जसबीर चावला की कविता

तमाम थका होने के बावजूद

तमाम थका होने के बावजूद दोस्त!
अगर तुम्हारी आवाज देख पाया ना
तो हाथ जरूर हिलाऊँगा।

खूनी पेचिशों के बाद भी इतनी
शक्ति तो बची हैः
सूरज डूब जाये डूबता है तो
पहाड़ के रंगों को ड़ूबने नहीं दूँगा
रंगों के मंत्रों को गुरुब होने नहीं दूँगा।

हाथ तो हिलाऊँगा जरूर कि
1.10 अरब के बीच कोई दशरथ माँझी
24 साल पहाड़ काटते बूढ़ा नहीं होता
रास्ता बनाते जैसे रक्त।

रक्त कहाँ से आया है, कब आया है
कुछ नहीं दिखा
खत कहाँ से आया है, कब आया है
कुछ नहीं लिखा

रक्त आया है और आई है आवाज
देख रहा हूँ
कोई नाम-पता-ठिकाना नहीं
सिर्फ मुद्दे हैं.....।

गोली मार लेनी चाहिए खुद को?
जैसे सरहद-तने जवान ने मारी
जिसे छूट्टी नहीं मिली
देख आये अपने खेत और दरख्त

पता नहीं कैसे हैं खेत और दरख्त
पता ही नहीं कैसे हैं ईरोम शर्मिला
नाम भी नहीं सुना
जो बैठे हैं 2 नवंबर 2000 से उपवास पर,
क्यों बैठा है '58 सशस्त्र बल कानून
गुलामी काटती 25 लाख मणिपुरी आबादी पर!

1.10. अरब की आजादी से हाथ हिलाऊँगा
लिख कविता पहल दिलाऊँगा।
ज्ञानरंजन तीन महीने बाद लौटेंगे
विदेश जाने से पहले खत था
और यह खत है तुम्हारा दोस्त!
दिखाऊँगा उन्हें लिखकर कविता
'पहल' से ही एक पहल हो!

पर तीन महीने? और उपवास..... और प्रवास.....?
नहीं, नहीं
घर के पलड़े धकेलने से पहले
दिखनी चाहिये यह आवाज
तमाम थके होने के बावजूद
इतनी शक्ति बची होगी कि वे हिलायेंगे हाथ
आवाज देखकर।

कहूँगा कि 795 सांसद और 4120 विधायक
बेच रहे मिलकर और अकेले-अकेले भी
जहर पिलाने का लायसेंस
सबका मालिक एक की तर्ज पर
'सबका ठंढा एक' चलाने वाले को

कहूँगा कि हजारों पद रिक्त हैं
पंचायत खाली पड़े हैं
बच्चे बिक रहे विद्यालय खाली पड़े हैं

कहूँगा कि बीसी का सपना, हजरिया किताब लिख
राष्ट्रपति पूरा नहीं कर पायेंगे- ऐसे पूरा नहीं होगा
न पूरा होगा पृथ्वी-त्रिशूलों की मार-दूरी बढ़ा
विकास दर का लेखा,
जोखेगा मजूर-जो तय पाये
मेहनत से क्या मिला
भरपेट खाया-पीया तो कितना बच जाये?
ई नां कि हड़पी जमीन किस दर संपत्ति बन जाये!
बंबईया सूचक कितना चढ़ जाये।

कहूँगा कि दो हजार बीस का सपना
कागद-मसि नहीं
नंगी आँखों देखा जाये
जो कि प्यार जीते, जी सके जग में
आदमी का खून कोई आदमी न पी पाये

कहूँगा कि आई है आवाज, सवाल नहीं (सवाल तो सौदा हैं!)
दिखती है आवाज

शक्ति-भर हाथ हिलायें
आवाज दब भी गई
दूर से दिखेगा हाथ
करोड़ों आँखों
दूर तक सुनेगी आवाज
दू-गू-ने हाथों

तमाम थका होने के बावजूद
इतनी शक्ति जो बची होगी
इतने हाथ उठा पायेंगे दबी कुचली आवाज
हिलायेंगे तो
दिखने लगेगी आवाज एक अरब जनता की
भारतवर्ष के पास तमाम थका होने के बावजूद
एक आवाज होगी।

( जसबीर चावला की अन्य कविताएँ)


भगवत रावत की कविता

बिना शीर्षक की कविताएँ


जिनका नहीं होता कोई शीर्षक
कोई धनी धोरी
या कोई कुलनाम
वे भी होती है कविताएँ
उनके भीतर भी धड़कता है दिल
उनकी रेखाओं से भी
बनता है कोई न कोई नक्शा

जीवन ओर मृत्यु के बीच झूलती
वे भी जीती हैं अपना अर्थ
वे बहुत सारी मिलकर एक होती हैं
वे मिलकर एक होने से नहीं हिचकिचातीं
उन्हें अलग- अलग करके नहीं
पूरी एक कविता की तरह पढ़ें
और कभी उनके पास जाएँ
तो इतनी कृपा करें
उन पर अपना कोई
शीर्षक न चिपकाएँ।

( भगवत रावत अन्य कविताएँ )


के सच्चिदानन्दन की कविता

पतंगे

हवा चली
धूप खिली
मैंने उड़ाई
चार पतंगे

लाल पतंग
फूलदार पेड़ की
फुनगी पर जा बैठी
फूल बन खिर पड़ीं

हरी पतंग
इन्द्रधनुषी
धूल पहन
बरसने लगी

नीली पतंग
अनन्तता में
ईश्वर की
पताका बन गई

सफेद पतंग पर
शैतान की लिखी
इबारत को
पढ़ने में ही
खर्च हो गई
मेरी बाकी
जिन्दगी।

( के सच्चिदानन्दन की अन्य कविताएँ )


