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कभी-
कभी मुझे लगता है कि कृत्या नाम अपने में सार्थक है, वैदिक साहित्य
में कृत्या ऐसी शब्दशक्ति थी, जिसका प्रयोग अपनी रक्षा के लिए
शत्रु पर घात करने के लिए भी किया जाता था। आत्मरक्षात्मक
कार्यवाही विपक्ष के लिए घातक भी हो सकती है, यही कारण है कि
पौराणिक युग तक आते- आते यह शब्द
पूर्णतया घातक जीवन्त शक्ति में परिवर्तित हो गया। पौराणिक साहित्य
आम आदमी के लिए समीपस्थ था, अतः कृत्या शब्द अपने नकारात्मक रूप
में अधिक प्रचलित रहा।
कविता नकारात्मकता का सकारात्मक रूप है, यह जिन्दगी और उससे परे के
नकारात्मक अर्थों को सार्थक बनाने की प्रक्रिया है। जब यह
प्रक्रिया सतत होती हुई घनीभूत हो जाती है तो कृत्या बन जाती है
जिन्दगी कविता के कृत्या बनने की प्रक्रिया है। सभंवतः कृत्या के
नाम पर जो हो रहा है, उसमे मेरी भूमिका मात्र अनुकर्ता की है, मै
किसी अनजानी प्रेरणा के पश्चातल में कुछ करने का अभिनय मात्र करती
हूँ, घटनाएँ स्वयं संघटित होती जाती हैं।
कृत्या2007 का निर्णय फरवरी महिने से ही
जड़े पकड़ने लगा था, किन्तु लक्ष्य और मार्ग दोनो अस्पष्ट थे।
अप्रेल मास तक यही स्थिति थी, लक्ष्य दिखने लगा था, किन्तु लक्ष्य
तक पहुँचने का मार्ग अस्पष्ट था। अप्रेल के महिने में जब केरल में
तापस अपने भीषण में होता है, मेरे मन के भीतर बेहद उमस अकबका रही
थी। कृत्या ट्रस्ट बन गया, ट्रस्टी भी थे, किन्तु उसके कोष में वही
पैसा था, जो मैंने अपनी जेब से डाला था। मेरे मन में अनेक उपाय थे,
और आशा थी कि कोई ना कोई उपाय सार्थक होगा ही। किन्तु अप्रेल महिने
के आते- आते सारे उपाय निरर्थक लगने
लगे। मैं बैंकों के पास विज्ञापन के लिए गई तो यह कहा गया कि कविता
का व्यापारिक उद्देश्य क्या होगा? यानी कि यदि फिल्म फेस्टीवल
होता, साड़ी कपड़ों का मेला होता, तो लोगों की भीड़ तो उमड़ती, कविता
की क्या स्थति है समाज में, जो उसके लिए विज्ञापन कोष हल्का किया
जाये? मैंने केरल की सड़को पर आभूषण की दूकानो के बड़े- बड़े होर्डिग्स
देखे थे, एक एक होर्डिंग के लिए उन्होंने 50.000 तक खर्च किया
होगा, कृत्या को यदि एक होर्डिंग का पैसा भी मिल जाए तो कितना संबल
मिलेगा, यही सोच कर मैंने बड़ी- बड़ी
आभूषण की दूकानों के मालिकों के नाम खत लिखे, न जाने कितनी
संस्थाओं के दरवाजे खटखटाए... सब बन्द..
