रति सक्सेना की कुछ नई‍ --कुछ पुरानी कविताएँ

तुम्हारे जाने के बाद

मैं हँसी,
इतना कि
पत्थर बन गए
तमाम आँसू

तुम्हारे जाने के बाद

उसका जाना

धूप की परतों से निकल
एक साँवली बदली का
छन्न से बरस जाना

पथराई जमीन से
एक बीज का सिर बाहर निकाल
बाहें पसार मुस्कराना

चोट पर चोट
नगाड़े की मोटी खाल का
फट से फट जाना

उसका जाना
झाले की झंकार पर
सितार का सिर टेक
ऊँघ जाना

उसका जाना
बिल्कुल वैसा ही तो
जैसा कि उसका
आना

उसका बड़ा होना

उसने कहा
"माँ, मैं बड़ी हो गई हूँ"
वह दाहिनी एड़ी पर घूमी
मुड़ी और धरती बन गई
इधर- उधर देख मैंने
छिपा लिया आँचल में

उसने कहा
"माँ, मैं सच में बड़ी हो गई हूँ"
बादल का एक टुकड़ा
छितरा लिया
चेहरे पर
घबरा गई मैं
झट से लाल चूनर ओढ़ा दी

उसने कहा
" मैं बड़ी हो गई, माँ
देख चाँद का टुकड़ा
मेरा स्तन चुभला रहा है"
ठिठकी रह गई मैं
असमंजस में
अब मैं चाह रही हूँ
एक बार फिर से
वह छोटी हो जाए

जड़ें जानतीं हैं

जड़े जानती हैं कि
वजूद उनका ही है
जिनके हिस्से में
रोशनी है

रोशनी उनकी है जो
बिना किसी परवाह
पी रहे हैं गटागट
धूप और छाँह
उंगलियों के रेशे-रेशे से
मिट्टी को थामे
सोचती रह जाती है वह
पीठ पर चढ़े
तने के बारे में
कोटर के बारे में
पखेरुओं के बारे में
अधमुन्दी आँखों से देखती है
टहनियों को, उन पर लदी पत्तियों को
तभी, कैंचुएँ गुदगुदाने लगते हैं
सँपोले कुदकियाँ भर
घेर लेते हैं
किस्से सुनाने लगतीं हैं चींटियाँ
लम्बी यात्राओं के
इक्कट्ठे हो जाते हैं वे तमाम
जिनके हिस्से में बस अंधेरा है

जड़े जानती हैं
सबसे बड़ा सुख
रोशनी नहीं है

जब कोई दरख्त बूढ़ा होता है

दरख्त ज्यों- ज्यों बूढ़े होते हैं
अतीत की ओंर चलने लगते है
दो शाख पेड़ बनने से पहले
सफेद पत्तियों वाले पौधे से पहले
दो लाल किल्ले वाले अंकुर से पहले
बीज तक पहुँच कर भी
थमती नहीं उनकी यात्रा
वे पहुँचना चाहते हैं फल में
कुतरने वाली चौंच के खुरदरे पन में
मीठी लाल जीभ में
पंखों में, तपिश में
कण में अणु में

लौटने कौ यात्रा कभी सुखदाई नहीं होती
पखेरु उंगलियाँ थाम लेते हैं
बादल पाँव में उलझ पड़ते हैं
तिनके रास्ता रोक खड़े हो जाते हैं
भुनगे मचल लौट लगाने लगते हैं
बूढ़े होते दरख्त
क्या कभी लौट पाते हैं वर्तमान मे
झरती पत्तियों के बीच

जब कभी झरती पत्तियों के बीच
दरख्त विराम पाता है
वह देखता है एक नन्हें पर को
चहकती चौंच को, और
घर बनते तिनकों को
उसका मन थम जाता है

जब कहीं भीषण बरसात में
सड़क नदी पर बही चली जाती है
पानी घरों में घुसपेंठ करने लगता है
एक सूखा तना ढरढरा कर
बन जाता है पुल, तो
बादलों से दोस्ती खत्म नहीं होती है

जब कहीं भीषण सपने से गुजरते हुए
काँट-झंकार से उलझते हुए
अनजानी मुस्कराहट
दोस्ती का हाथ बढ़ाती है, तो
गीत में रंग चढ़ जाता है
मन थकते- थकते
थम जाता है।

 


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