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कविता की मौत और जन जीवन

श्रीकान्त वर्मा रचनावली के अन्तिम भाग में कुछ टिप्पणियाँ हैं, जो श्रीकान्त वर्मा और उनके समकालीन लेखकों का कविता पर चिन्तन तो दर्शाती है ही, साथ ही आज के सन्दर्भ में कविता के बारे में सोचने को बाध्य करतीं हैं। ये टिप्पणियाँ उत्कर्ष के मार्च 1967 के अंक में छप चुकी हैं। विचारणीय यह है कि आज से चालीस साल पहले लिखी गई प्रतिक्रिया क्या आज भी विचारणीय हैं? मुझे लगता है कि यदि हम इन्हे उलट- पलट कर देखें, कहीं ना कहीं ये हमारी सोच को तीव्र करती है। ये टिप्पणियाँ किसी ना किसी सवाल की प्रतिक्रिया के रूप में व्यक्त है। इसमें सवाल जिसने मुझे सोचने को बाध्य किया, वह हैः‍-- कुछ लोग कहते हैं कि कविता मर चुकी है, वह कभी जीवित नहीं होगी।आपकी क्या राय है?
इस सवाल पर अज्ञेय से लेकर राजकमल ने कई तरह से प्रतिक्रिया दी है, लेकिन मैं मुद्राराक्षस की प्रतिक्रिया को चर्चा का मुद्दा बनाना चाहती हूँ, जो काफी बेबाक और विचारणीय है।
मुद्राराक्षस का कहना थाः "इस समय विश्व भर में कविता मर चुकी है। कविता के दो कार्य हैं -इमोशन्स की संभावनाएँ, दूसरा चित्रों की संभावनाएँ या अभिव्यक्ति। इन सबका उत्खनन हो चुका है। अब सारी खान खाली हो चुकी है। खान की दीवार ही शेष हैं। मुद्राराक्षस आगे कहते हैं कि- वनस्पतिशास्त्र में एक प्रक्रिया " कंजरवेशन" होती है। आज कवि और कविता को भी समाज "कन्जर्व" कर रहा है। उसे सम्मान या सजावट के सामान की तरह सम्भाले हुए है। वास्तब में कविता के सारे फंक्शन समाप्त हो गए हैं।...क्या कविता जन जीवन के निकट जा सकती है? इस आवश्यकता के प्रति कवि का विद्रोह है। कवि यह पूर्वकल्पना कर लेता है कि समाज उससे दृष्टि और दर्शन की अपेक्षा करता है, जब कि आज समाज को उससे कोई अपेक्षा नहीं हैं।.....आज समाज भावना या संवेदना नहीं, घटना या फैक्ट चाहता है।... एलियट को युग दृष्टा कहते हैं किन्तु बात पोप की ही मानते हैं, हालाँकि दोनो रोमन कैथौलिक थे। "
मुद्राराक्षस की यह टिप्पणी आज भी कई सवाल खड़े करने में समर्थ है.. निसन्देह हम यह कह सकते हैं कि चालीस सालों के बाद भी कविता मरी तो नहीं है,किन्तु इस बात में भी कोई सन्देह नहीं कि कविता समाज से उस तरह से जुड़ी भी नहीं हैं जिस तरह कि धर्म, या सम्प्रदाय समाज से जुड़े होते है। या फिर हम यह भी कह सकते हैं कि इन चालीस सालों जितनी तेजी से धर्म व साम्प्रदायिक भावना केन्द्र में आई है उतनी तेजी से कविता धूमिल हुई है। फिर भी कविता मरी नहीं, इस बात में कोई सन्देह नहीं। कविताएँ लगातार लिखी जा रहीं हैं। हाँ यह पता नहीं पड़ रहा है कि वे जिन्दा कविताएँ हैं, या जन्म से ही निश्चेष्ट। यह भी समझ में नहीं आ पा रहा है कि उनके जन्मदाता असली प्रसव पीड़ा से गुजर भी पाते हैं या नहीं..इस बात पर सन्देह जरूर होता है कि कविता जन जीवन के निकट आ सकती है? या यह भी वैसी ही अपना रास्ता निकाल लेगी जैसे कि रोटी ने पीज्जा के रोल में निकाला है या फिर या भावना ने धर्मान्धता में।
