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कुंवरनारायण
से लीलाधर मण्डलोई की बातचीत
लीला. म. : कुंवरजी हिन्दी और उर्दू के विभाजन को अभी गहरे से
अनुभव किया जा सकता है जबकि शुरुआत में ऐसा नहीं था। इसके पीछे
कौन-सी मानसिकता है अथवा राजनीति?
कुं. ना.: मैं समझता हूँ यह विभाजन बहुत कठिन है। राजनीति चाहे
जैसा खेल खेले। अन्ततः यह सतह का क्रिया-व्यापार है। आप पूरे
हिन्दी के विकास को देखें। उत्तर भारत में ही नहीं बहुत पहले
दक्षिण में इसकी शुरुआत हो चुकी थी। पहले हम उसे उर्दू समझते थे
लेकिन राहुलजी ने जब उसका एक संग्रह निकाला तो पहली बार मालूम हुआ
कि उसमें 80-90 फीसदी शब्द हिन्दी के थे। 10-15 मुश्किल से दक्षिण
के। तो ऐसे हमें पता चला कि दक्षिणी दक्खिनी) हिन्दी एक सशक्त भाषा
थी। अमीर खुसरो या फिर दाऊद की भाषा इसके पहले थी। तो हिन्दी के
विकास को उर्दू-ए-मौहल्ला से जोड़ना भी ठीक नहीं। हिन्दी कहीं उससे
पहले से विकसित हो रही थी। और इस परम्परा के उत्स कहीं जैन-
साहित्य में बड़े मजबूत हैं। फिर प्रेमाख्यान की परम्परा को भूलना
एक बड़ी गलती होगी। देखिए वहां मुसलमान थे जो कृष्ण काव्य लिख रहे
थे। मुझे लगता है जब कोई विलियम्स के जमाने में हिन्दुस्तानी की
बात उठी, उसी समय हिन्दी- उर्दू विभाजन के विष- बीज पड़े। वो इसके
पहले नहीं थे। पहले हिन्दी बड़े स्वाभाविक ढंग से मिल-जुलकर विकसित
हो रही थी।
लीला. मं. : इसका अर्थ हुआ पहले एक गहरा इण्टीग्रेशन था जिसे
छिन्न-भिन्न करने के प्रयास अंग्रेजीराज में हुए।
कु.
ना.: हां, यह इण्टीग्रेशन तो भावनात्मक स्तर पर पहले हो चुका था।
जिसका मुख्य कारण मैं भक्तिकाल में रचे साहित्य को मानता हूँ। आज
हम उस साहित्य की अवहेलना करते हैं। और जो कोर्स में पढाया जा रहा
है वह एक अअलग दृष्टि से दी गई चीज है। यद्यपि उस साहित्य का युग
समाप्त नहीं हुआ। वह वर्तमान है। और वह हमारे ऐस्थेटिक्स और
नैतिकताबोध में वर्तमान है। हमारे व्यवहार की प्रतिक्रियाएं उन्हीं
की देन हैं। हजार साल की परम्परा का यह प्रभाव मिटनेवाला नहीं।
हमसे अधिक इसे राजनीतिज्ञ जान रहे हैं। वह हमारी कलाओं में बेहतर
ढंग से व्याप्त और समरस है।
लीला. म. : हां! कलारूपों में वह कहीं अधिक समरस है और विचार में
शायद गाँधी के पास?
कु.
ना.: सही कहा आपने। पोलैण्ड में मॉर्डन इण्डियन पोएट्री की एक
कांफ्रेंस थी। जिसमें अंग्रेजी में मेरी टॉक थी। उसमें यही कहा
मैंने कि बहुत से स्वभाव होते हैं जो अज्ञात रूप से हमारी भाषा में
रच-बस जाते हैं और हमें पता ही नहीं चलता। अगर खोलकर देखें तो पता
चलता है कि सच क्या है? एक उदाहरण मैंने गाँधी का लिया था। देखिए
पूरे गाँधी चिन्तन में जो वैष्णव संवेदनाएं हैं, उनकी एक पूरी
परम्परा है जो जैन- साहित्य से आती हुई दीख पड़ती है। मैं समझता हूँ
जैन-साहित्य पूरी तरह उपलब्ध नहीं है लेकिन वहाँ मूल्यवान सामग्री
है। गाँधी देखते थे। उनकी नैतिक क्रान्ति के बीज इसी परम्परा में
हैं।
लीला. म. : कुंवरजी हमें परम्परा के प्रभाव आधार किस तरह खोजना
चाहिए? हम कहां चूक कर रहे हैं?
