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विदेशियों की नजर में हम
कृत्या 2007 अखिल विश्व कवितोत्सव के सन्दर्भ में
अपने
देशवासी अपने देश के प्रति हम दो तरह की मानसिकता रखते हैं, एक तो
अति सकारात्मक - जिसमे हम सोने की चिड़िया वाले मुगालते से निकल
नहीं पाते हैं, दूसरी अति नकारात्मक- "क्या रखा है यहाँ , चलों
किसी ओर देश में जाएँ"। हालाँकि सकारात्क मानसिकता रखने वाले भी
मौका मिलते ही बाहर भागते है। हमारी सोच इतन आत्म केन्द्रित होती
है कि हम पूरी दुनिया को सिर्फ अपने नजरिए से तो देखते है हं, साथ
ही अपने को दुनिया के नजरिये से देखने की कोशिश करें तो सिर्फ अपनी
तरह से देखते हैं।
इन दिनों टैक्नालाजी के बढ़ावे के कारण हम फिर इस मुगालते में आ गए
हैं कि -- भई,अपने देश की बराबरी कौन कर सकता है। अपने युवा शक्ति
का निर्यात करते वक्त हम सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं, अपने देश
और उसके भविष्य के बारे में नहीं।
कृत्या एक ऐसी संस्था है जिसने अपनी मुख पृष्ठ वेब पत्रिका को
कविता के नाम पर समर्पित किया है, इसका उद्देश्य भारतीय भाषाओं की
नई और पुरानी कविताओं को विश्व मंच उपलब्ध करवाना , और साथ ही
विश्व की अन्य भाषाओं की कविताओं को अनुवाद द्वारा अपने पाठकों को
उपलब्ध करवाना है। कृत्या के अपने साज संवार और कविता के स्तर के
कारण देश के कविता प्रेमियों की अपेक्षा कहीं ज्यादा अन्य भाषाओं
के कविता प्रेमियों के बीच लोकप्रिय होती गई। यही कारण है कि तीसरे
कवितोत्सव से पहले कई कवि मित्रों ने कृत्या कवितोत्सव में भाग
लेने की इच्छा जाहिर की। बस यहीं से कृत्या कवितोत्सव को
विश्वोत्सव के रूप में मनाने की इच्छा ने जन्म लिया। कृत्या
कवितोत्सव के बारे में बात करने की जगह मैं विदेशी कवियों के बारे
में बात करना चाहूँगी। दरअसल ज्यों ही मैंने नेट पर विश्वस्तरीय
कृत्योत्सव यह घोषणा की, कई मेल अपेक्षित मेल मिले। कृत्या के साथ
कुछ सीमाएँ भी थीं। हालाँकि हम कवियों का यात्रा व्यय उठाने में
असमर्थ थे, फिर भी कई कवियों ने भाग लेने की इच्छा जाहिर की।
अधिकतर ने यही लिखा कि वे कृत्या के बहाने भारत देखना चाहते हैं।
किन्तु उत्सव के करीब आते- आते केवल 16 कवियों के आने की संभावना बन
पाई, जो अपनी देश की संस्थाओं की मदद से आ रहे थे। ये कवि आईरलैण्ड, इटली, रोम, कोरिया, हांककाँग, क्रोस्चिया
(यूरोप)
बैल्जियम,
इंग्लैण्ड और अमेरिका से आ रहे थे। निसन्देह यूरोप के वासी थे, जो
अमेरिकनों की अपेक्षा कहीं अधिक अंग्रेजी मानसिकता से ग्रस्त थे।
सभी की पहली भारतीय यात्रा थी, अतः सभी यात्रा से पहले काफी
चिन्तित थे। कुछ कवियों ने साफ- साफ लिखा कि उनका भारत आना
स्वास्थ्य के लिए खतरनाक तो नहीं है? चिकिन गुनिया और मलेरिया की
खबर उनके देश में इस कदर फैली हुई थी कि वे इस तरह तैयारी कर रहे
थे कि मानों उन्हें युद्ध पर जाना हो। हालाँकि कृत्या की तरफ से
उनके रहने का बहुत अच्छा इंन्तजाम हुआ था, फिर भी उनका भारत के
प्रति भय मन को कचोट रहा था कि हम स्वास्थ्य के क्षेत्र में इतने
पिछड़े क्यों है। मैं बार- बार उनका हौसला बढ़ा रही थी कि हम इतने
पिछड़े नहीं हैं, हमारे पास अच्छी स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध हैं,
किन्तु मन ही मन डर भी रही थी क्यों कि असलियत जानती थी।
असली समस्या तो तब सामने आई जब विदेशी कवियों ने त्रिवेन्द्रम की