मैं बेहद निराश सी आतप में पत्रविहीन दरख्तों के बीच में से गुजर
रही थी.. कि कुछ लाल- लाल कोंपले दिखाई
दी.. मुझे याद आया कि पिछली रात को कुछ मिनटों के लिए बरसात हुई
थी. यानी कि एक बौछार दरख्तो को फिर से जीवन दे जाती है... अब मैं
फिर से आशान्वित थी। अगले महिने यूनीवर्सिटी बन्द , इस अवधि का सही
उपयोग किया जाना चाहिए।

मई के महिने में मैंने अपने सहयोगी ट्रस्टियों के साथ एक अभियान सा
शुरु किया.. काव्योत्सव के लिए महत्वपूर्ण हस्तियों से सम्पर्क, और
धन की व्यवस्था करना ही हमारा उद्देश्य था। मैं, मोहम्मद कुंजुर
मेत्त्तरु जी और बालकृष्णनायर जी रोजाना किसी ना किसी योजना को
लेकर निकलते.. महिना आधा बीत गया.. हमे यह तो पता चल गया था कि
हमारे अतिथि कौन- कौन होंगे, किंतु यह पता नहीं पड़ पा रहा था कि
आर्थिक स्थिति क्या होगी। उन्ही दिनों मेरी सासू जी बड़ी
अस्वस्थावस्था में लायी गईं और अस्पताल में भर्ती करवाईं गईं। अब
मैं कृत्या और अस्पताल के बीच झूल रही थी । इस वक्त तक विदेशी
कवियों की स्थिति स्पष्ट हो गई थी, किन्तु कृत्या का कोष बिल्कुल
खाली। करीब- करीब सभी जगहों से नकारात्मक जवाब मिल गया था, तभी ICCR
से खत आया, बस वही हमारी आशा का संबल बना। इस बार जब मैं वापिस
कालडि पहुँची तो दरख्त हरहरा उठे थे, कृत्या भी संभवतः।
कोई भी कार्य समस्याओं के बिना नहीं हो सकता हैं। कृत्या के जनरल
सैकेट्री मेत्तरु जी ने कुछ दिनों की मोहलत माँगी, क्यों कि उन्हे
कुछ मकान बदलना था। मैं अकेली ही खतोकिताबत करती रही, यहाँ पर कुछ
लोग जुड़े, श्यामला नायर ने लेखन का बीड़ा उठाया, सुमा और जयश्री भी
मदद कर रहीं थी। आर्गो स्पीयर भी अपने सुझाव देते जा रहे थे, लेकिन
मुझे लग रहा था कि मेरा काम बिखरता जा रहा है। मुझे एक सैकेट्री की
जरूरत थी, किन्तु कोई सक्षम व्यक्ति मिल ही नहीं पा रहा था। अन्ततः
एक आशा दिखाई दी, मेरा एक छात्र जिसने पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा किया
था, खाली बैठा था, उसकी क्षमता के बारे में मुझे जानकारी तो नहीं
थी पर लगा कि वह काम कर सकता हैं।, समस्या सिर्फ यही थी कि वह केरल
के उत्तर में रहता था,
अतः उसे काम करने के लिए त्रिवेन्द्रम आना
पड़ेगा और उसके रहने की व्यवस्था भी करनी पड़ेगी। उसने मुझे सहायता
की आशा दी। पहले तो मैंने कालडि से ही काम करने की कोशिश की,
किन्तु लगा कि दो जगहों से काम करना आसान नहीं है। मैंने लम्बी
छुट्टी लेकर त्रिवेन्द्रम में आकर कृत्या के लिए जम कर काम करने की
ठानी। प्रसून जिसने मेरा सहायक होना स्वीकारा था, किसी परीक्षा
की तैयारी कर रहा था. जैसे ही उसने अपनी परीक्षा दी, हम दोनों
त्रिवेन्द्रम के लिए रवाना हुए। मेत्तरु जी ने आश्वासन दिया था कि
जैसे ही मैं त्रिवेन्द्रम में आऊँगी, वे पूरी तरह से मेरे साथ
कार्य संलग्न होंगे। किन्तु अभी मेरी परीक्षा पूरी नहीं हुई थी।
आते ही खबर मिली कि मेत्तरु जी को विश्व हिन्दी सम्मेलन में जाने
का न्यौता मिला है, जिसे वे नकार नहीं पा रहे थे.. मैं ने बालकृष्ण
जी की और देखा तो उन्होंने भी लाल झण्डी दिखा दी, उन्हे पारीवारिक
कार्य से बाहर जाना था। मैं अपने को बेहद असहाय पा रही थी.. उन
दोनों ने 19-20 तक बापिस आने की बात की, लेकिन तब तक अनेक इंतजाम
थे, मसलन होटल, भोजन, आमन्त्रण आदि ना जाने क्या क्या... । मेत्तरु
जी ने अपने साथियो को मेरी सहायता के लिए आमन्त्रित किया । उनमें
से डा. सनल ने काफी मदद की, लेकिन उनकी अपनी सीमाएँ थी,
वे रोजाना लम्बी यात्रा करके ही पढ़ाने जाते और काफी
देर से लौटते थे. अतः दिन में होने वाले कामों के लिए उनकी मदद
मिलनी संभव नहीं थी. फिर भी उनका सहयोग उपयोगी था। उस असहाय अवस्था
में मैं और प्रसून रोजाना सुबह निकलते और शाम तक वापिस लौटते..