अनूप सेठी की कविता

एक


ड्यूटियाँ बहुत बजा लीं
गृहस्थी और तुनक मिजाजी चलती रही
मौसम की तरह आओ बैठों
दोस्ती के दिनों की तरह
जरा देर और
फिर एक एक कप चाय के साथ और
फिर किताबों की बात
फिर कविता की बात
फिर संगीत का साथ

भरी बरसात
पानी से ऊब चूब बादल
अब बरसे तब बरसे
भिगो जाएँ धरती आकाश।

दो

आँखे बड़ी- बड़ी
बहुत पास
दंत पंक्ति उनसे भी बड़ी
पूर्ण स्मित हास
इतनी दूर से
इतने पास
गर्म जोशी सब कुछ बाँट लेने की
सलेटी बादलों में उजास

इस खिड़की को खुला रहने दो
झमाझम बारीश है
बेखबर लहराती
समुद्री हवा अनायास।

( अनूप सेठी की अन्य कविताएँ  )


प्रयाग शुक्ल की कविता

कहा कुछ भिखारिन ने

लाल से होने को थी बत्ती हरी
कहा कुछ भिखारिन ने
शब्द सुन नहीं पड़ी
लेकिन यह साफ लगा
भीख नहीं माँगी थी
और कुछ कहा था।

और कुछ कहा था चौंक कर सोचा
दिन भर भीख ही तो
नहीं माँगती भिखारिन
करती तो होगी कुछ और भी!

वही सुन नहीं पड़ा।

(प्रयाग शुक्ल की अन्य कविताएँ )


मोहन कुमार डहेरिया की कविता

तुम्हारी आवाज

अपनी बात के जवाब में
सुनी है अभी-अभी मैंने जो आवाज
विश्वास नहीं होता
यह तुम्हारी ही आवाज है

ऐसी तो नहीं थी यह
सुनाई देती थी इसके अंदर से असंख्य चूड़ियों के टकराने की खनक
गूँजता मुँह से निकलते ही भोर में टपकते महुए का सँगीत
नोकें थी इसमें खूब लंबी पर जैसे दूबों की नोक
शहतूत की तरह लगती गाड़ी कत्थई
भरी हुई एक प्यारी अज्ञानता के रस से डबाडब

आज सुनी लेकिन जो आवाज
छटपटाकर गिरने लगी मेरे चारों तरफ उड़ती खुशफहमी की रंग-बिरंगी तितलियाँ

तर्को की नींव पर नहीं खड़ी है यह
एक भी तेजस्वी शब्द नहीं है इसमें
वाक्यों की संरचना भी जर्जर
निकल रही पर इस आवाज से ऐसी ध्वनि
वृंदावन की धरती पर किसी गोपी ने
जड़ दिया है फिर किसी उद्धव के मुँह से निःसृत होते हुए ज्ञान के मुँह पर तमाचा

इस आवाज के उजाले में देखा मैंने
अपने जीवन के नेपथ्य में रेंगते भय, लालच तथा दुविधा के कीड़े
और साहस का एक बौना शिखर
यकीनन इसके प्रहार से
झनझना उठे मेरी चेतना के सारे तार
कर सका पर स्वीकार इस आवाज को साफ-सुथरी ग्लानि के साथ
निकलेगा इसी के अंदर से वह रास्ता
जिससे गुजरकर
हारते-हारते भी जीत जाता है प्रेम का संग्राम कोई योद्धा।

( मोहन कुमार डहेरिया की अन्य कविताएँ)
 


शशि भूषण सिंह की कविता

बहालेन* के लिए एक कविता

जैसे अभी-अभी पड़ी हो मार
या किसी ने लगाई हो कड़ी फटकार
सूखकर आँसुओं की बूँदें गालों पर
जर्द हो आया हो जैसे
किसी मासूम का शिशुमुख
बहालेन,
कुछ ऐसा ही लगता रहा है मुझे
जब-जब करती हो अपना
हाले-दिल बयाँ।

बदलता है क्रम बातों का
जैसे कोई बाल-सखा
मिल गया हो बरसों बाद
तुम साथ बैठ बतियाने लगती हो
करती हो चर्चा उपलब्धियों की
एक मासूम खिल-खिल हँसी
छलक आया हो जैसे
किसी शिशुमुख पर अनायास
बहालेन,
कुछ ऐसा ही लगता रहा है मुझे
जब-जब रखती हो अपने
सपनों को सामने।

क्या हुआ जो जीती हो अनाथों-सा जीवन
कुदाहातु के निपट गँवार माहौल में
झारखंड के वन-ग्राम में
क्या हुआ जो कुछ और नहीं है तुम्हारे पास
सिवाय चंद किताबों और सपनों के
तुम्हारे होठों की कँपन
कँपा देती है क्षण भर को
किंतु दूसरे ही क्षण
करवट लेते
तुम्हारे सीने में सोये सपने
यकीन दिला जाते हैं -
"सत्य की बेदी बड़ी सख्त है
किंतु सक्षम नहीं
कि तुम्हारा सीना चाक कर सके
जहाँ पलते हैं तुम्हारे सपने
मजबूत इरादों के बीच।"

* चाईबासा (झारखंड) के समीप एक छोटे-से गाँव 'कुदाहातु' की ग्यारह वर्षीया अनाथ आदिवासी लड़की


( शशि भूषण सिंह  की अन्य कविताएँ)


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