कुं.
ना.: देखिए यह एक लम्बा इतिहास है। इसे छोटी-सी बातचीत में समेटा
जाना कठिन है। मैंने थोड़ा अलग विचार किया है। अभी तक अध्ययन की
प्रविधि में कुछ ऐसा रहा है कि पश्चिम के प्रभावों को पूर्व पर
आंका जाता है। लेकिन पूर्व के प्रभाव पश्चिम पर .....इस तरह से
नहीं समझा जाता। क्योंकि ऐसा करने में एक वेस्ट्रन साजिश है। देखना
चाहिए कि अलैक्जैन्ड्रिया के आस पास जो लाइब्रेरिज बनीं तो उसमें
तमाम भारतीय विद्वान्, अरबी, फारसी के विद्वान्, ग्रीक दार्शनिक
मिलते थे....अरबी तब एक सशक्त माध्यम थी.... सबके अनुवाद हुए।
उपनिषद के भी और ग्रीक दार्शनिक ग्रन्थों के। फिर अलेक्जैण्ड्रिया
के बाद कांस्टेटिनोपल केन्द्र बना। इसी वजह क्रिश्चियेनेटी में ये
सब प्रभाव गए। बाईबल के तमाम रेफरेन्सेस आपको कुरान में मिलेंगे।
तो यह एक ऐसा पेज था.....समझिए फर्स्ट सेंचुरी ए.डी. से अगर हम मान
लें तो 10वीं-11वीं सदी में, जब इस्लाम भारत आया। इसके पहले
इण्टरमिक्सिंग हो चुकी थी। आप सूफी में देखें तमाम सिद्धान्त भरे
पड़े हैं यानि भारत आने के बाद नहीं उनकी पहले से। क्रिश्चियेनेटी
में भी जो ट्रेडंस हैं, उनमें भारतीय और अन्य विचारकों के प्रभाव
हैं। देखें तो ये प्रभाव अलेक्जेण्डर के समय से बराबर चले आ रहे
हैं। और प्रभावों की ग्रहण-प्रक्रिया में एक कण्टीन्यूटी है। और
यह यूरोप के रेनेसां से पहले शुरू हो चुकी प्रक्रिया है।
अलैक्जैण्ड्रिया के पास जहां मर्चेण्ट रहते थे उनके बीच फिलॉसफर
जाकर रहा करते थे। बराबर एक आदान-प्रदान था। अलेंक्जेण्डर यूं ही
बाहर नहीं आता। उसने भारतीय समृद्धि के बारे में सुन रखा था और
अन्य समृद्धियां विचार, साहित्य व संस्कृति की।
लीला. म. : देखा जाए तो बाजार के लिए आए हुए लोगों का आना एक तरह
से ठीक रहा कि उन्होंने हमारे ज्ञान में बहुत कुछ जोड़ा बावजूद इसके
कि भौतिक रूप से हम लूटे भी गए?
कुं.