छोटे- मोटे न जाने कितने काम थे। प्रसून
ने मेरे अव्यवस्थित काम को संयोजित भी किया। अब हमे हमारा लक्ष्य
दिखाई देने लगा था। इसी बीच कालडी में दर्शन के प्रोफेसर शशीधरन जी
ने आश्वासन दिया कि वे समय से पहले आकर सब संभाल लेंगे। रवीन्द्रन
नायर जी ने प्रेस रिलीज में बेहद मदद की राजगोपाल भी आ कर जुड़े...।
समस्याए मिट रहीं थीं और नई समस्याएं जन्म ले रही थीं। जैसे कि
हड़ताल की खबर.. आदि आदि.. इस पूरे संघर्ष में एक व्यक्ति जो हमेशा
मेरे साथ रहा, निशब्द सहायता करता रहा, वह और कोई नहीं मेरे पति
प्रदीप थे। प्रदीप को कविता से
उतनी ही अरुचि है, जितनी कि मुझे रुचि, लेकिन वे जब देखते कि मैं
अकेली पड़ रहीं हूँ.. चिड़चिड़ा रही हूँ वे चुपचाप सारथी बन जाते।
मुझे मालूम है उनके लिए यह काम आसान नहीं था।
बस इसी तरह काव्योत्सव का वक्त करीब आ गया..
18 को पहले विदेशी कवि आर्गों आए.यहीं
पर हमे अपने तैयारी में पहली गलती दिखाई दी, हमने कवियों के फोटो
नहीं माँगे थे, जिससे उन्हे पहचानने में देरी ना हो। हमने उसे
सुधारने में भी देरी नहीं की। नेट से फोटो ले लिए गए। भारतीय
कवियों में सबसे पहले आने वाले अग्निशेखर और क्षमा कौल थे, उनके
आने से हमे बड़ा सम्बल मिला।
इन दिनों दो युवा साथी अपनी धुन में काम कर रहे थे, और यह काम
कृत्या से ही जुड़ा हुआ था, ये थे अनुपमा और पाल। अनुपमा और पाल.
दोनों काफी दिनों से मेहनत के साथ कंपेयरिंग की तैयारी कर रहे थे।
वे कभी सुबह- सुबह मेरे घर आते ओर बच्चों जैसी रिहर्सल करने लगते,
तो कभी नेट खोल कर कवियों का बायोडाटा इकट्ठा करते। कृत्या
कार्यक्रम के एक एक अंश को बारीकी समझने की कोशिश करते।
19 को प्रेस रिलीज था। इस वक्त तक हमारे
ट्रस्टी लौट आए थे। प्रेस रिलीज ठीक ठाक हो गया, कविता में प्रेस
को ज्यादा विश्वास आया भी नहीं। मेत्तरु साहब ने बड़ी तत्परता से
अपना काम संभाला , और रेस्ट हाउस जहाँ पर ज्यादातर लोग टिके थे,
अपना दफ्तर खोल लिया।
20 को रात के 12
बजे तक कवियों का आगमन होता रहा। सुबह 6
बजे से फिर आवाजाही। रात को गवर्नर के आफीस से फोन आया कि स्टेज तक
पहुँचने वाली सीढ़ियाँ काफी ऊँची हैं, उन्होने दूसरी सीढ़ी के इंतजाम
की बात की। पिछली रात वे अपनी समस्या रख चुके थे, किन्तु सारे दिन
में सीढ़ी तैयार नहीं हो पाई। केरल में मार्क्सवाद ने कारीगरो-
मजदूरों की सहायता तो की है किन्तु उन्हे काहिल बनाने में भी कोई
कसर नहीं छोड़ी। शलभा जो कृत्या की ट्रस्टी है और पेशे से
आर्कीटेक्ट है, ने कमान संभाली और
सीढ़ियों का इंतजाम करने चल पड़ी। इस वक्त रात के
9 बज रहे थे। शलभा , सनल और प्रसून देर रात तक सीढ़ी
का इंतजाम करते रहे, कुछ नहीं मिला तो अन्ततः भोजन के लिए आईं
मेजों को बड़ी खूबसूरती कालीनों से ढ़ाँक कर सीढ़ी तैयार की गई, और
