बहस के आगे--

पुनर्पाठ की संभावनाएँ और अराजक परंपराएँ

पिछले दो अंको से कृत्या के लिए जो बहस चल रही थी, उसके आगे बढ़ने की संभावना थी। लेकिन न बहस आगे बढ़ी और  न ही कोई सवाल उभरा। ऐसा नहीं कि लोगों ने पढ़ा नहीं , यह भी नहीं कि लोगों के मन में सवाल नहीं उभरे, लेकिन हिन्दी क्षेत्र की " चलता है" वाली मानसिकता ने इस बात को आगे नहीं बढ़ाया। कारण क्या‍‍.. हम सभी जानते हैं.. अजेय, सुधीर अराजक परम्पराओं की बात करते हैं, किन्तु हिन्दी में तो अराजक समकालीनता को भी नकारा जा रहा है। यही बात किसी खेमे से जुड़ी पत्रिका में छपी होती तो शायद बवण्डर मच गया होता। अजेय को किसी ने कहा भी कि यदि इतनी मेहनत किसी बड़ी पत्रिका के लिए करते तो क्या बात होती। मुझे पता नहीं कि अजेय को इसका मलाल है या नहीं , लेकिन मुझे लोगो के आतंक को देख कर मजा जरूर आया। जब लोग किसी किल्ले को फूटता देख खुश होने की जगह आतंकित हों तो उसके लिए क्या कहा जाए? गोया किल्ला फूटते ही अपने साथ बन्दूक की गोली लाया हो। मुझे लगता है कि आतंक ही एक ऐसी वजह है, जो किसी अराजक परंपरा के पुनर्पाठ पर टीका करने से रोकती है। आतंक हर उस चीज से हो सकता है, जिसमें जिन्दगी हो, जो अपने आप आगे बढ़ने की हिम्मत रखता हो, जो किसी छत का सहारा नहीं माँगता हो। मिलारेपा ऐसे कवि थे, जिन्होंने सब कुछ नकारा, घर- परिवार, रिश्त -नाते, अपना-पराया , लेकिन स्वीकारा एक अद्भूद सत्य। उसे नकारना या नहीं पढ़ना हिन्दी वालों की काहिलता नहीं, बल्कि समझदारी है... कहीं गलती से मिलारेपा का असर उन पर भी आ जाता तो? शायद फिर वे किसी मठ की छत्र - छाया से निष्काषित कर दिए जाते। दरअसल यह दौर कबीर जैसे घर फूँक कर तमाशा देखने का नहीं है। यह है किसी टिन की अधटूटी छत के नीचे झुक कर खड़ा रहने का है। यह तो साहित्य की बात है, नहीं तो क्या कारण था कि नाखून रंगने,साड़ी बाँधने जैसी कलाओं को बाँचने के लिए हजारों पत्रिकाएँ ना केवल छप रहीं हैं बल्कि लाखौं की तादाद में ऊँचे दामों में बिक भी रही हैं, वही थोड़ा बहुत साहित्य से सम्बन्ध रखने वाले पत्रिकाओं और पुस्तकों को मुफ्त में बँटना पड़ रहा है।
आतंकित हैं हम, बेहद आतंकित.. मुँह से बात निकालने से पहले इधर -उधर देखते हैं, कहीं कोई आका सुन तो नहीं रहा? जब किसी आका के मुँह से कोई बात गिरती है तो हम तीतर बन कर तुरन्त झूठन चुगने लगते हैं, फिर आराम से उस गलिष्ठ को उपनिषद बना कर जुगाली करने लग जाते हैं।
आतंकित हैं हम........हमारी कलम की नोक से वे ही शब्द गिरते हैं जो हमारे आका के मन में होते हैं..
आतंकित लोगों की भीड़ में अजेय , सुधीर चाहते हैं कि अराजक परंपराओं का पुनर्पाठ किया जाए? ...एक बात मेरे मन में आ रहीं है कि अब इन युवा तेवरों का अपहरण होने वाला है, किसी खास खेमे से कुछ लोग उठ कर आएंगे.. पीठ थपथपाएंगे और फिर .. फिर धीमे से हाथ पकड़ कर अपने खेमों में ले जाएँगे , जहाँ एक ऐसा यातना शिविर होगा जिसमें यातना का अनुभव तो नहीं होगा किन्तु व्यक्तित्व खत्म हो जाएगा। मुझे यह स्थिति एक दुःस्वप्न की भाँती दिखाई देती है.... मैं आगाह करना चाहती हूँ कि बचो बच्चों.!.. लेकिन मेरी चीख मेरे गले में घुँट कर रह जाती है।

फिर मैं बहक गई, अराजक परम्पराएँ की हम बात  कर रहे है, उसके पुनर्पाठ की भी बात कर रहे है, लेकिन अराजक परम्परा का पाठ करन से पहले हमं उसमें दीक्षित होना पड़ेगा । संकीर्तन को छोड़ कर खुद को नग्न करना पड़ेगा। यह नग्नता किसी ब्यूटी क्वीन के स्टाइल की नहीं, अक्का, लल्ला और मिलारेपा के रंग की होगी । जिसमें खुद को साफ शीशे में देखने की हिम्मत हो, जो सबसे पहले अपने भीतर- बाहर को साफ करना चाहता हो, जो मजमा लगाए बिना, भाषण दिए अपनी बात पहुँचाने की हिम्मत करता हो, उसे हम कैसे स्वीकारें? यह भी चिन्ता का विषय है, मात्र उनकी बात करके, या फिर गोष्ठियाँ करके , या फिर जिन्दगी में, कविता में उतार के?

अराजक परंपराओं की बात करने से पहले हम अपने आप को तो खंगाले, अपने दामन को बचाएँ , और उस रास्ते पर चलना शुरु कर दें जो अकेला जाता है, हालाँकि आज के बाजारुवाद वाले समय में यह बात बड़ी मूर्खता लगेगी। आज तो हर बात को गाजे- बाजे के साथ कहने का जमाना है, प्रवचनों की चाशनी में फूलों की खुशबू, रंगों की चमचमाहट और संगीत के भ्रमजाल को बिछाकर ग्राहक फाँसने का जमाना है , तो फिर अराजक परम्पराओं पर हम कहाँ बात करें, कैसे बात करें.. यह भी तो सोचना पड़ेगा...तभी तो कृत्या के नाम एक भी प्रतिक्रिया नहीं आई...

चलिए.. कृत्या खुद में एक अराजक परम्परा है... यह घर फूँक कर खुद जलना जानती है, इसलिए उन अनभेजी प्रतिक्रियाओं को तहेदिल से आशीष देती है।



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