सुरेश सेन "निशान्त" की कविता

इस वृक्ष के पास से

चुपचाप गुजरो
इस वृक्ष के पास से
प्रार्थना में रत है यहाँ एक औरत
उसे विश्वास है
इस वृक्ष में बसते हैं देवता
और वे सुन रहे हैं उसकी आवाज।

एक औरत और ईश्वर
रत हैं बातचीत में
चुपचाप गुजरो
इस वृक्ष के पास से
ऐसा कौतुक
एक औरत ही रच सकती है
जो ईश्वर को
स्वर्ग से उतार कर
एक वृक्ष की आत्मा में बसा दे।

चिड़ियों की चहचहाहट
हवाओं की सरसराहट
कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा है उसे
सिवाए
पने हृदय की धड़कनों के
सिवाए अपनी प्रार्थना के।

वृक्ष के हरे पत्ते
तालियों से बजते हुए
दे रहें हैं उसे आश्वासन
कि उठों माँ
सुन ली है ईश्वर ने
तुम्हारी प्रार्थना।

मन्दिर और मस्जिद से दूर
उनकी घंटियों और अजानों
से बहुत दूर
प्रार्थना में रत है एक औरत
चुपचाप गुजरो
इस वृक्ष के पास से।

( सुरेश सेन "निशान्त"की अन्य कविताएँ )


प्रभात त्रिपाठी की कविताएँ

एक आदमी

एक आदमी सिर पर पत्थर रखकर जा रहा था
उसका दूसरा मतलब यह भी है
कि वह सिर पर ईश्वर रख कर जा रहा था
तीसरा मतलब भी है
कि वह जा रहा था बाजार
भगवान की मूरत बेचने

एक आदमी जेठ की तीखी धूप में
पत्थर के टुकड़ों से भरे भागते ट्रक में
सोया था चुपचाप
दूसरा मतलब यह भी है
वह एक विशाल पत्थर को
टुकड़े- टुकड़े करता रहेगा
जीवन- भर
एक छोटी सी शान्त नीन्द के लिए

ईश्वर निर्मित पत्थर के नीचे
पत्थर निर्मित ईश्वर के नीचे
सदियों से दबा एक आदमी
लिखता है अपने पुण्य, अपने पाप
इसका जो चाहे वो मतलब
आप खुद निकालें माईं बाप!

( प्रभात त्रिपाठी की अन्य कविताएँ )


सुरेन्द्र रघुवंशी की कविता

आश्वस्त करने के लिए

कौवें नें काँव- काँव की भाषा में
अन्य पक्षियों को षडयन्त्रकारी कहा

लोमड़ी ने चालाक घोषित किया उन्हें
भेड़िये ने खुद की दयालुता के किस्से गढ़े
इसी तरह एक बाज
संत का दर्जा पा गया

पूरी दुनिया एक भयंकर और सघन जंगल में
तब्दील होती नजर आ रही है
ऐसे जंगल में
जिसकी धरती से लगातार पेड़ गायब हो रहे हैं
जिसमें सूख रहे हैं पोखर
और पत्तियाँ पीली पड़ती जा रहीं हैं
जानवर भी या तो खा लिए गये हैं
या भाग रहे हैं अपनी जान बचाकर

यह एक भयानक विरोधाभास है
कि पानी से गायब हो रही है नमी
और समन्दर से खारापन
 

पर आश्वस्त करने के लिए
काफी है यह भी
कि अंतरिक्ष में पृथ्वी
अब भी घूम रही है अपनी कक्षा में

( सुरेन्द्र रघुवंशी की अन्य कविताएँ)