मेजों को किनारों पर रख कर हाथ पकड़ने का साधन बनाया।
मुझे विदेशी और भारतीय कवियों से मिलने जाना था। देर होने से कुछ
वरिष्ठ कवि नाराज भी हो गए। रात को लौटी तो अगले दिन के सामान
बटोरने लगी, तभी पता चला कि ट्रस्ट जिस रबर स्टेम्प को लगाने से ही
चेक पास हो सकता था, वह कहीं गुम हो गया। प्रसून दिन- रात मेहनत कर
रहा था, शायद वही कहीं रख कर भूल गया। मैं पूरी रात चिन्ता मं जगती
रही कि अगले दिन जब चैक दिए जाएंगे तो क्या होगा? सुबह तक मेरी
गर्दन में बेहद दर्द था, लेकिन मेत्तर जी ने अपने मित्र , जो सिनेट
मेम्बर थे, यह बैंक में यह कहलवा दिया कि चैक बाउंस ना हो,
कार्यक्रम खत्म होते ही स्टेम्प बनवा कर लगवा दिया जाएगा।
मेरे दामाद डा विवेक भी आए थे, बजो बोइंग कम्पनी के वाइस
प्रेसीडेण्ट हैं, उन्होंने
एकाउण्टेण्ट का काम संभाल लिया , और हम सब तैयार थे।
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21.7.2007, मैं तैयार होकर घर से निकल ही रहीं थी कि गेस्ट हाउस से
फोन आया कि आइरलैण्ड की लियाना को रात भर उलटी होती रही है, उसे
डाक्टर की जरूरत है, कृत्या की सेना कोई बहुत बड़ी तो थी नहीं, हर
व्यक्ति 4-4 आदमियों के हिस्से का काम
कर रहा था। गवर्नर उद्घाटन के लिए आने वाले थे, यानी कि प्रोटोकाल
का सही अनुपालन। अब यह समस्या.. मेत्तरु साहब मुस्दैदी से काम कर
रहे थे.. और उत्तर से आए मित्रों की सहायता भी मिलनी शुरू हो गई
थी। मैं समझ नहीं पा रही थी सभाभवन जाऊँ या लियाना के पास.. लेकिन
तभी पता चला कि अग्निशेखर जी ने लियाना को डाक्टर के पास लेजाने की
कमान संभाल ली है।
सभा भवन पहुँची तो पाल और अनुपमा अपने- अपने काम में लगे हुए थे।
ठीक 10 बजे गवर्नर की सवारी, उन से कुछ
मिनिट पहले ही कवयित्री राजकुमारी गौरी लक्ष्मी बाई पधारी
थी,स्टेज पर चढ़ते ही राष्ट्रगीत और फिर प्रार्थना , दीप प्रज्वलन
के बाद विदेशी प्रतिभागी के प्रतिनिधि के रूप में आर्गों स्पीयर का
भाषण हुआ। इस भाषण ने कृत्या का विदेशियों के बीच स्थान जाहिर
किया। राजकुमारी जी ने भाषण के स्थान पर एक खूबसूरत कविता पढ़ी " इन
माई साइलेंस" जो उन्होंने अपने मामा ( महाराजा तिरुनाल )की मृत्यु
के बाद लिखी थी ( केरल में मातृसत्तात्मक जीवन पद्धत्ति होने के
कारण राजकुमारी जी मामा की सही मायने में उत्तराधिकारी हैं ) ।
कविता के उपरान्त सभी दर्शकों दिल भर आया था। गर्वरनर ने भी सधे
भाषण में भारतीय कविता के बारे में बोलते हुए अय्यप्पा पणिक्कर के
अनुदान और कृत्या के कार्य का उल्लेख किया। आपने अपने भाषण को छोटी
सी उर्दू कविता साथ समाप्त किया। आपने कृत्या द्वारा किए गए
कार्यों की सराहना की और साहित्य के स्थान को स्वीकारा। मोहम्मद
कुंजर मेत्तर जी ने धन्यवाद दिया।
55 मिनिट में सुखद शुभारंभ हो
गया।
कुछ समय के बाद पहले सत्र का शुभारंभ हुआ । यह सत्र विदेशी कविता
