

KRITYA
2007
Poetry Festival |
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कृत्या दो बरस की हो गई, इस दो बरस में कृत्या एक पत्रिका से उठ कर
एक संस्था बन गई। इन दो बरसों में कृत्या को अनेक अन्तर्राष्ट्रीय
पत्रिकाओं ने सराहा, और अपने पृष्ठों में जगह दी। अनेक पत्रिकाओं
और कवियों ने इसकी अभिरुचि और वैशिष्ट्य को सराहा। हालाँकि अपने
देश में सन्देह का भाव बना रहा फिर भी कृत्या ने कई कवियों को अपनी
बाढ़ तोड़ने के लिए बाध्य कर ही दिया। कृत्या तीसरा कविता उत्सव
मनाने की तैयारी में लगी है। इस बार भी शुरुआत बाहर से हुई, अनेक
देशों के कवियों ने कविता उत्सव में भाग लेने की इच्छा जाहिर की,
वह भी अपनी यात्रा का खर्च खुद उठा कर। लेकिन फिर अपने देश से
सूचित किया गया कि यदि आप नामी कवियों को बुलाना चाहते हैं तो उनकी
यात्रा का खर्च उठाइए। कृत्या अभी इतनी बड़ी संस्था नहीं बनी कि
अपना खर्चा भी स्वयं उठा सके, इसलिए नामी कवियों के स्थान पर अच्छी
कविताओं पर ही निर्भर रहना मुनासिब है।
रति
सक्सेना
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एक औरत और ईश्वर
रत हैं बातचीत में
चुपचाप गुजरो
इस वृक्ष के पास से
ऐसा कौतुक
एक औरत ही रच सकती है
जो ईश्वर को
स्वर्ग से उतार कर
एक वृक्ष की आत्मा में बसा दे।
सुरेश सेन
*
एक आदमी जेठ की तीखी धूप में
पत्थर के टुकड़ों से भरे भागते ट्रक में
सोया था चुपचाप
दूसरा मतलब यह भी है
वह एक विशाल पत्थर को
टुकड़े- टुकड़े करता रहेगा
जीवन- भर
एक छोटी सी शान्त नीन्द के लिए
प्रभात
त्रिपाठी
*
वह कच्चे नारियल दुधिया हँसी की
उजास बिखेरने वाली लड़की
जिसके कम लम्बे बाल की घनी छाँव में
बैठने की कल्पना कर
उसे चिढ़ाते थे तुम इतना कि
हँसते हँसते आँसुओं से भर जाये उसकी आँखे
तुम्हें देखते ही खिल उठती थीं
जिसे भरमाये रहते थे प्यार व्यार जैसा
कुछ कह कर तुम,
वन्दना मिश्रा
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आतंकित हैं हम, बेहद आतंकित.. मुँह से बात निकालने से पहले इधर -उधर
देखते हैं, कहीं कोई आका सुन तो नहीं रहा? जब किसी आका के मुँह से
कोई बात गिरती है तो हम तीतरी पक्षी बन कर तुरन्त झूठन चुगने लगते
हैं, फिर आराम से उस गलिष्ठ को उपनिषद बना कर जुगाली करने लग जाते
हैं।..............................
अराजक परंपराओं की बात करने से
पहले हम अपने आप को तो खंगाले, अपने दामन को बचाएँ , और उस रास्ते
पर चलना शुरु कर दें जो अकेला जाता है, हालाँकि आज के बाजारुवाद
वाले समय में यह बात बड़ी मूर्खता लगेगी। आज तो हर बात को गाजे-
बाजे के साथ कहने का जमाना है, प्रवचनों की चाशनी में फूलों की
खुशबू, रंगों की चमचमाहट और संगीत के भ्रमजाल को बिछाकर ग्राहक
फाँसने का जमाना है , तो फिर अराजक परम्पराओं पर हम कहाँ बात करें,
कैसे बात करें.. यह भी तो सोचना पड़ेगा...तभी तो कृत्या के नाम एक
भी प्रतिक्रिया नहीं आई...
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न कोई प्रजा है
न कोई तन्त्र है
यह आदमी के खिलाफ
आदमी का खुलासा
षडयन्त्र है।
हर बार की तरह
तुम सोचते हो कि इस बार भी यह
औरत की लालची जाँघ से
शुरु होगा और कविता तक
फैल जाएगा।
बिल्ली का पंजा
चूहे का बिल है।
*
वे घर की दीवारों पर नारे
लिख रहे थे
मैंने अपनी दीवारें जेब में रख लीं
उन्होंने मेरी पीठ पर नारा लिख दिया
मैंने अपनी पीठ कुर्सी को दे दी
और अब पेट की बारी थी
मैं खुश था कि मुझे मन्दाग्नि की बीमारी थी
और यह पेट है
धूमिल
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मुकाबला
मेरा मुकाबला नहीं तुम्हारे दूसरे
आशिक से , माशूका!
वह तुम्हे यदि बादल देगा,
मैं तुम्हे दूँगा बरसात
वह तुम्हे गर लालटेन देगा
मैं दूँगा तुम्हें चाँद
वह तुम्हे गर टहनी देगा
मैं दूँगा तुम्हें दरख्त
दूसरा गर तुम्हे जहाज देगा
मैं दूँगा तुम्हे एक पूरा सफर
समन्दर में
आखिरकार मुहब्बत हो गई
हम आ पहुँचे खुदा की जन्नत में
पानी के नीचे से तैरते हुए
मछली की तरह समन्दर के
बेशकीमती मोतियों को देख
अचम्भित होते रहे
आखिरकार मुहब्बत हो गई
बिना किसी डर के, पूरी शिद्दत के साथ
और हम साफ थे
इतनी आसानी से हुआ कि
जैसे कि चमेली के पानी से लिखा हो
जैसे कि पानि का दरिया बहा हो
नाजिर कुबानी
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