विंदा करंदीकर की कविताएँ

मराठी के कवि विंदा करंदीकर की गणना उन कवियों में होती हैं जिन्होंने कम लिख कर भी अधिक ख्याति पाई। विंदा की कविताओं में गुणवत्ता, वैविध्यता और गहनता के साथ प्रयोग की मौलिकता है । शब्द, अर्थ और भाव हर क्षेत्र में विंदा अपनी मौलिकता का परिचय देते हैं । विंदा की कविताओं में प्रयोगधर्मिता के प्रति आग्रह होते हुए भी मानवीय संवेदना से सरोकार बरकरार रहा है । कही भी नहीं ऐसा नहीं लगता है कि आपने नवीन प्रयोगों के प्रति आग्रह के कारण पाठकीयता को नकारा हो । वस्तुतः आपकी कविताओं का ताना - बाना चाहे कुछ भी हो, आधार अनुभूति ही रहा है । वे पेड़, पौधे, नद, नदियाँ, पहाड़, घाटियाँ, लाल मिट्टी, रास्ते, दह, देवालय, लोक कथाएँ, दंत कथाएँ, भूत प्रेत, तोते, कौवे, गिद्ध, गाय,बैल, छिपकलियाँ, गिलहरियाँ, कोमल धूप, वर्षा, ठंड आदि जमीन से जुड़े समस्त तत्वों को समेटते हुए इस तरह से प्रस्तुत करते हैं कि कविता समय के साथ जिंदगी के समान्तर में चलती है । शब्दों के प्रयोग में आपको इतनी महारत हासिल है कि शब्दों के प्रयोग का अद्भुत वैविध्य और चमत्कार जहाँ एक और पाठकों को आकर्षित करता है वहीं रस भी बाधित नहीं होता है । विंदा की कविताओं की विविधता को समेटना संभव तो नहीं किंतु कुछ ऐसी कविताओं को प्रस्तुत किया जा सकता है जो कविता के क्षेत्र में नए क्षितिज खोलने में सक्षम हैं । इन कविताओं का अनुवाद मुख्यतया डा चन्द्रकांत बादिवडेकर ने किया है । आप विद्वान लेखक व साहित्कार हैं । आलोचना और अनुवाद के क्षेत्र में आपकी विविष्ट ख्याति है । पुरुष सूक्त कविता का अनुवाद प्रमुख कवि चिंतक प्रभाकर माचवे तथा बुनियाद कविता का अनुवाद श्री प्रकाश भातंब्रेकर द्वारा किए गए हैं । इन कविताओं के संकलन के लिए हम संवाद प्रकाशन के आभारी हैं जिन्होंने ये अनुवाद प्राप्त करवाए।

झपताल

पल्लू बाँध कर भोर जागती है.. तभी से झप- झप विचरती रहती हो
....कुर कुर करने वाले पालने में दो अंखियाँ खिलने लगती हैं ,
और फिर नन्ही- नन्ही मोदक मुट्ठी से तुम्हारे स्तनों पर
आता है गलफुल्लापन, सादा पहन कर विचरती हो , तुम्हारे पोतने से
बूढ़ा चूल्हा फिर से एक बार लाल हो जाता है , और उसके बाद
उगता सूर्य रस्सी पर लटकाए तीन गंडतरों को सुखाने लगता है
इसीलिए तुम उसे चाहती हो! बीच- बीच में तुम्हारे पैरों में
मेरे सपने बिल्ली की भाँति चुलबुलाते रहते हैं , उनकी गर्दनें
चुटकी में पकड़ तुम उन्हें दूर करती हो , फिर भी
चिड़िया - कौए के नाम से खिलाये खाने में बचा -खुचा एकाध निवाला उन्हे भी मिलता है।

तुम घर भर में चक्कर काटती रहती हो, छोटी बड़ी चीजों में
तुम्हारी परछाई रेंगती रहती है.....स्वागत के लिए सुहासिनी होती हो
परोसते समय यक्षिणी , खिलाते समय पक्षिणी ,
संचय करते समय संहिता और भविष्य के लिए स्वप्नसती ,
...गृहिस्थी की दस फुटी खोली में दिन की चौबीस मात्राएँ
ठीक -ठाक बिठानेवाली तुम्हारी कीमिया मुझे अभी तक समझ में नही आई

 

२८ जनवरी , १९८०,
आज का दिन मुझे मनाने दीजिए


आज आर के लक्ष्मण ने लिखी
आधुनिक भारत की सर्वश्रेष्ठ विद्रोही कविता
आधी रेखाओं में, आधे शब्दों में,

"नगर पालिका ने सफाई के लिए
कचरे के ढ़ेर यहाँ से हटाए तो
हम भूखे मरेंगे"

आज का दिन मुझे मनाने दीजिए

कचरे में से अन्नांश उठा कर
जीवित रहने का अधिकार
अपने संविधान में अंतर्भूत है क्या ?
ऐसा न हो तो ,
सार्वजनिक वस्तु की चोरी करने के अपराध में
अपनी सरकार इन लोगों पर
नालिश दाग सकती है या नहीं ?