का था। सबसे पहले ईरान / अमेरिका की कवयित्री महनाज ने अपनी केरल
पर लिखी कविता पढ़ी। इस तरह के काव्योत्सवों में कवि अपनी चुनी हुई
कविताओं में से श्रेष्ठतम कविता पढ़ते हैं
,जिससे काव्यपाठ सधा रहे। किन्तु महनाज की अपनी रुची थी।
दूसरे कवि थे, इटली के प्रसिद्ध कवि मेसिमों सेनाली ने कविता पढ़ी।
मेसिमो ने कहा कि कविता झूठों का तारतम्य नहीं है, बल्कि मन की एक
अवस्था है, जिसमें सभी कलाओं का समावेश है। मेसिमों की छोटी- छोटी
कविताओं ने मन मोह लिया। इसके बाद मणि राव जो हांककाँग में बसी
हैं, ने कविता पढ़ी। मणी ने कहा कि मुझे विश्व के अनेक भागों में
कविता पढ़ने का मौका मिला है किन्तु भारत में मुझे पहली बार बुलाया
गया है। इसके बाद आईं क्रोश्चिया की लाना, लाना अपने देश की
प्रसिद्ध कवयित्री हैं। टी पी राजीवन की मित्रता के कारण वे
पत्रकारों के आकर्षण का केन्द्र रहीं। पेट्रिक काटर ने
कविताएँ पढ़ीं, जेरी मर्फी अगले कवि थे, वे आयरलेण्ड से आए थे।
उन्होंने बेहद अलग ही लहजे में दो कविताएं पढ़ी। इन दोनों कवियों की
प्रस्तुति में भिन्नता थी। इसके बाद इटली के राबर्टों पिपरनों ने
अपनी कविता पढ़ीं, जिसमें कविता और शब्दों के प्रति एक कवि की अन्तर
दृष्टि थी, उन्होंने अपनी कविताऔं के साथ अपने देश के अन्य कवियों
की कविताएँ भी थीं। कोरिया के ताए हान की कविताएं भी अंग्रेजी में
थीं, किन्तु उनके लहजे के कारण स्वाद ही अलग था। फिर वियेना के
पीटर वाघ आये जिन्होंने अपनी ध्वनि कविता से कविता के शब्द क्षेत्र
में दखल जरूर दिया। पीटर हमेशा ही आकर्षण का केन्द्र रहे। डावर
सलात की कविताएँ अगले पड़ाव में थीं। आर्गों ने अपनी वेब पत्रिका के
नाम पर बोट नामक कविता पढ़ी। आइरिश कवि बिली रामसेल ऐसे कवि थे
जिन्हें अपनी कविताएँ मुँहजबानी याद थी। अन्तिम कविता कोरियान
आर्कीटेक्ट शीन की थी, जो उन्होंने अपनी भाषा में पढ़ी।

भोजन के बाद का सेशन शीरीन के गाने से शुरु हुआ, वे अच्छी गायिका
जरूर हैं, किन्तु उनके बालिवुड हालीवुड प्रेम ने कुछ लोगों को
निराश जरूर किया।
पहली कविता चन्द्रकान्त देवताले जी ने "यमराज की दिशा'"
पढ़ी। अन्य महात्वपूर्ण कवि थे, कलकत्ता के उत्पल बसु, पाण्डिच्चेरि
के अजु मुखोपाध्याय , कर्णाटक की एम आर कमला, मुम्बई से विजय कुमार
जी और नागपुर से लोकनाथ जी, दिल्ली से अनामिका और लोकप्रिय कवि के
सच्चिदानन्दन। अन्य कवि थे मोहनकुमार, क्षना कौल, अग्निशेखर
, अजेय, श्यामला नायर, अश्विन
आदि, शाम को चाय के उपरान्त मलयालम सत्र आरंभ हुआ जिसमे ओ एन वी
कुरुप्प,के सच्चिदानन्दन,विनय चन्द्र, देशमंगलम रामकृष्ण, निखिला
नाईक , पुरुषोत्तम राव, किरण मेश्राम, जसवीर चावला, जान मैथ्यू, पी
गोपी चन्द और सुशीला, जे टी जयसिंह, श्री विद्या शिवकुमार आदि अनेक
कवि दो दिन तक कविता प्रस्तुति करते रहे।