तस्लीमा की कविता

दीर्घ पथ पर जाऊँगी

मैं पैदल ही उस पथ पर जाऊँगी
बाबा ने कहा है‍‍ - अगर तुम बेटी हो तो लौट आओ
मैं कहती हूँ-अगर लड़की होने के नाते मुझे लौटना पड़े
मैं तुम्हारी बेटी नहीं।
मित्रों ने बुलाया-आ जाओ, खेल खेलते हैं
नहीं मैं नहीं लौटूँगी....
वह पथ ऐसा है कि मुझे कोई फूल- चन्दन नहीं पहनायेगा
वह पथ ऐसा है जहाँ काँटे चुभेंगे मेरे पैरों में
वह पथ ऐसा नहीं है जिस पर लोग जाते हैं या
जाना चाहते हैं
वह पथ ऐसा है - जहाँ चलने पर साँस उखड़ जाती है
मुझे पता है- उस रास्ते चलने पर
एक दिन मिल जायेगा एक आलोकिक ब्रह्माण्ड
मनुष्य को मिलेगा मनुष्य का प्रेम
ताजी हवा मिलेगी
माँ ने कहा था- वापिस आ जा
नहीं, मैं वापिस नहीं आऊँगी
मुझे जाना होगा उस पथ पर
जहाँ सबकी हिम्मत नहीं होती है जाने की।

( तस्लीमा की अन्य कविताएँ )


 
वन्दना मिश्रा की कविता

वह दुबली सी लड़की

सच बताओं क्या तुम्हें कभी याद आती है?
वह कच्चे नारियल दुधिया हँसी की
उजास बिखेरने वाली लड़की
जिसके कम लम्बे बाल की घनी छाँव में
बै
ने की कल्पना कर
उसे चिढ़ाते थे तुम इतना कि
हँसते हँसते आँसुओं से भर जाये उसकी आँखे
तुम्हें देखते ही खिल उठती थीं
जिसे भरमाये रहते थे प्यार व्यार जैसा
कुछ कह कर तुम,
और जानते हुए भी कि झूठे हो तुम
तुम्हारे हर झूठ पर आश्चर्य करती थी जो
जिसे देख कर तुम्हारी आँखों में अनोखी चमक
आ जाती थी
और बड़ी मासूम लगती थी जिसे तुम्हारी
वह चमक
जो सिर्फ तुम्हारी डाँट के लिए करती रही
गलतियाँ,
और कर बैठी तुमसे जुड़ने की
अक्षम्य गलती
सच बताओ कभी याद आती है तुम्हे
वह दुबली सी लड़की?
उस क्षण
कैसे लगते हो खुद की नजर में तुम?

 

( वन्दना मिश्रा की अन्य कविताएँ
)

अजेय की कविताएँ

शिमला-- कुछ स्मृति स्थल

शिव बावड़ी

उन दिनों मैंने तुम्हें घूँट- घूँट पिया
दारू की तरह
और तुम्हारा दिया "अल्सर"
आज भी सुलग रहा है
मेरे जिस्म के भीतर।
 
फेयर लान

घास तो वही है।
काश, इस मखमल पर कुछ लड़के 'फ्रिस्बी'खेलते
कुछ अपने कमरों मे 'राओज' के नोट्स रट रहे होते
ठाकुर की स्टाल से 'बन आमलेट' की खुशबू उठ रही होती
देर रात कुछ जोड़े 'कन्ट्री रोड्स' गाते जंगल में उतर गए होते
चाँदनी में 'वुडरीना' के आस-पास रोमांस हो रहा होता
कुछ पढ़ाकुओं ने आकर आपत्ति कर दी होती
और एक लड़का इस सब से बेखबर
चार्वाक, लाओत्से ‌और मार्क्स को समझने की कोशिश में
दूर 'क्रेगनेनो में' बीयर पीते हुए सूर्यास्त
देख रहा होता
घास तो वही है
दरख्त और इमारतें भी कमोबेश
हवा कुछ बदली बदली सी है

( अजेय की अन्य कविता )


लावण्या के गीत

चित्र- विथी

शाम को आने का वादा,
इस दिलको तसल्ली दे गया,
आने का कह कर तुमने,
हमे सुकूँ कितना दिया!

अमलतास के पीले झूमर
भर गये, आँगन हमारा,
साँझ की दीप बाती जली,
रोशन हो गया हर किनारा !

पाँव पडे जब दहलीज पर
हवा ने आकर, हमको सँवारा,
आँगन से, बगिया तक,
पात- पात, मुस्कुराया !

बिंदिया को सजाती उँगलियों ने,
काजल नयनों में बिखेरा,
इत्र की शीशी से फिर ले बूँद,
हमने उन्हे, गले से लगाया !

घर से भीतर जाने का रस्ता,
लाँघ कर, जो भी है, जाता,
या आता ! खडी रहती जो,
हमेशा, वो दहलीज है!

(लावण्या के गीत )

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