जी एस शिवरुद्रप्पा

कन्नड़ कविता

इस देश में

इस देश में
उपर से नीचे तक
सब कुछ बदलना है
पर
जो कुर्सी मुझे ढ़ो रही है
और उसके नीचे
जो थोड़ी जमीन है
उसे यूँ ही छोड़ देना है

इस देश में
जातो धर्म व वर्गभेद के लिए
कोई स्थान नहीं है
पर हम अगड़ों के लिए
जगहें आरक्षित होँ।

इस देश में
वीर आराधना
तथा वंशाधिपता
बन्द हो जाएँ
पर खानदानी देवता को
दान दी गई जमीन
उसी तरह रहे।

इस देश में
जनता बोलना बन्द करके
चुप रहे
पर
मेरी बातों को सदैव ध्यान से सुने
और उनका स्वागत करे।

काल और
निर्भयता

जब मैं अकेला था
मेरे साथ कोई नहीं था
तब मैं दुनिया में निर्भय घूमा करता था
अब मैं घर में रहता हूँ
अपने लोगों के साथ
और डरा रहता हूँ

अकेले मैं निर्भय होकर घूमता था
तारों और नक्षत्रों के लोक में
अब राजपथ के बीच
अनेक वाहनों के बीच
भयभीत रहता हूँ।

मैं अकेले घूमता था
बिना किसी उद्देश्य के
आग की चकाचौंध पैदा करती रोशनी में
अब जब कि सूरज अस्त होने को है
मैं लड़खड़ाता पूरी तरह भयभीत हूँ
मन्दिर के शून्य कक्ष में सोया
निर्भय होकर ईश्वर के अवतार का इंतजार किया
अब , इतिहास में जीते हुए
मुझे डर है
कि अवतार को विकलांग किया जाएगा

बिना बत्तियों वाली गलियाँ

बिना बत्तियों वाली गलियों में
हम इतना चल चुकें हैं कि
हम इसके आदी हो गए हैं
पूछने पर कुछ लोग कहेंगे
इन गलियों में
कभी चमकीली बत्तियाँ जला करती थीं
प्रमाण स्वरूप
आधा दर्जन खम्बे खड़े हैं
बिना बत्तियों के
हमारी आँखे
अंधकार की अभ्यस्त
हो चुकी हैं
पुरानी यादें फीकी पड़ चुकी हैं
अब हमें लगता है कि
मित्रों से मिलने वाली फीकी रोशनी की जगह
अंधेरा ही बेहतर है।

पेड़

ये पेड़ नहीं
बल्कि पंख पसारे
सदा उड़ने को खड़े पँछी हैं
ये नारियल के पेड़
पेड़ जो जम कर खड़े हैं
अपनी शाखायें फैलाए
हरतिमा बहाते फैलाव हैं
जो जमीन से स्वर्ग की ओर
प्रवाहमान हैं
ये पेड़
ये लताएँ
ये फव्वारें हैं
जो जमीन से उठ रहे हैं
पर, हम तो पृथ्वी पर जम कर खड़े हैं
और केवल जमीन से जुड़े रहते हैं
फिर भी कभी‍‍- कभार
आसमान के सपने देखतें हैं।

अनुवादः‍ बालकृष्ण पिल्लै
 

 


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