जमीन पर पाँव रखा। भारतीय भीड़ यूरोप के छितरे प्रदेशों में बसे
नागरिकों के लिए कितनी खौफनाक हो सकती है, इसका हम अन्दाज भी नहीं
लगा सकते हैं। जिसे हम भीड़ कहते हैं, वह उनके लिए अस्तवस्तता बन
जाती है। समस्या तो एयर ड्रम से ही शुरु हो गई थी जब हवाई उड़ाने न
केवल देर से थी बल्कि सूचना की भी कमी थी। यही स्थिति होटल में थी,
हमारे द्वारा बार- बार हिदायत देने के बावजूद होटल में रूम सर्विस
बहुत बेकार थी। इस तरह की स्थितियाँ हम भारतीयों के लिए नई नहीं,
किन्तु विदेशियों के चेहरे का रंग बिगड़ने लगा। स्थिति को सामान्य
बनाने के लिए हम उन्हे एक रेस्टारेण्ट में ले गए। वहीं पर
अनौपचारिक बातचीत के दौरान हमने उनसे पूछा -- आप लोग भारत के बारे
में क्या जानते थे, और अब कैसा लग रहा है? उनमें से अधिकतर लोगों
ने घुमाफिरा कर जवाब दिया। लेकिन बैल्जियम से आए आर्गो स्पीयर ने
कहा-"भारतीय मुस्लमानों से नफरत करते हैं, और यहाँ स्त्रियों की
स्थिति बेहद खराब है, उन्हें मार दिया जाता है।" मैंने झैंपते हुए
कहा, "नहीं नहीं ... ऐसी बात तो नहीं है, देखिए हमारी कृत्या
ट्रस्ट के जनरल सैक्रेट्री मुहम्मद कुंजुंर मेत्तरु मुसलमान है।"
इस पर आर्गो ने अपने देश की एक पत्रिका निकाली, जिसमें गुजरात के
दंगों के बारे में लेख था। उसमें वे ही चित्र थे जिनके कारण दंगे
और भड़के थे। साथ ही उस पत्रिका में स्त्रियों की समस्या से
सम्बन्धित लेख भी था। वह पत्रिका विश्व के पश्चिमी देशों पर
केन्द्रित थी, जिसमें कोरिया, चीन आदि देशों के बारे में छपे लेख
उनकी उन्नत्ति आदि से सम्बन्धित थे, किन्तु भारत, पाकिस्तान, बंगला
देश के बारे में छपे लेख नकारात्मक थे। मैं न तो भारतीय समस्याओं
के प्रति आँख मून्दना चाहती हूँ, और न ही महानता का गुणगान, किन्तु
मुझे लगा कि जब किसी लेख को देश का प्रतिनिधित्व करना हो तो वह देश
के सकारातचमक रूप को प्रस्तुत करे तो अच्छा है। हम लोगों ने बड़ी
सफाई से भारत की महिमा का गुणगान करना शुरु किया, किन्तु चारों तरफ
फैली गन्दगी और बदबू का हमारे पास कोई जवाब नहीं था।
हम अपने लेटलतीफी के स्वभाव को इतना पचा चुके हैं कि वक्त पर कोई
भी काम समय पर करने की आदत ही नहीं, यही कारण था कि हमने उत्सव के
उद्घाटन के लिए गवर्नर को आमन्त्रित किया था। मुझे लगा था कि समय
पर कार्यक्रम शुरु करना है तो गवर्नर से अच्छा कोई नहीं हो सकता
है। लेकिन कितना चाह कर भी मैं टैक्सी सर्विस को समय पर नियन्त्रित
नहीं कर पाई। मुझे बार- बार महसूस हो रहा था कि विदेशी कवि कुछ सहज
नहीं हो पा रहे हैं., तो मैंने हर कवि से अलग-
अलग बात करनी शुरु की। मेरा उद्देश्य यही था कि उन लोगों को यह समझ
में आए कि समय की पाबन्दी की सीमा आदि कई अन्य समस्याओं की उपज
मात्र है, गैर जिम्मेदारी नहीं। मैंने पाया कि साबसे ज्यादा
परेशानी आयिरिश कवियों को हो रही थी, संभवतः वे स्वभावतः अधिक
संवेदन शील हैं। आयिरिश आर्ट काउंसल ने कविता के सम्बन्ध मे जितना
काम किया है, शायद ही किसी और देश में किया गया होगा। अनुशासन और
स्वातन्त्र्य दोनों को साथ लेकर चलना आयिरिश कवियों की विशेषता है।
मैंने उस ग्रुप के प्रतिनिधि पेट्रिक काटर से बात की, तो उनका कहना
था कि - उनके देश में कवितोंत्सव की रूपरेखा ही अलग होती है, वहाँ
कुछ कवियों का बन्द कमरे में बैठ कर सार्थक (कितना सार्थक?)
