












कृत्या प्रकाशन की पुस्तकें
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 के.
सच्चिदानंदन
मलयालम के आधुनिक और आधुनिकोत्तर कवियों में अग्रणी हैं। मलयालम्
में आपकी कविताओं के अठारह संकलनों के अलावा अनूदित कविताओं के
पन्द्रह संकलन, दो नाटक और आलोचना एवं साक्षात्कार के पन्द्रह
संकलन प्रकाशित हैं। अंग्रेजी, फ्रांसीसी, इतालवी, तमिल, हिन्दी,
पंजाबी, ओडिया, बाड्ला, असमिया, गुजराती और कन्नड़ भाषाओं में
अनूदित आपकी कविताओं के अठारह संकलन भी प्रकाशित हैं। आपकी
अंग्रेजी गद्य रचनाओं के दो संग्रह प्रकाशित हैं। आपने अंग्रेजी,
मलयालम् और हिन्दी की अनेक पुस्तकें सम्पादित की हैं।
अनेक अंतर्राष्ट्रीय काव्योत्सवों में भारत का प्रतिनिधित्व कर
चुके के. सच्चिदानंदन ने अमेरिका, रूस, लातीविया, स्वीडेन, इटली,
युगोस्लाविया, जर्मनी, नीदरलैंड्स, चीन और खाड़ी के देशों के अलावा
भारत के विभिन्न भागों में आलेख वाचन के अलावा व्याख्यान भी दिए
हैं।
आप केरल साहित्य अकादेमी पुरस्कार (चार बार) , उल्लूर पुरस्कार,
पी. कुंजिरामन् नायर पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद् पुरस्कार, ओमान
कल्वरल सेंटर अवार्ड, कुमार आशान पुरस्कार, ओडक्कुषळ पुरस्कार,
बहरीन केरलीय समाज पुरस्कार, गंगाधर मेहर राष्ट्रीय कविता
पुरस्कार और संस्कृति विभाग (भारत सरकार) की वरिष्ठ विद्वत्-वृत्ति
सहित अनेक पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हैं।
आप केरल में पच्चीस वर्षों तक अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे, इंडियन
लिटरेचर पत्रिका का संपादन किया और साहित्य अकादेमी के
सचिव रहे।
पशु, जिसकी स्मृति में जंगल है
पशु, जिसकी स्मृति में जंगल है
पालतू नहीं बनता, इतनी आसानी से।
उसकी त्वचा में है
जंगल की दलदल की शीतलता,
उसके रोमकूपों में है
जंगल के फूलों की गाढ़ी सुगंध,
उसकी पुतलियों में है
चट्टानों पर रिसता जंगल का सूरज,
उसके मुख में
जंगली नदियाँ हहराती हैं,
हैं उसकी जीभ पर
जंगली शहद के फफोले,
हैं उसके कानों में
जंगली मेघ गरजते हुए,
हैं उसके रक्त में
जंगली हाथी चिंघाड़ते,
हैं उसके हृदय में
प्रस्फुटित वन-ज्योत्सनाएँ,
उसके विचार चले जा रहे
वन्य वीथियों में सरपट,
पशु, जिसकी स्मृति में जंगल है
पालतू नहीं बनता इतनी आसानी से।
मेरी स्मृति में है
जंगल।
अनु. : मंगलेश डबराल और गिरधर राठी
अन्धा आदमी, जिसने सूर्य खोजा
(सू-तुंग-पो पर आधारित)
"सूर्य कैसा होता है?"
अन्धे आदमी ने जुलूस में नगाड़ा बजाते हुए आदमी से पूछा
"चेंगिला की तरह।"
अन्धे आदमी ने चेंगिला बजाया
जब रात में मृत्यु की घोषणा करती
काँसे की घंटी बजी, उसने सोचा यह है सूर्य
"सूर्य कैसा होता है?"
अन्धे आदमी ने जुलूस में मशाल थामे आदमी से पूछा
"मशाल की तरह।"
अन्धे आदमी ने मशाल छुई
शाम को जब किसी ने उसके चेहरे पर
गर्म पानी उँड़ेल दिया,
उसने सोचा यह है सूर्य
"सूर्य कैसा होता है?"
