कृत्या दो बरस की हो गई, इस दो बरस में कृत्या एक पत्रिका से उठ कर एक संस्था बन गई। इन दो बरसों में कृत्या को अनेक अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं ने सराहा और अपने पृष्ठों में जगह दी। अनेक अन्तर्राष्ट्रीय कवियों ने इसकी अभिरुचि और वैशिष्ट्य को सराहा। हालाँकि अपने देश में सन्देह का भाव बना रहा फिर भी कृत्या ने कई कवियों को अपनी बाढ़ तोड़ने के लिए बाध्य कर ही दिया। कृत्या तीसरा कविता उत्सव मनाने की तैयारी में लगी है। इस बार भी शुरुआत बाहर से हुई, अनेक देशों के कवियों ने कविता उत्सव में भाग लेने की इच्छा जाहिर की, वह भी अपनी यात्रा का खर्च खुद उठा कर। लेकिन फिर अपने देश से सूचित किया गया कि यदि आप नामी कवियों को बुलाना चाहते हैं तो उनकी यात्रा का खर्च उठाइए। कृत्या अभी इतनी बड़ी संस्था नहीं बनी कि अपना खर्चा भी स्वयं उठा सके, इसलिए नामी कवियों के स्थान पर अच्छी कविताओं पर ही निर्भर रहना मुनासिब है।

मित्रों! अगला कविता उत्सव जुलाई के अन्तिम सप्ताह में मनाया जाएगा। आप सब से निवेदन है कि इसमें भाग लें। अबसे एक नया पृष्ठ जोड़ा जाएगा जिसमें उत्सव से सम्बन्धित सूचना होगी। सन्देह होने पर आप पत्र द्वारा सवाल पूछ सकते हैं। इस वक्त हमारा पूरा ध्यान उत्सव के प्रति है, अतः कृत्या के आकार को सीमित रखा जा रहा है।

इस अंक में फारसी कवि नासिर कुबानी को अग्रज- कवि के अन्तर्गत प्रस्तुत किया गया है। आशा है कि प्रिय कवि के रूप में धूमिल की रचनाएँ पाठकों को पसन्द आएँगी। समकालीन कवियों के रूप में हमारे जाने- पहवाने नामों के साथ कुछ नए नाम भी हैं। 'कविता के बारे में'  पृष्ठ में "अराजक परम्पराओं का पुनर्पाठ"  चिषय पर चल रही बहस के आगे न बढ़ पाने का दर्द है। कृत्या को दर्द के साथ आगे बढ़ने का अभ्यास है, और यही दर्द कृत्या की ताकत भी है। मुझे लगता है कि इन दो बरसों में कृत्या की ताकत में इजाफा हुआ है। इस अंक के प्रमुख चित्र हमारे सहयोगी कलाकार विजेन्द्र विज द्वारा चित्रित हैं।

रति सक्सेना

KRITYA2007

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