ना.: हां भारत के लिए ये अनुभव नए नहीं। हमने चाहें व्यापारी हों
अथवा आक्रमाणकारी, उनकी बराबरी की.....और अपनी ताकत को भी जाना। आज
ग्लोबल को लेकर हम बहुत चौंकते हैं। यह स्थिति तो हमेशा बनी रही।
उत्तरी भारत तो एक चौराहे की तरह रहा। जहां बाहरी लोगों का
आना-जाना बराबर रहा। हम उन प्रभावों को लेकर भी विचलित नहीं हुए।
उन्हें हमने अपनी तरह से लिया या रिजेक्ट किया। लेकिन हम नष्ट नहीं
हुए। तो वो खतरा आज भी नहीं। इतिहास गतिशील है.....सारी विधाओं
में। उनके गेन्स भी हैं और घाव भी। देखिए आर्य आए। विजेता की तरह।
उनसे युद्ध हुए। लेकिन उन्हें बसना था....बसे। लेकिन आज हमारे पास
ऐसा इतिहास नहीं है जो ठीक-ठीक बताए कि उन्होंने क्या ज्यादतियाँ
कीं। हमारे पास आज क्या बचा। वेशभूषा है....जो हजारों साल से
बरकरार है।
हमें सोचना चाहिए कि हमारा चुनाव क्या हो? हम बस ज्यादतियों की
सोचते हैं रोंस की नहीं। मुझे कहीं लगता है कि हमें एडवर्ड सईद के
चिन्तन ने जकड़ लिया है। हम एक चिन्तन से बाहर निकल के सोचने को
तैयार नहीं। हम अभी भी मानते हैं कि हम उपनिवेशवाद के गुलाम हैं।
हम यह क्यूं नहीं मानते कि हम एक सशक्त आजाद राष्ट्र हैं। यह एक
ऐतिहासिक अनुभव है। कौन-सा देश था जो उपनिवेशवाद की जकड़ में नहीं
रहा। लेकिन उन्होंने हटकर सोचना शुरू किया और अब सशक्त राष्ट्र
हैं। हमें चाहिए कि हम ग्लोबल परिस्थिति को अपने पक्ष में करें।
लीला. म. : इस दिशा में हमें संकोच और सन्देह से बाहर निकलना होगा।
कुंवरजी, लगता है ऐसा करने और उसे लांघने के अलावा कोई विकल्प
नहीं?
कुं.
ना.: हां....सच है। मैं इसे जरूरी समझता हूँ। मैं एक क्रांकीट बात
अंग्रेजी की रखता हूँ। हम सभी चिन्तित हैं कि अंग्रेजी ने हिन्दी
का स्थान ले लिया। अंग्रेज चिन्तित नहीं हैं कि भारतीय लेखकों ने
अंग्रेजी पर कब्जा कर लिया या कहें एशियाइओं ने। बताइए आज मूल
अंग्रेजी बोलनेवाले मेजॉरिटी में हैं या वो जिनकी मूल भाषा
अंग्रेजी नहीं। हम सोचते हैं, हमारी कविताओं के अच्छे अनुवाद
अंग्रेजी कर सकते हैं। अनुवादों में यह निर्भरता क्यों? हमें
आत्मनिर्भर होना पड़ेगा। आज अंग्रेजी के पाठक एशिया में बहुत हैं।
हमें उनकी (अंग्रेजी) तरफ देखने की जरूरत नहीं। ग्लोबल इम्पैक्टस
को हमें सशक्त राष्ट्र के रूप में देखना होगा। अगर हम एक पूर्व
गुलाम की तरह सोचेंगे तो उसकी छाया जीवन और साहित्य दोनों जगह
दिखेगी। वह वर्तमान बोध को दूषित करेगी। उस छाया से निकलकर खुले
ढंग से और बदले माहौल में हमें सोचना पड़ेगा तभी समकालीन कविता की
मानसिकता पर अपेक्षित प्रभाव पड़ेगा और नए परिणाम आएंगे।
लीला. म.: कुंवरजी अगर हम पूरी शताब्दी को देखें और खड़ी बोली की
यात्रा को, तो हमने तमाम स्रोतों से शक्ति अर्जित की है। इस यात्रा
को भविष्य में किस तरह जारी रखना चाहिए?
कुं.
ना.: यह यात्रा, यह प्रक्रिया रुकनी नहीं चाहिए। ग्लोबल का अर्थ
सिर्फ आर्थिक और सैनिक नहीं, अपितु सांस्कृतिक भी है। यह एक अवसर
है। आप कम्यूटर, इण्टरनेट देखिए। इतनी सूचनाएं, भाषाएं, भाषाओं का
साहित्य हम तक पहुंच रहा है तो इनका उपयोग करना चाहिए। भागने की
जरूरत नहीं है। कोई अच्छा शिक्षित देश इन जानकारियों से भागता
नहीं, उनका भरपूर इस्तेमाल करता है। साहित्य में यह इस्तेमाल अभी
होना है.....।
लीला. म. : मेरे विचार से किसी भी प्रकार की चुनौती एक अपारचुनिटी
भी होती है....?
कुं.
ना. : बिल्कुल ठीक....। बिना चुनौती के देखिए कोई क्रान्ति नहीं
होती। चुनौती फेस करने पर ही एक नई सशक्त चीज सामने आती है, समाज
में भी और साहित्य में भी....।
लीला. म. : अतीतगामी होना एक घिसा-पिटा मुहावरा मान लिया गया है।
कविता में क्लासिकीय संवेदना की बात भी आप करते हैं तो नए और
पुराने के बीच रास्ता कैसे बनेगा?
कुं.
ना.: देखिए हिन्दी का अतीत दुनिया की अन्य भाषाओं की तुलना में
बहुत बड़ा है। छोटा-मोटा अतीत नहीं है यह। अंग्रेजी की बात करो तो
5-6 सौ साल ज्यादा-से-ज्यादा। उसके पहले लैटिन में चले जाओ या
ग्रीक या बाओ में। हमारा अतीत संस्कृत काव्यधारा से अब तक का है।
उससे सन्दर्भ लेना एक बहुत विशाल खजाने को इस्तेमाल करने की तरह
है। जिसकी सोच और समझ के लिए, हमें लगता है नए सिरे से तैयार होना
पड़ेगा। कहीं से थोड़ा- सा उठा लेना भारतीयता नहीं है। उसे अपनी
कविता से सघन रूप से, पूरी परम्परा से जोड़ना होगा। आज में उसे शमिल
करना होगा तभी वह समृद्ध होगी और भारतीयता भी।
लीला. म. : कुंवरजी आपने कदाचित् इसलिए मिथक से अपनी कविता को
समृद्ध किया। अर्थात् आपका संग्रह 'आत्मजयी'।
कुं.
ना.: हां, मैंने कठोपनिषद को आधार बनाया या कहें वहाँ से मिथक
उठाया। मिथक के बारे में मुझे एक बात लगी कि और दूसरी जगह जैसे
ग्रीक माइथालॉजी में मिथक इतिहास की तरह हैं लेकिन हमारे यहां आज
भी जीवित हैं। कई बार लगता है यथार्थ से अधिक हमारे यहाँ मिथक
जीवित हैं। और वे भावभूमि को ही नहीं, यथार्थ जीवन जो प्रभावित
करते हैं- कभी अच्छे के लिए, कभी बुरे के लिए। यह एक चैलेंज है कि
मिथक जो जीवित हैं उनका इस्तेमाल कैसे करें। इस्तेमाल में चुनौती
और खतरा भी है....।
लीला. म. : कुंवरजी जैसे इधर मिथक कुरूप भी कर दिया गया है?
कुं.
ना.: हां, राम का मिथक! जिस पर मैंने अयोध्या -92 कविता लिखी।
मैंने इस मिथक के कुरूपीकरण के खिलाफ ही कविता में लिखा। क्योंकि
यह मिथक एक सामाजिक खलल की तरह सामने पेश हुआ जो तकलीफदेह था....।
लीला. म. : शब्द और अर्थ को लेकर अलग-अलग बातें सुनने में आती हैं?
आपने इस पर चर्चा भी की है। कृपया अपने विचार बताएं और विशेषतः
कविता के सन्दर्भ में?
कुं.
ना. : देखिए, सैकड़ों साल तक संस्कृत में यह बहस चलती रही कि शब्द
प्रमुख है अथवा अर्थ। पण्डितराज जगन्नाथ ने इसको क्लिंच करते हुए
कहा कि शब्दार्थ तो सन्तों का अध्ययन है। मैं समझता हूँ कि शब्द और
अर्थ-दोनों मिलकर एक रमणीय सुन्दर अर्थ दें, वही काव्य है।
इण्टीग्रेशन काव्य है। मार्क्स ने भी कहा है 'फॉर्म इज द फॉर्म आफ
इट्स कन्टेण्ट', जो महत्वपूर्ण सूक्त वाक्य है। अगर दोनों को
विभाजित कर दें तो बात बनती नहीं। कथ्य में क्लेरिटी जरूरी है।
फॉर्म खुद-ब-खुद कथ्य साथ लेकर आता है। सिर्फ फार्म के सहारे रचना
खड़ी नहीं हो सकती। फार्म केवल बाहरी चीज है। उसका भी अर्थ है लेकिन
वो कन्टेन्ट्स के साथ इण्टीग्रेटेड है। अगर कविता का फार्म कोई
अर्थ नहीं देता तो मेरे लिए बेनामी है। दरअसल वो इतना इण्टीग्रेटेड
होना चाहिए....फार्म के साथ कि स्वतः अर्थपूर्ण हो उठे।
लीला. म. : कविता को आज विभाजित करके देखने का रवैया बड़ा है,
हालांकि विश्लेषण के लिए शायद जरूरी हो लेकिन प्रेम-कविता, मृत्यु
की कविता, युवा कविता, दलित कविता, स्त्री की कविता आदि, इस तरह
क्या उसे देखना चाहिए?
