वाशिंगटन अमेरिका में रहतीं --13th मून नामक पत्रिका से साभार)


जोनेव मेकार्मिक की कविता

जीत

पहली क्लास में पढ़ते वक्त मुझे सिखाया गया कि लम्बी ,
पतली उंगलियाँ कलात्मकता की सूचक हैं, मैं निराश थी,
चीम्पांजी की फोटो देखने तक, लम्बी बाहों वाले,
लम्बी पतली उंगलियों वाले चीम्पाजी, जिनका प्रयोंग वे टहनी पकड़ने
या झूलने के लिए करते

एक बार मेरे अध्यापक ने बताया कि उनके अनुभव में
बड़ी, तिकोनी आँखों वाले लोग पवित्र आत्मा होते हैं, और
गोल- गोल आँखे वाले शैतान बुद्धि, उनकी खुद की आँखे
बड़ी और तिकोनी थी, मैंने ध्यान से देखा तो उनमें तीखी चमक भी थी,
जब उनका गोल आखों वाला कुत्ता भौंका वे लालबगूले हो गए
उन्होंने कुत्ते को वेजिटेरिन डाइट पर रख दिया, वह केवल 6 बरस जिन्दा रहा।

ऐसा ही चलता रहा, सफेद, भूरा, ठिगना, लम्बा, मोटा, पतला, जवान, बूढ़ा
हम एक को दूसरे से बेहतर बनाते है, आखिरकार किसी को तो जीतना है
हम कोई नया खेल क्यों नहीं खेलते, कि कौन किससे बढ़कर दयालु है?

(जोनेव मेकार्मिक की अन्य कविताएँ) 


रति सक्सेना की कुछ नई‍ --कुछ पुरानी कविताएँ

उंगलियाँ ‌और स्याही

मेरी उंगलियों में अकड़न है
अकड़न का सम्बन्ध पेन पकड़ने से कतई नहीं
पेन और कागज को
कभी की भुला चुकी हैं मेरी उंगलियाँ

पेन की बात की तो स्याही याद आ गई
स्याही केवल रंग नहीं, स्वाद भी थी
पेन की जिब खींचते या दाँतों से ढक्कन खोलते वक्त
जीभ से होते हुए हलक तक पहुँचने वाली स्याही
कागज और दीमाग के बीच
विकट खुशबू का
एक पुल बना दिया करती
और फिर नाचना शब्दों पर

खुशबू, रंग, ‌और स्वाद के साथ
शब्द भी कहीं गुम हो गए

उंगलियाँ सुन्न है
मेरे दीमाग की तरह

की-बोर्ड के तख्ते पर
अक्षर फीके पड़ रहे हैं

(  अन्य कविताएँ)


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