मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 

कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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कविता और समाज की बात करते वक्त हम कभी कबीर को तो कभी मीरा को याद करते हैं, हम भूल जाते हैं वे मूलतः कवि नहीं था, कहने मतलब यह है कि उन्होंने कभी भी कवि का जामा पहनने का दिखावा नहीं किया, कविता उनके विद्रोह या क्रान्ति का माध्यम थी, जो कविता कम, उनकी दिली जबान ज्यादा थी। यानी कि जिसके बल पर हम यह दावा करते हैं कि कविता समाज का स्वर है, वह पूर्ण कविता की श्रेणी में आता ही नहीं।
मुद्राराक्षस ने कविता के दो कार्य गिनायें हैं- इमोशन्स की संभावनाएँ, दूसरा चित्रों की संभावनाएँ या अभिव्यक्ति।जहाँ तक इमोशन्स का सवाल है, वे स्वयं घटे बढ़ें नहीं तो भी उनकी घनात्मकता और गुणात्मकता में अन्तर आता ही है। यही बात चित्रात्मकता के सन्दर्भ में है, प्राकृतिक प्रतिक्रिया में ही बदलाव ना हो, यह संभव नहीं।

रति सक्सेना
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कब्र के भीतर अँधेरा है, बाहर मिट्टी उपजाऊ और
खूशबू लिए है
माँ को अपने भीतर समा लेने को उतावली भी

एक अजीब से कोमल अहसास ने मुझे जकड़ लिया है
बाबी लूरी

बेजुबान
दरख्तों की भी तो
होती है जान
चोट लगने पर
रोते हैं
रिसते हैं
उनके भी जख्म
देखा है
किसी ने रोते हुए
सिसकते हुए
वादियों में
सुना है उन्हें
गुनगुनाते हुए
हवा के साथ
खिलखिलाते हुए
बेशक करते हैं
प्यार, दरख्त भी
त्रिलोक महावर जिनसे उम्मीद थी, नहीं बदलेगा
उनका बदल गया।
जिनसे आशंका थी,
नहीं बदला।
जिन्हें कोयला मानता था
हीरों की तरह
चमक उठे।
जिन्हें हीरा मानता था
कोयलों की तरह
काले निकले।
श्रीकान्त वर्मा

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लेकिन बैल्जियम से आए आर्गो स्पीयर ने कहा-"भारतीय मुस्लमानों से नफरत करते हैं, और यहाँ स्त्रियों की स्थिति बेहद खराब है, उन्हें मार दिया जाता है।" मैंने झैंपते हुए कहा, "नहीं नहीं ... ऐसी बात तो नहीं है, देखिए हमारी कृत्या ट्रस्ट के जनरल सैक्रेट्री मुहम्मद कुंजुंर मेत्तरु मुसलमान है।" इस पर आर्गो ने अपने देश की एक पत्रिका निकाली, जिसमें गुजरात के दंगों के बारे में लेख था। उसमें वे ही चित्र थे जिनके कारण‌ दंगे और भड़के थे। साथ ही उस पत्रिका में स्त्रियों की समस्या से सम्बन्धित लेख भी था। वह पत्रिका विश्व के पश्चिमी देशों पर केन्द्रित थी, जिसमें कोरिया चीन आदि देशों के बारे में छपे लेख उनकी उन्नत्ति आदि से सम्बन्धित थे, किन्तु भारत, पाकिस्तान, बंगला देश के बारे में छपे लेख नकारात्मक थे। मैं न तो भारतीय समस्याओं के प्रति आँख मून्दना चाहती हूँ, और न ही महानता का गुणगान, किन्तु मुझे लगा कि जब किसी लेख को देश का प्रतिनिधित्व करना हो तो वह देश के सकारातचमक रूप को प्रस्तुत करे तो अच्छा है।
'विदेशियों की नजर में हम की बातचीत
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"सूर्य कैसा होता है?"
अन्धे आदमी ने जुलूस में नगाड़ा बजाते हुए आदमी से पूछा
"चेंगिला की तरह।"
अन्धे आदमी ने चेंगिला बजाया
जब रात में मृत्यु की घोषणा करती
काँसे की घंटी बजी, उसने सोचा यह है सूर्य
"सूर्य कैसा होता है?"
अन्धे आदमी ने जुलूस में मशाल थामे आदमी से पूछा
"मशाल की तरह।"
अन्धे आदमी ने मशाल छुई
शाम को जब किसी ने उसके चेहरे पर
गर्म पानी उँड़ेल दिया,
उसने सोचा यह है सूर्य

पागल थी मेरी नानी
उसका पागलपन पका मृत्यु में

मेरे कंजूस मामा ने उसे रख दिया सामान की कोठरी में
घास से ढँककर
सूखती गई नानी, चटखी बीजों में
और खिड़की के बाहर छितरा गई

एक बीज उगा और हुआ मेरी म‌ाँ
धूप और बारिश आते-जाते रहे
माँ के पागलपन से उपजा मैं।
के. सच्चिदानंदन
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*
तोहि छैला मैं छाती लगाये रहिहौं।
आँखिन ते कछु दूरि न करिहौं पुतरी प्यारे बनाये रहिहौं।।

पलकन ते नित पायँ दाबि के उर पर सदा सोआये रहिहौं।।
जो कछु भौंह चढ़ी देखिहौं तौ परि पैयाँ मनाये रहिहौं।।
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कसकै मोरे रे करेजवा तोरे नैना बाँके बान।
नहिं भूलति जस वह दिन तानी बाँकी भौंह कमान।।
जादू भरी रसीली चितवन प्रेम भरी मुसकान।
छिन छिन पल पल पर सुधि आवत बिसरावत सब ज्ञान।।
अब "परताप"न जीवन रहिहैं अधर रस दान।
धाय आय गर लागु पियरवा नाहितु निकसै प्राण।।
प्रताप नारायण मिश्र

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VOL - III/ PART V
(अक्टूबर-2007 )

संपादक :  रति सक्सेना


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