कुं. ना. : हां, विश्लेषण के बगैर हम नहीं समझ सकते। किन्तु इसके
खतरे हैं। युवा पीढ़ी इसे फॉलो करने लगती है। तो विश्लेषण के लिए
ठीक है। किन्तु रचना विश्लेषण के आधार पर नहीं चलती। रचना जीवन को
इण्टीग्रेटेड फॉर्म में 'कानफ्लिक्ट' के रूप में देखती है। रचना
इसलिए हमेशा समस्यामूलक होती है। देखा होगा आपने लोग कथ्य या रूप
कहते हैं जबकि होना चाहिए कथ्य और रूप। रचनात्मकता में कथ्य और रूप
इंटिग्रल काम करेगा जबकि विश्लेषण में कथ्य या रूप कहकर बात होगी।
इस अन्तर के प्रति अवेयर होना चाहिए। और रचना में जीवनदृष्टि बड़ी
होना चाहिए। टुकड़ों में जीवन और रचना को देखना बन्द करना चाहिए।
लीला. म. : कुंवरजी क्या आप खड़ी बोली में हुई अब तक की काव्य
यात्रा से सन्तुष्ट हैं? क्या कुछ और करना चाहिए कि इसका स्कोप
बढ़े?
कुं.
ना. : बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है? मैं कहना चाहता हूँ कि जब हम
दृश्य में आए जैसे मैं और रघुवीर थे, तो हमारी चिन्ता यही थी कि
इसे एस्टेबलिस करें। इसका स्कोप बढ़ाएं। हमने तमाम प्रयोग किए। अतीत
से सम्बन्ध रखा और नए विषयों से इण्टरसक्ट किया। चिन्ता यही थी कि
कैसे इस भाषा को वैरायटीज दें कि वह समर्थ हो सके। भाषा को समृद्ध
करने के लिए कई बार ऐसे क्षेत्रों में जाना पड़ता है जो सामान्य
जीवन से बाहर के क्षेत्र हैं। जो चिन्तन इसके क्षेत्रों में तो रहा
है, वहां से हम शब्दावली लेते हैं, भाषा भी लेते हैं। जो चिन्तन
हिन्दी में नहीं और दूसरी भाषा में हो रहा है, वहाँ हमें जाना
होगा। तभी कविता की भाषा समृद्ध होगी। जहाँ तक आज की कविता का सवाल
है मैं कहूंगा कि वह अपने पांवों पर खड़ी है। हिन्दी की अपनी एक
सशक्त काव्य परम्परा बन चुकी है और उसे आगे ले जाने के लिए और
प्रयत्न जरूरी है।
लीला. म. : कुंवरजी, इधर छन्द की बात फिर चल पड़ी है। इसे कितना
प्रासंगिक मानते हैं आप? छन्द की चर्चा को लेकर कोई प्रतिक्रिया?
कुं.
ना. : आजादी के बाद जितनी भी कविताएं हैं, उनमें किसी- न-किसी रूप
में छन्द विद्यमान है। छन्दों की बड़ी अच्छी छटा कहाँ मौजूद है।
इसलिए मैं वापसी जैसी बात को तो नहीं मानता। लेकिन यह जरूर हैं,
छन्दों के अन्दर प्रयोग की बहुत गुंजाइश है। और हमारा कन्सर्न आज
होना चाहिए।
लीला. म. : एक और महत्वपूर्ण बात कि इधर कवियों में नैतिक बल का जो
अभाव है, उसको लेकर आप क्या सोचते हैं?
कुं. ना. : हां, यह बड़ी कमी है जो कविता में दिखाई दे रही है।
आजादी के बाद हमारा नैतिक बल लगातार कमजोर हुआ है। हम लोगों में
लगता है वह कूवत नहीं। दरअसल हमारी आसक्ति कई चीजों के प्रति बढ़ी
है, जो मनोबल को दूषित करती है। मुझे लगता है सन्त कवियों में जो
अस्वीकार की ताकत थी वह बाद में खो गई। एक उदाहरण दूंगा - सुकरात
बाजार में घूम रहे थे। उन्होंने देखा तमाम पुरानें सुन्दर सामानों
से भरी पड़ी हैं। उन्हें देखकर और दोनों बांहें उठाकर वे बोले 'वाह!