कविता के नाम पर इमोशन्स की संभावना खोजते हैं या नहीं, यह तो मालूम नहीं, किन्तु यह जरूर मालूम है कि हम इमोशन्स को भुना जरूर लेते हैं।
कविता और समाज की बात करते वक्त हम कभी कबीर को तो कभी मीरा को याद करते हैं, हम भूल जाते हैं वे मूलतः कवि नहीं था, कहने मतलब यह है कि उन्होंने कभी भी कवि का जामा पहनने का दिखावा नहीं किया, कविता उनके विद्रोह या क्रान्ति का माध्यम थी, जो कविता कम, उनकी दिली जबान ज्यादा थी। यानी कि जिसके बल पर हम यह दावा करते हैं कि कविता समाज का स्वर है, वह पूर्ण कविता की श्रेणी में आता ही नहीं।
मुद्राराक्षस ने कविता के दो कार्य गिनायें हैं- इमोशन्स की संभावनाएँ, दूसरा चित्रों की संभावनाएँ या अभिव्यक्ति।जहाँ तक इमोशन्स का सवाल है, वे स्वयं घटे बढ़ें नहीं तो भी उनकी घनात्मकता और गुणात्मकता में अन्तर आता ही है। यही बात चित्रात्मकता के सन्दर्भ में है, प्राकृतिक प्रतिक्रिया में ही बदलाव ना हो, यह संभव नहीं। इन पिछले 40 सालों में ही इतना कुछ बदलाव आया है जो चित्रात्मकता के मापदण्ड को बदलने में संभव है। इस बात पर मुझे याद आया कि मलयालम कवि ओ एन वी कुरुप्प की एक कविता "मरुभूमि" है, जिसमें उन्होंने मरुस्थल को उसी मापदण्ड से देखा है जो किस्से- कहानियों में प्रसिद्ध है। किन्तु आज स्थिति बिल्कुल वैसी नहीं है। कुछ वर्षों से तो राजस्थान के कुछ शहरों में बाढ़ भी आ रही है। उनकी कविता का हिन्दी अनुवाद किसी पत्रिका में छपा तो कई पाठकों ने उस कविता के प्राकृतिक चित्रण को खारिज कर दिया। यानी संभावनाएँ किसी भी क्षेत्र में घटी नहीं है। लेकिन आज भी कविता को धर्म या साम्प्रदायिता की तुलना में नगण्य माना जा सकता है। सिनेमा आदि अन्य कलाओं की तुलना में कविता बड़ी सिमटी सी दिखाई देती है, किन्तु यही तो कविता की दुनिया है, कविता ना तो परिवर्तन का नाम है और न ही क्रान्ति का। यह एक ऐसी सुगबुहाहट है जो राख के ढेर में छिपी रहती हुई भी अपनी शक्ति नहीं खोती है, यह शक्ति ना तो क्रान्ति है, और न ही आन्दोलन। बस एक छटपटाहट है जिसे जीवित रख कर ही आदमी आदमी कहलाता है। जिस दिन यह छटपटाहट मर जाएगी, आदमीयत भी शायद...तभी तो कविता जिन्दा है आजतक।

इस अंक के चित्र प्राचीन चीनी कलाकृतियों की अनुकृति है, किन्तु पृष्ठ पर दी गई फोटो आठ वर्षीय कलाकार कौस्तुभ द्वारा खींची गई हैं, जिसके लिए कैमरा खिलौने से भी ज्यादा सहज है।
मित्रों कविता की जिन्दगी के लिए दुआ करते हुए हम फिर प्रस्तुत है इस नए अंक के साथ..
 

रति सक्सेना

Letters to kritya
                                                                                                             KRITYA2007


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