21 की रात को कृत्या के आफीस में अनौपचारिक काव्य पाठ चला। पीटर की
ध्वनि कविता के साथ शीरीन के गाने,शशी के नाच के साथ शीन की बौद्ध
प्रार्थना।
22 की सुबह कुछ भारी दिल से शुरु हुई,
आज के दिन अय्यप्पा पणिक्कर जी की कविताओं के पाठ के साथ दिन शुरु
हुआ,अनेक कवियों ने महान कवि को कवितांजली चढ़ाई, पश्चातल में महान
कलाकार,बी डी दत्तन,डा अजेय और अन्य कलाकारों ने पणिक्कर जी की
कविताओं को आधार बना कर चित्र रचे। दिन में पुनः काव्य पाठ हुआ और
शाम को पाँच बजे मनोरंजन कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। यहाँ कविता की
प्रस्तुति की विविधता को महत्व दिया गया था। यह सबसे मनोरंजक सत्र
था। सत्र का आरंभ बौद्ध प्रार्थना से हुआ, मन्त्री एम ए बेबी ने
प्रमुख भाषण दिया, आयरलैण्ड के पैट्रिक काटर ने अध्यक्षीय भाषण
दिया, कार्यक्रम का आरंभ किया पाल और अनुपमा ने अपनी अपनी कविताओं
के साथ, इसके बाद पीटर वाघ, मणि, मेसिमो और शीरीन के साथ मलयाली
अभिनेता मुरली ने कविता की प्रस्तुति की, फिर शुरु हुआ लोक गीतों
की प्रस्तुति, कार्यक्रम का अन्त हुआ 1000 वर्ष पुरानी
नाट्यकला कूडियाट्टम के साथ।
तीसरा दिन कविता से छुटकारे का था, हम सब सबसे पहले स्पेस म्यूजियम
गये, जहाँ पर कवियों ने चाँद सितारों की दुनियाँ की सैर एक अलग
अन्दाज से की। सितारों को शब्दों में उतारने वाले कवि, यहाँ
पर आकर बड़े प्रसन्न थे। इसके उपरान्त हम लोग केरल के प्राचीन कवि
आशान के जन्मस्थान पर गए, जहाँ हमारा बड़े ही प्रेम से सत्कार हुआ।
सभी ने केरलीय भोजन का आनन्द उठाया। इटली के पिपरनो आश्चर्यचकित थे
कि इतनी सामान्य सी स्थिति में कोई कवि कैसे इतनी बड़ी क्रान्ति को
जन्म दे सकता है। महान कवि के सानिध्य को हम सभी ने महसूस किया।
अन्ततः हम लोग बोटक्लब पहुँचे और सागरी झील में नौका सवारी का
आनन्द लिया। ..यहीं पर हम सब जुदा होने की स्थिति में आ गए... को
बाजार जाना चाहता था, तो कोई घूमने..

अगले दिन तक सभी विदा हो चुके थे.. बस हम बचे थे, कृत्या के
ट्रस्टी और सहायक... रीते तम्बुओं को उखाड़ते.. पैसा चुकाते हु॓ए...
मन अजीब सा भारी था, तीन दिनों में ही जो प्यार मिला, वह संभाला
नहीं जा रहा था, जो अवसाद मिला वह भी मन रीता कर रहा था... स्थानीय
लोगों में कुछ ने मुँह बिचकाया, तो लगा कि कृत्या कुछ नया जरूर कर
गई है जो लोगों को हजम नहीं हो पा रहा है। मित्रों के मेल आने
लगे.. सभी यादों को चुभला रहे थे,
आज जब मैं इन यादों को बटोरने बैठी हूँ तो कोशिश करके भी उन यादों
को भुला नहीं पा रही हूँ... आशा यही है कि हम फिर मिलेंगे.. अगले
काव्योत्सव में ... भारत के किसी राज्य मे..
रति सक्सेना
Letters to kritya for Poetry
festival
KRITYA2007
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