दुनिया में कितनी चीजें हैं लेकिन मुझे इनकी जरूरत नहीं'। तो वे
अपने वैचारिक वैभव से इतने सन्तुष्ट थे। हमें इसी रास्ते सन्तुष्ट
होना होगा और मैं आश्वस्त हूँ कि एक दिन ऐसा जरूर होगा।
लीला. म. : इसी के बरक्स एक और तथ्य है कि हमारे भीतर परिवर्तनों
को स्वीकार करने की क्षमता भी कम है और विरोध करने की भी?
कुं.
ना. : मैं इसे मानता हूँ बिल्कुल! आज हमें एक आजाद निडर राष्ट्र की
तरह नई चीजों को स्वीकार करना चाहिए। बदलते समय से हमें जूझना
चाहिए। हमें बैठकर अपनी जरूरतों को कभी परिभाषित करना चाहिए। एक
स्वस्थ दृष्टि होना चाहिए। जैसे मोटरें बन रही हैं तो बाजार भर गया
जबकि हमें पब्लिक ट्रांसपोर्ट की जरूरत हैं। रेलें क्षमता से कम
हैं और मोटर निर्माण प्राथमिकता पर। यह मूर्खताएं जो तकलीफ देती
हैं। हमारी प्रायरटीज में शिक्षा होना चाहिए लेकिन वह नहीं है उस
तरह। अशिक्षितों को लेकर कैसे चलेंगे। एक दिन प्रमुख जगहों पर
गुण्डे-बदमाश भर जाएंगे, गैर जिम्मेदार लोगों के हाथ में तन्त्र
होगा। इसके खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठती जबकि शिक्षा तक जन्मसिद्ध
अधिकार है।
लीला. म. : कुंवरजी , कुछ सवाल समकालीन कविता पर। आपको इसकी सबसे
बड़ी उपलब्धि क्या दीखती है?
कुं. ना. : मैं समझता हूँ जिस तरह कई सन्दर्भों में सरोकार विकसित
हुए हैं, वे सबसे बड़ी उपलब्धि हैं। दुनिया की सभी कविताओं को देखता
हूँ और अपनी कविता को सामने रखकर यह पाता हूँ कि जितने विविध
इतिहास, समस्याओं और प्रभावों को यह आत्मसात करती है वह सचमुच
आश्चर्य की बात है। एक और बात जोडूंगा कि समकालीन कविता ने हमारा
ध्यान जिस तरह से उपेक्षित वर्ग की तरफ मोड़ा है, यह बहुत बड़ी बात
है।
लीला. म. : यानी कविता में साधारण की असाधारण स्थापना, हम कह सकते
हैं?
कुं. ना. : हां साधारण से लेकर अतिसाधारण तक कविता की पहुंच, मुझे
वाकई अभिभूत करती है। कविता ने इस बीच सीमाओं को तोड़ा है। और सत्य
भी यही है कि वह सीमाओं में बंधकर कभी बड़ी नहीं हो सकती। उसे
मानवता के एक बड़े स्पॉन को छूना होगा और वह ऐसा कर पा रही हैं।
लीला. म. : कविता में बनते जो तात्कालिक सम्बन्ध दिखाई देते हैं या
कहें सन्दर्भों, प्रसंगों आदि से त्वरित ढंग से जुड़ते ही, उन्हें
कविता में ले आना, इसे आप किस तरह देखते हैं?
कुं.
ना. : तात्कालिक सम्बन्ध जैसे कि टी. वी. या अखबार से हमारे होते
हैं, वैसे कविता को प्रभावित करते हैं। उन्हें एक उपन्यास से होने
वाले सम्बन्ध की भाँति होना चाहिए.... अर्थात् गहरा सम्बन्ध। जो
भीतरी सतह पर हो। बगैर आत्मीय ढंग से उतरे सम्बन्ध गहरे और सच्चे
नहीं होते। मैं कहना चाहता हूँ कि आदमी को वस्तु की तरह न देखें,
एक आत्मा की तरह जानें। इसलिए मैं जीवन में चीजों के अनावश्यक
हस्तक्षेप को अनावश्यक मानता हूँ। हमारी दृष्टि चीजों के पार देखने
वाली हो और ऐसा कविता में सम्भव होता दिख रहा है।
लीला. म. : कविता में विचार की जगह को लेकर भी आज कई तरह की
आपत्तियां हैं और खासकर मार्क्सवादी विचार को लेकर?
