मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 

 KRITYA2007

 

पिछले कुछ महिनों ने कृत्या का आकार सिकुड़ता जा रहा है, इसके पीछे कोई और कारण नहीं, बल्कि एक बड़े आयोजन की तैयारी के कारण समय की कमी की विवशता है। कृत्या के कवितोत्सव की हम घोषणा कर ही चुके हैं। अब हम उसके काफी करीब पहुँच चुके हैं, और हमारी व्यस्तता बढ़ती जारही है। सामान्यतया हम सोचते हैं कि आज के जमाने में कविता की जिन्दगी में कोई जगह ही नहीं, किन्तु इस काव्योत्सव में अन्य लोगों का सहयोग देख कर हमें ऐसा नहीं रहा है।
देश विदेश के अनेक कवि अपने खर्चे से इस उत्सव में जिस उत्साह से भाग लेने आरहे हैं, वह कविता की शक्ति में हमारे विश्वास को दृढ़ करने के लिए पर्याप्त है। न जाने कितने मित्रों ने हमें मदद दी। समीर लाल, सुमा वी एस ने विदेश से आर्थिक मदद भेजी तो सुमन कुमार घई जी ने उत्सव को हिन्दी में प्रस्तुत करवाते हुए अपनी पत्रिका में स्थान दिया। इसी तरह न जाने कितने जाने- अनजाने मित्र कृत्या के कवितोत्सव में भागीदार बन गए हैं। अतः मुझे लगने लगा है कि यह उत्सव कृत्या का नहीं बल्कि हम सब कविता से स्नेह रखने वालों का है।
यहीं विश्वास इस अति व्यस्त , बेहद थका देने वाले वक्त में भी मुझे शक्ति दे रहा है।

और »

 

 

जीवन ओर मृत्यु के बीच झूलती
वे भी जीती हैं अपना अर्थ
वे बहुत सारी मिलकर !क होती हैं
वे मिलकर एक होने से नहीं हिचकिचातीं
उन्हें अलग अलग करके नहीं
पूरी एक कविता की तरह पढ़ें
और कभी उनके पास जाएँ
तो इतनी कृपा करें
उन पर अपना कोई
शीर्षक न चिपकाएँ।

भगवत रावत 
हवा चली
धूप खिली
मैंने उड़ाई
चार पतंगे

लाल पतंग
फूलदार पेड़ की
फुनगी पर जा बैठी
फूल बन खिर पड़ीं

हरी पतंग
इन्द्रधनुषी
धूल पहन
बरसने लगी

के सच्चिदानन्दन

आँखे बड़ी बड़ी
बहुत पास
दंत पंक्ति उनसे भी बड़ी
पूर्ण स्मित हास
इतनी दूर से
इतने पास
गर्म जोशी सब कुछ बाँट लेने की
सलेटी बादलों में उजास

इस खिड़की को खुला रहने दो
झमाझम बारीश है
बेखबर लहराती
समुद्री हवा अनायास।

अनूप सेठी
और »

 

मन्योशु' में बड़ी तादाद में कविताएँ महिलाओं की हैं-किसी भी देश के इतिहास में किसी युग विशेष में इतनी बड़ी तादाद में सृजन में महिलाओं की भागीदारी मुश्किल से ही मिलेगी। 'मन्योशु' में कुछेक निपुण कवयित्रियों की कविताएँ अत्यंत उत्कृष्ट कोटि की हैँ। इससे प्रकट होता है कि आरंभिक जापानी साहित्य के विकास में महिलाओं की महती भूमिका रही है। राजकुमारी नुकाता, महिषी ओनो सकानोउए, महिषी कासा, सानु नो ओतोकामी, सानु चिगामी की कविताओं में प्रेम की विभिन्न मनोदशाओं, उमंग, उत्साह, क्रोध, आवेग, वियोग की पीड़ा, आकांक्षा आदि की विभिन्न रूपों में अभिव्यक्ति हुई है-सीधी-सपाट भाषा में भी, प्राकृतिक बिम्बों के माध्यम से भी और ऐन्द्रिय मांसल रूपों में भी। एक ओर प्राकृतिक दृश्यों और प्रेम के भावों को परस्पर अनुस्यूत करती हुई कविताएँ हैं तो दूसरी ओर प्रेम की तीव्र भाव-प्रवण अनुभूतियों, उनकी सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक बारीकियों को उद्घाटित करती हुई प्रत्यक्ष अभिव्यक्तियाँ हैँ। पर यह नितांत भोगवाद और दैहिक विषयासक्ति का संसार नहीं है। यह सूक्ष्म, गूढ़ और सुकोमल भावों का संसार है। श्रृंगारिक भावों के संयोग और वियोग दोनों रूपों की अभिव्यक्ति 'मन्योशु' में व्यापक रूप से विद्यमान है।
 ....और »  

 

बिना बत्तियों वाली गलियाँ

बिना बत्तियों वाली गलियों में
हम इतना चल चुकें हैं कि
हम इसके आदी हो गए हैं
पूछने पर कुछ लोग कहेंगे
इन गलियों में
कभी चमकीली बत्तियाँ जला करती थीं
प्रमाण स्वरूप
आधा दर्जन खम्बे खड़े हैं
बिना बत्तियों के
हमारी आँखे
अंधकार की अभ्यस्त
हो चुकी हैं
पुरानी यादें फीकी पड़ चुकी हैं
अब हमें लगता है कि
मित्रों से मिलने वाली फीकी रोशनी की जगह
अंधेरा ही बेहतर है।
**

ये पेड़ नहीं
बल्कि पंख पसारे
सदा उड़ने को खड़े पँछी हैं
ये नारियल के पेड़
पेड़ जो जम कर खड़े हैं
अपनी शाखायें फैलाए
हरतिमा बहाते फैलाव हैं
जो जमीन से स्वर्ग की ओर
प्रवाहमान हैं

ये पेड़
ये लताएँ
ये फव्वारें हैं
जो जमीन से उठ रहे हैं
पर, हम तो पृथ्वी पर जम कर खड़े हैं
और केवल जमीन से जुड़े रहते हैं
फिर भी कभी‍‍- कभार
आसमान के सपने देखतें हैं।
जी एस शिवरुद्रप्पा

और »  

 

***
पूरब की हरी पहाड़ियों के पीछे
झाँक उठी प्रभात की अरुणिम आभा
मंद, मधुर, दीप्ति से झलकती
देखता हूँ पीछे मुड़कर आकाश को
जहाँ धुँधला हो ढलता जाता है चाँद।

*
हिकुमा के मैदान में
फूल उठे हैं 'हागिजोकु'
उनके बीच से निकलोगी जब
तुम्हारी यात्रा के प्रमाण-स्वरूप
रंग जाएँगे तुम्हारे वस्त्र सुगंध भरे उन फूलों के रंग में।

*
 ओ मेरे प्रिय,
बीत चुके हैं कितने दिन
तुम्हारे चले जाने के बाद
सोचती हूँ मैं ही चल कर खोजूँ तुम्हें
नहीं रह सकती और अकेली अब मैं!

**
कुदारा के मैदान में
होगिजोकु की
मुरझाई डालों पर
वसंत के आगमन की प्रतीक्षा में-
उगुइसु ने गीत गाया है क्या?

'मान्योशु' जापानी कविता

और »

VOL - III/ PART 1i
(जुलाई-2007 )

संपादक :  रति सक्सेना


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए