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धूमिल
की कुछ अपरिचित कविताएँ
धूमिल की लेखनी में चाकू, तलवार से ज्यादा धार,
बन्दूक से ज्यादा मारक शक्ति और छुईमुई की
पत्तियों से कहीं ज्यादा संवेदनशीलता है।
उनकी कविताएँ स्वयं अपने बारे मे इतना कुछ कह जातीं हैं कि अलग
से कुछ कहने की जरूरत ही कहाँ? प्रस्तुत कविताएँ उनकी मृत्यु के
उपरान्त प्रकाशित पुस्तक "सुदामा पाण्डे का प्रजातन्त्र" से ली गईं
हैं।
सुदामा पाण्डे का प्रजातन्त्र - -(
एक )
सेर भर कबाब हो
एक अद्धा शराब हो
नूरजहाँ का राज हो
खूब हो
भले ही खराब हो
(एक लोकोक्ति)
भेंट
कल सुदामा पाण्डे मिले थे
हरहुआ बाजार में। खुश थे। बबूल के
बन में बसन्त से खिले थे।
फटकारते बोले, यार! खूब हो
देखते हो और कतराने लगते हो,
गोया दोस्ती न हुई चलती- फिरती हुई ऊब हो
आदमी देखते हो, सूख जाते हो
पानी देखते हो, गाने लगते हो।
वे जोर से हँसे। मैं भी हँसा।
सन्त के हाथ -बुरा आ फँसा
सोचा -
उन्होंने मुझे कोंचा। क्या सोचते हो?
रात-दिन
बेमतलब बवण्डर का बाल नोचते हो
ले- देकर एक अदद
चुप हो।
वक्त के गंजेड़ी की तरह फूँकते रहे हो
चेहरे पर चमाइन मूत गई है। इतनी फटकार
जैसे वर्षों से अपनी आँखो में थूकते रहे हो।
अरे यार, दुनिया में क्या रखा है?
खाओ-पीओ, मजा लो
विजयी बनो-विजया लो
रँगरती
ठेंगे पर चढ़े करोड़पति।
सुदामा पाण्डे का प्रजातन्त्र ( दो )
न कोई प्रजा है
न कोई तन्त्र है
यह आदमी के खिलाफ
आदमी का खुलासा
षडयन्त्र है।
हर बार की तरह
तुम सोचते हो कि इस बार भी यह
औरत की लालची जाँघ से
शुरु होगा और कविता तक
फैल जाएगा।
बिल्ली का पंजा
चूहे का बिल है।

न्यू गरीब हिन्दू होटल
और फिर रात में
जब चीजें एक सार्वजनिक लय में
दुहराई जाने लगती हैं
होटल की माँद में
थकाहारा
बर्तन माँजने वाला घीसा
अपने से दस- बारह साल छोटे
लड़के की
गुदगर देह से सटा हुआ
जलेबियों का सपना देखता है
प्लेट साफ करते हुए
लड़के का सोना
कानूनी है कानूनी है
रोटी दो रोटी दो
सुरुवा दो सुरुवा दो
कीमा दो
बोटी दो
मालिक का सीझा हुआ चेहरा
जैसे बासी रोटी पर किसी
शरारती महाजन ने
दो आँखें बना दी हों
थाली आते ही मेरी टाँगों के नीचे
एक कुत्ता आ जाता है
कुर्सी से कौर तक फिर वही कुकुरबू
रोटी खरी है बीच में
पर किनारे पर कच्ची है
सब्जी में नमक ज्यादा है
पता नहीं होटल के मालिक का पसीना है या
महराज के आँसू
(इस बार भी देवारी में उसे घर जाने की छुट्टी नहीं मिली)
लोकतन्त्र
वे घर की दीवारों पर नारे
लिख रहे थे
मैंने अपनी दीवारें जेब में रख लीं
उन्होंने मेरी पीठ पर नारा लिख दिया
मैंने अपनी पीठ कुर्सी को दे दी
और अब पेट की बारी थी
मैं खुश था कि मुझे मन्दाग्नि की बीमारी थी
और यह पेट है

मैंने उसे सहलाया
मेरा पेट
समाजवाद की भेंट है
और अपने विरोधियों से कहला भेजा
वे आएँ-साहस है तो लिखें
मैं तैयार हूँ
न मैं पेट हूँ
न दीवार हूँ
न पीठ हूँ
अब मैं विचार हूँ।
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