कुं.
ना. : लोक समझते हैं रूप के टूटने के बाद जैसे मार्क्सवाद समाप्त
हो गया। यह एक अजीब-सा सरलीकरण मुझे लगता है। वैसा ही सरलीकरण जैसे
हमने पूरे मार्क्सवाद के अर्थ को रूस से जोड़ के देखा। बड़े विचारों
के नैतिक रूप नष्ट होते हैं, आत्माएं जीवित रहती हैं। मैंने '90
में अपने एक लेख में, यह कहा भी था कि एक बड़ी विचारधारा अपने भौतिक
कैद से मुक्त हुई है और इस तरह वह मैच्योर हुई है। उसे बड़े जीवन
में प्रवेश का अवसर मिला है। यही बात एक समय में बौद्ध धर्म के
बारे में कही गई थी लेकिन देखिए विचार उसके आज भी जीवित हैं।
मार्क्सवाद भी इसलिए जिन्दा रहेगा कि उसका प्रचार-प्रसार बहुत है।
उसने सबसे ज्यादा समीक्षा झेली। इसलिए उसने बड़ी यात्रा की। यही
उसकी वाइटिलिटी का मापदण्ड़ है और उसके जीवित रहने का कारण थी।
लीला. म. : सोवियत रूस के टूटने के बाद इधर दो-ढाई दशकों की जो
कविता है, उसे लेकर आप क्या सोचते हैं?
कुं.
ना. : 'बहुवचन' में मेरी एक टिप्पणी इस विषय पर प्रकाशित है। मैं
उसी कड़ी में कहना चाहता हूँ कि कवियों की जीवन दृष्टि बड़ी होना
चाहिए। साहित्य चिन्ताएं बड़ी होना चाहिए।....और ज्यादा मानवींय।
मुझे लग रहा है वे इनके प्रति सचेत हो रहे हैं।
पहले गाँव-घर, माता-पिता की कविताएं बहुत थीं। इधर उनके कविता में
सरोकार बड़े हुए हैं। घर के कान्सेप्ट में भी फर्क आया है। घर के
बाहर भी विकल्प हैं। पहले मैं लखनऊ में था अब दिल्ली में हूँ। शुरू
में लगा कि यह नई जगह है लिकिन दिल्ली अब अपना लगने लगा। कहना मैं
चाहता हूँ कि जीवन जहाँ उखसड़ रहा है तो ज्यादा बड़े विश्व से जूझने
की मानसिकता भी दे रहा है। एक कम्प्यूटर के बटन के इशारे पर अब
दुनिया का भेद खुलता है तो हमें भी काव्य सम्वेदना में खुलना
होगा....बटन के इशारे पर नहीं....वरन् आदान-प्रदान की दुनिया
में....।
लीला. म. : समकालीन कविता में शक्ति केन्द्रों के हस्तक्षेप और
प्रभाव को लेकर आप क्या अनुभव करते हैं?
कुं. ना. : ये खतरा है लेकिन इसका सामना करने के लिए कवियों को ही
पहल करनी होगी। पॉवर स्ट्रक्चर हमेशा रहे हैं आगे भी रहेंगे। अकबर
के जमाने में क्या दरबारी कवि नहीं थे लेकिन उनको भी अस्वीकार करने
वाला एक सशक्त कवि वर्ग था। और वह फतेहपुर सीकरी के नजदीक नहीं
जाता था। तो अस्वीकार करने वाला एक समुदाय भी हमेशा होगा। कवि वही
है जो अस्वीकार करना जानता हो।
लीला. म. : कुंवरजी कविता लिखते हुए एक कवि को किस तरह अपने को
तैयार करना चाहिए अथवा पहले से तैयार होना चाहिए?
