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सुधांशु कुमार मालवीय

।।यतीन्द्र नाथ की साइकिल।।

काला रंग‍
तराशी हुई दाढ़ी
चमकते बिजली जैसे दांत
हर एक हंसी आने के साथ

आँखें हैं पीली‍-‍सी‍
दुख का पूरा एक सिलसिला
झेलने के बाद
दुख के रंग में रंगी हुई
दुनिया को पढ़ने में खूब निपुनाई
पायी हुई, भेदने में, टोहने में

भझोला कद
मामूली पैण्ट-कमीज
ज्यादातर चप्पल
कंधे पर झोला
उसका सबसे आत्मीय
हरदम का साथी

झोले में होती हैं
यतीन्द्र नाथ की ताजा कविताएँ
कुछ पत्रिकाएँ, कोई अखबार
एकाध किताब
और टिफिन

इसी तरह चलता है
यतीन्द्र नाथ
रोज बीस किलोमीटर
कम से कम, ज्यादा न हो जाए अगर
घर से दफ्तर तक
अपनी साइकिल से

यतीन्द्र नाथ की साइकिल में
आगे डन्डे पर एक और
नन्ही-सी सीट है
पीछे वही कैरियर

यतीन्द्र नाथ की साइकिल
चलती है
एक समरस चाल में
पैडल पर जिस दबाव से
वह सालों - साल से चलाते रहने के कारण
स्वभाव की तरह
सहज - संतुलित तय हो चुका है

हिन्दी के परास्नातक
हिन्दी के युवा
प्रतिभाशाली कवि की
कविता लिखने वाली
उंगलियाँ
साइकिल की मुठ को
अपनी मुठिठ्यों में कसती हैं
तब निकलती है
यतीन्द्र नाथ की साइकिल
अपने आफिस के लिये
कवियों के अड्डे के लिये

चलती है किसी सम्मेलन
किसी गोष्ठी के लिये
आकाशवाणी के लिये
अकादमी के लिये
जोड़ती - घटाती हुई
पैडल को घुमाती
जाड़ा - गरमी - बरसात को चीरती हुई
यतीन्द्र नाथ की साइकिल

यतीन्द्र नाथ पहुँचना चाहता है
इस शहर से निकल कर
दूर.... कहीं पर
अपनी प्रतिभा के बराबर की
सही जगह पर

शहर की छोटी - सी
मंडी में चक्कर काटते हुए
सूंघते हुए, आहट लेते हुए
घूम रहा है, घूम रहा है इसी तरह
यतीन्द्र नाथ की साइकिल का पहिया

( सुधांशु कुमार मालवीय की अन्य कविताएँ)


मधुकर भारती की कविता

उजाड़ रास्ते का प्याऊ

शहर की ओर जाने वाले
पहाड़ी रास्ते पर
स्थित है एक प्याऊ
इसके मुख से निकलती है अमृत धारा।

पहाड़ का मीठा जल भाग्य से मिलता है
भाग्य के ऐसे मुहाने पर स्थित है प्याऊ
जहाँ लोग चाहें तो पसीना धोलें
फिर कंठ में ताजगी भर
बीड़ी सुलगा लें और थकान मिटा लें

यहाँ विश्राम पाती है एक पगडंडी
दूसरी शुरू होती है
यहाँ से नया पसीना/माथे पर चमकने की करता है तैयारी

प्याऊ वालें रास्ते के समीप
बहते नाले के ऊपर
बन गया है नया पुल
जहाँ घास, पत्थर और पेड़ों के अलिंगन से
छूट गई है जमीन
छूटे हुए हिस्से को
नई सहस्राब्दिं की सड़क कहने लगे हैं।

प्याऊ अपनी जगह है
मीठे जल की धर लिए
पर रास्ता द्दिटक गया है
उत्तर आधुनिक मोटर पकड़ने की हडबड़ी में
लोग कंठ भिगोना भुला देते हैं

स्थगित कर देते हैं
बीड़ी पीना
पसीना मोटर में बैठ कर सुखा देते हैं
फलांग जाते हैं नए रास्ते का पुल
उजाड़ हो गया है
प्याऊ वाला रास्ता।

पुल के नीचे बहते नाले को
समृद्ध करता हुआ मीठा जल
बहे जा रहा है
दरकिनार किया हुआ प्याऊ
बदस्तूर कहीं हैं
कभी कोई कंठ आ सकता है
हाँफता हुआ
जीवन की भीख मांगता हुआ।
 


रजत कृष्ण की कविता

आसमान का घर

मनुष्य ने आँखें खोली
तो उसे सबसे पहले
नीला फैला हुआ
आसमान दिखा....।

उड़ना सीखी चिड़ियाँ
तो फड़फड़ाते हुए
उसने पुकारा
आसमान को।

खुशियों की यात्रा
शुरू होती है
आसमान की ओर
खुलती राह से।

दुःख जब
हो जाता है पहाड़-सा
हम जोड़ते हैं हाथ
आसमान की ओर-
सहा नहीं जाता
अब और
दया करो हे दया निधान!