अन्धा आदमी समुद्र में उतरा
मूँगे की चट्टानों ने उसके हाथ जलाए
समुद्री घोड़े उसे लेकर उड़ चले
वह समुद्र में परियों के किले में रहा
अन्त में शैवाल और सीपियों की फैलाई
खामोशी की सतह पर जब वह लेटा
उसने सोचा,
अब मैं समझा, सूर्य कैसा होता है
लेकिन मैं नहीं दिखा सकता उन्हें
जिनकी सिर्फ अपनी आँखें हैं
जो समझा नहीं गया, वह समझाया जा सकता है
जो जाना है अनुभव से, कैसे बताया जा सकता है
आज भी हर अन्धा आदमी, समुद्र-सतह पर लेटा है
जहाजियों के स्वागत के लिए।
(उत्तर की कथाएँ से)
अनु. : राजेन्द्र धोडपकर
निष्पक्षता
निष्पक्षता
यदि उड़ने में सकुचाने वाला पक्षी है तो
मैंने उसे दाना देकर पाला-पोसा नहीं
निष्पक्षता
मुंडेरे पर नारियल का
हथेली पर ठोड़ी टिकाए बैठना है तो
मैंने छिलका उतारकर देखा नहीं
काट्टाडि* वृक्ष की सिसकियाँ
या आधी रात को जगानेवाले मुर्गों की खिलखिलाहटों के बीच
घात लगाए बैठी लोमड़ी
निष्पक्षता है तो
मैंने ऊँघते हुए उसकी
घुर्राहट सुनी है,
निष्पक्षता
यदि दन्तहीन सर्प का फैला हुआ फण है तो
वह केवल सपेरे का खिलौना है
भेड़िये और मेमने का समान न्याय देनेवाली
वनदेवी यदि निष्पक्षता है तो
इसके इकलौते सींग को विधान सभा और
न्यायपालिका की ओर बढ़ता देख
मैं चौंककर उठ बैठता हूँ
निष्पक्षता
यदि युद्धभूमि में शंकालुओं द्वारा देखा गया काला फूल है
तो रथ के चालक का वेग मुझे पसन्द है
निष्पक्षता
यदि धुला हुआ न्यायाधीश हाथ है
तो सलीब से रक्त टपकाता
शुक्रवार मुझे पसन्द है।
(आपात्काल के दौरान लिखी गई कविता)
*पाइन जाति का एक वृक्ष
अनु. : राजेनद्र धोडपकर
नानी
पागल थी मेरी नानी
उसका पागलपन पका मृत्यु में
मेरे कंजूस मामा ने उसे रख दिया सामान की कोठरी में
घास से ढँककर
सूखती गई नानी, चटखी बीजों में
और खिड़की के बाहर छितरा गई
एक बीज उगा और हुआ मेरी माँ
धूप और बारिश आते-जाते रहे
माँ के पागलपन से उपजा मैं।
अब मैं कैसे बच सकता हूँ कविता लिखने से
सुनहरे दाँतोंवाले
बन्दरों के बारे में।
अनु. : राजेन्द्र धोडपकर
पेटी
जब मेरा जन्म हुआ
मेरे माता-पिता ने मुझे रख दिया एक पेटी में
और समुद्र में बहा दिया उसे।
इस तरह मैं पहुँचा इस द्वीप पर।
जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ
यह पेटी भी बढ़ती गई।
मैं इसे ढोता हुआ ऐसे चलता हूँ जैसे कोई
चले अपने ताबूत में।
इस दुनिया में न पेड़ हैं न नदियाँ,
कभी-कभी मैं देख लेता हूँ
आकाश का एक टुकड़ा
उस छेद से जो हवा आने के लिए
बनाया गया है।
कभी-कभी मैं
सुनता हूँ किसी के गाने की आवाज।
कभी-कभी कहीं खिलते हुए गुलाबों की गंध
तैर आती है छेद के अंदर।

मैं यह सपना देखता हूँ
किसी न किसी दिन
एक सितारा रेंग आएगा छेद से
जो मुझे मुक्त करेगा इस पेटी से
और ले जाएगा
इस द्वीप से बाहर समूची दुनिया में,
मैं उस दिन तानूँगा अपने हाथ और पैर
और मनुष्य की तरह चलूँगा
और मनुष्य की तरह बोलूँगा।
अनु. : राजेन्द्र धोडपकर
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