कुं. ना. : कविता लिखना बहुत मुश्किल काम है फिर भी उसे एक
अनिवार्यता की तरह लेना चाहिए। रचना प्रक्रिया ही अनिवार्यता है
जिसमें कविता कवि के माध्यम से जन्म लेती है। रचना प्रक्रिया के
दौरान भाषा जेनेरेटिव अथवा ट्रांसफरमेशन की प्रक्रिया से गुजरती
है। मैं समझता हूँ ऐसे वक्त मनःस्थिति मुक्त होना चाहिए। उसे खुला
छोड़ना चाहिए।
लीला. म. : काव्य-आलोचना के स्वरूप को लेकर भी कई बहसें हैं तो इधर
की आलोचना अथवा समीक्षा को लेकर आप क्या सोचते हैं?
कु.
ना. : इस दौर में साहित्य से अधिक समीक्षा ने कविता को प्रभावित
किया है। फिर भी वह साहित्य आचार्यों अथवा शास्त्रियों से मुक्त
हुई है। मेरे लिए समीक्षा कृति के साथ चिन्तन है और इसे प्राथमिकता
देता हूँ। वैसे समीक्षा कृति
के विरुद्ध भी चिन्तन है। समीक्षा तक
चुनौती है। आप पाएँगे कि विशुद्ध साहित्य शास्त्रीयों से भिन्न
रचनाकारों का काम हमारे पास है और महत्वपूर्ण।
लीला. म. : संगीत अथवा दूसरी कलाओं से सम्बन्ध ने क्या कविता को
पुष्ट किया है अथवा कर सकती है?
कुं.ना. : संगीत और दूसरी कलाएं एक कवि के भीतर कई स्तरों पर
साहित्यिक संस्कृति का विनिर्माण करती है। मुझे याद है इस बारे में
मलोर्म और प्रतीकवादियों ने चिन्ता की थी। उसके कुछ बेहतर परिणाम
सामने हैं भले ही दुरूह लगें। मैंने 'चक्रव्यूह' की कविताओं में
ऐसी कोशिश की थी और पाया कि संगीत के उत्कृष्ट क्षणों और
रहस्यात्मकता का एक काव्य आनन्द सिरजता है, कविता को पुष्ट करता
है, बहुआयाम देता है।
लीला. म. : कविता के पाठ को लेकर इधर एक हिचक बढ़ी है। काव्यवाचन
जैसे एक मुश्किल और गैरजरूरी काम-सा बन गया है। क्या आपका मन
श्रोताओं के सामने पाठ का नहीं होता?
कुं.
ना. : काव्य पाठ को मैं महत्वपूर्ण मानता हूँ बावजूद इसके कि मेरे
श्रोता का कोई रूप मेरे सामने स्पष्ट नहीं हो पाता। कविता की भाषा
और तकनीक के नए प्रयोग से पाठ को प्रभावी बनाया जा सकता है। मुझे
लगता है रेडियो एक बेहतर जगह है। वहाँ संगीत की तरह कविता ही एक
मान्य जगत है। टी. वी. बहुत बेहतर जगह इस दृष्टि से नहीं बन पाई है
फिर ताम-झाम और टी.वी. के ग्लेमर से पाठ सहज नहीं हो पाता। फिर
छोटा पर्दा प्रभाव की दृष्टि बहुत उपयुक्त नहीं है क्योंकि उस
एकान्त का होना कठिन है जो कविता तक पहुँचने के लिए जरूरी है। फिर
भी उसमें जो सम्भावना है उसका रचनात्मक उपयोग होना चाहिए।
लीला. म. : अन्तिम सवाल-समकालीन कविता के प्रमुख संकट कौन-से हैं?
कुं.
ना. : मनुष्य-मनुष्य के बीच सम्बन्धों के व्यापक संसार की
कोशिश....नैतिक बल, पाठक तक पहुँचने की चिन्ता, मानवीयता को बचाए
रखने को काव्य सरोकार ये कुछ जरूरी बातें हैं जिनकी मैं चिन्ता
करता हूँ....लिखते हुए इन्हें कविता में ट्रांसफर्म करने की मेरी
कोशिश होती है...मैं कविताएं बहुत रद्द करता हूँ शायद इन्हीं
संकटों के कारण....। ऐसा नहीं है कि इधर की कविता इन संकटों का
शिकार है....लेकिन मैं अपनी चिन्ता और सरोकार की बात कर रहा
था....सम्भव है अन्य कवि भी इन्हें अनुभव करते हों।