आसमान का घर
बहुत बड़ा
वहाँ से आती हैं
हमारे बच्चों की गेंद
परियाँ-तितलियाँ!

कहीं तो बंधे
घोड़े उस राजकुमार के
जिसकी प्रतीक्षा में
सदियों से जाग रही हैं
हमारी बहन बेटियाँ!

समुद्र का अतंस
दहकता है
तो कहीं और नहीं
वह दौड़े दौड़े
आसमान के घर जाता है।

पेड़ जब हरियाता है
स्वागत में
आसमान झुक जाता है।

रोते-बिलखते
बेघरों को
जब पूछते नहीं हैं
हम धरती के ही जन-मन
तब आसमान
नीचे उतरता
उनके बालों पर
उँगलियाँ फेरता
और थपकियाँ देकर
उन्हें लोरी सुनाता है।

आसमान छूने की
होड़ में
युगों- युगों से
ना जाने
कितने-कितने
जतन कर रहे हैं हम

पर आसमान है
कि हर बार
हमें
हमारे कद का
अहसास कराती है।
 

(रजत कृष्ण की अन्य कविताएँ )


जेरी मर्फी की कविताएँ (Poems of Gerry Murphy)

शब्द का वजन ( the Weight of the Word)

ये हैं कवि
शब्दकोष की पहाड़ी को बढ़ाते हुए
संक्षिप्त आक्सफोर्ट डिक्शनरी के
दो सम्पूर्ण खण्डों के बीच
पनिहारिन की तरह सन्तुलन बनाते हुए

( जेरी मर्फी की अन्य कविताएँ)
 


विकास वर्धन सोनी की गजल

*
मेरी वादी में तो बस आंसू के दरिया बहते हैं
उन खिले खिले से चेहरों में कुछ खून के प्यासे रहते हैं
कब अमन की खुली हवा उन तंग दिलो से गुजरेगी
कब देखेगी मेरी आँखें सब जन्नत जिसको कहते हैं

बारूद की खुशबु फूलों में भंवरों का गुंजन दर्द भरा
अचला घायल सब देख रही पानी से ज्यादा रक्त बहा
दर्दों से भूख संभालती हैं आंसू अब प्यास बुझाते हैं
कब देखेगी मेरी आँखें सब जन्नत जिसको कहते हैं

टुकडा माटी का पाने को कई टुकड़े दिलों के मिटा दिए
चूल्हा उनसे न एक जला आँगन लाखो पर जला दिए
अलग नहीं कुछ वो हमसे हम जैसे ही वो दिखते हैं
कब देखेगी मेरी आँखें सब जन्नत जिसको कहते हैं

माथा सिन्दूरी करने को क्यों ख़ुद का लहू बहते हो
लड़ने को दुश्मन कब कम थे क्यों अपनों का दर्द बढ़ाते हो
जीं कर देखे वो भी तो कभी जो मौत का सौदा करते हैं
कब देखेगी मेरी आँखें सब जन्नत जिसको कहते हैं

(
विकास वर्धन सोनी   )


ताए हो हान की कविता ( A Poem of Tae Ho Han)

एक ऋचा ज्ञान की

उस दिन मुँह सवेरे जब मैं चट्टान के सिरे पर
खुरदुरी सतह पर पाँव जमाए खड़ा था

एक सफेद कनखजूरा सरसराता निकला , नंगे पैरों से
कोई चट्टानी सिरा नहीं वाले दौड़ के खेल में

एक नन्हा बच्चा नंगे पाँव चलता धीमे से आया
अपना हाथ बढ़ा कर मुझसे थामने को कहा

उसी वक्त, हाथ थामने की अधीरता में
मैं धड़ाम से चट्टानी सिरे से गिर गया, अनन्तता की ओर।

( ताए हो हान की अन्य कविताएँ )
 


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