इससे पहले कि जानकार इन प्रश्नों पर निर्णय लें

मुझे आज का दिन मनाने दीजिए


समर्थों के हाथ / जन्म मृत्यु

मालिकों का प्रभु / उन्हीं पर प्रसन्न
हम तो सिर्फ रहे / अन्न भक्त
पेट के हाथों में / आत्मा की पतंग
स्वप्नों के ये रंग / पूछों पर
अजी आजादी की / राह पेट में से
शेष विमर्श / सफेदों का
पिंजड़े में पंछी / आजादी के गाने
बुलवाता मालिक / अन्य कोई !
अरे काहे को है / भविष्य की भाषा
संस्कृति का गोशा / हिजड़ों को ?
रोज रोज मेरा जन्म / मेरी मृत्यु रोज
आज और कल / भाषा असंगत
हम और तुम सब / मानव और मिट्टी
समर्थों के हाथ / जन्म मृत्यु


सब घोड़े बारह टक्के

जितने सिर , उतने मत
जितने शीश , उतने भूत
कोई नरम , कोई गरम
कोई सफेद , कोई लाल
कोई मोटा , कोई सुस्त
कोई ढीले , कोई चुस्त
कोई कच्चे , कोई पक्के
सब घोड़े बारह टक्के !

मीठी- मीठी पुरानी गप्पें
(ओ तुम बोओ ; तुम काटो )
पुरानी आशाएँ , नए सकंल्प
पुराने सपने , नए विकल्प
तुम भी तो भाई क्या करोगे ?
हम भी तो भाई क्या करेंगे ?
वही खड्ड , वही पाँव
उसी खड्ड में वही पाँव
पुराना माल , नए सिक्के
सब घोड़े बारह टक्के !

सत्ता जहाँ , वहाँ रोटी
सत्य जहाँ , वहाँ गोटी
(टका जहाँ , वहाँ टोली)
जिसका पैसा , उसकी सत्ता
बार - बार यही कथा
बार - बार वही सवार

इसकी लातें , उसके मुक्के
सब घोड़े , बारह टक्के !
सब घोड़े , कम घास
कौन देगा फिर आस ?
छप्पर सिर पर है जरूरी
कौन देगा मेरा हरी ?
कहे कोई "देंगे हम"
मैं फसाऊँ अपने मन
भूख से है भ्रम अच्छा
कौन झूठा , कौन सच्चा ?
कोई तिक्के , कोई छक्के
सब घोड़े बारह टक्के !


बुनियाद

मेरा आशावाद चार सौ चालीस पैरों पर खड़ा है
दोस्त , उसका गुर भी सुन लो ,
एथेंस ने
सत्तर पार के सत्य शोधक सुकरात पर
युवजनों को गुमराह करने का आरोप लगा कर
जूरी के सामने उसे पेश किया ,
बहुमत से वह दोषी पाया गया ,
उसे विषपान की सजा मिली ,
( उसने सजा कैसे काटी , यह तो प्लेटो से पूछो ; विषयान्तर होगा )

लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ

जूरी के पाँच सौ सदस्यों में से
दो सौ बीस ने उसे बेकसूर पाया
( उनसे मिलने की यदा कदा इच्छा होती है ; लेकिन यह विषयान्तर हुआ )

मेरा आशावाद
प्लेटों के दो पैरों पर नहीं ,
दो सौ बीस दूनी चार सौ चालीस पैरों पर खड़ा है ।


पुरुष सूक्त

युयुत्सु जाति का मूँछदार पुरुष मैने देखा एक म्यूजियम में
नहीं पकने वाली थीं उसकी मूँछें , इस्पात पके बिना
नहीं डिगने वाले थे उसके पाँव , पृथ्वी डिगे बिना
नहीं झुकने वेली थी उसकी रीढ़ , शहतीर गिर पढ़ने पर भी
उसका एक हाथ था उठाया आसमान को गिरते हुए रोकने के लिए

युयुत्सु जाति का मूँछ -ग्रस्त पुरुष देखा मैंने " भैया" की दूकान में
लस्सी की मक्खी रास्ते में झटक कर पी गया वह गटागट
और फिर खड़ा रहा एक पैर पर बस के क्यू में
टिकिट न ले कर पहुँच गया आफिस में ( शायद टिकिट लेता भी )
आफिस की गर्मी में ठंडा रहा , हिम मानव की तरह , जवाब देते हुए

युयुत्सु जाति का मूँछ मुक्त पुरुष देखा मैंने अपनी शहादत में
परी के प्रेम में मक्खी बन कर पड़ा हुआ ........एक हिम मानव को
ब्रह्म सूत्र पढ़ाते हुए......., बहादुरी मूँछे खरीद लेने पर
खोजते बैठा था अपनी स्त्री को आटे के डिब्बे में , प्राक्तन के साथ ,
युयुत्सु जाति का मूँछदार पुरुष....., मूँछ ग्रस्त ....मूँछ मुक्त

 


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