सवाद,आपसी विनिमय आदि महत्वपूर्ण हैं। वहाँ इतने ज्यादा संख्या में कवि पाठ
नहीं करते।

मैंने उन्हें कृत्या कवितोत्सव का उद्देश्य समझाया कि हम कविता को
समाज के केन्द्र में लाना चाहते हैं, जिसके लिए हमे बेहद बौद्धिकता
के आवरण को उतार कर कविता को उत्सव का रूप देना है। यही नहीं
भारतीय मानसिकता उत्सवप्रियता की है, अतः कभी-कभी कविता को
केन्द्र में लाना भी जरूरी है। उन्हें बात तो समझ में आई, किन्तु
उत्सव में आई भीड़ से कतरा कर अकेले घूमना चाहते थे। दरअसल यूरोपीय
देश उस संस्कृति के अनुयायी हैं, जहाँ व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और
सामाजिक स्वन्त्रतता में एक गुणात्मक तालमेल है। हम लोगों ने उनसे
व्यक्तिगत रूप मे स्वतन्त्र होने की बात तो सीख ली, किन्तु उस
स्वत्त्वन्त्रता का समाज के साथ तालमेल बैठाना नहीं सीख पाए। लेकिन
यह भी बात महत्वपूर्ण है कि उन लोगों की एकान्तप्रियता उनके समाज
और संस्कृति के लिए भी हानिकारक है,जिसे वे अभी तक समझ नहीं पा रहे
हैं। इस बात को कुछ हद तक उन्होंने समझा भी। आर्गो स्पीयर ने आशान
स्मारक में अपने भाषण में इस बात को अलग ढंग से पहचाना। उन्होंने
कहा कि आज भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी जन- शक्ति है, भविष्य में जब
हमारी जन संख्या खतरे में आ जाएगी तो हमें जन शक्ति के लिए भारत का
मुँह ताकना पड़ेगा। मुझे लगा कि विदेशी मनों की एकान्तप्रियता
सन्नाटे में बदल रही है, जिसे वे भी पहचान रहे हैं, लेकिन समझ नहीं
पा रहे हैं। यही बात इटली के ड़ाबर्ट पिपरनों ने दूसरे तरीके कही।
उन्होंने कहा कि पहले दिन में अच्छा खासा घबरा गया था। मुझे समझ
में ही नहीं आ रहा था कि किस तरह से इस भीड़ को स्वीकारू धीरे में
यहाँ रमने लगा। मैंने पिपरनों से पूछा कि क्या वे कबी जंगल गए
हैं, तो पिपरनों अचानक बोल उठे... हाँ पहले दिन मुझे लगा कि मैं
जंगल में आ गया हूँ। मैंने मुस्कुरा कर कहाः फिर तो आपकों अच्छा
लगा होगा, क्यों कि कलाकार बगीचे की जगह जंगल को पसन्द करते हैं।
हम भारतीय अभी भी अकृतिम जीवन को स्वीकारते हैं। शायद यहीं हमारी
शक्ति है, यही हमें बचाए रखती है। आइरिश कवयित्री लाइना नें एक
छिपकली देखी तो बच्चों जैसे चिल्ला उठीं, उन्होंने अपनी जिन्दगी मे
पहली बार छिपकली को इस तरह से आराम से घूमते देखा थे। मैंने उनसे
कहा कि हम किसी की स्वतन्त्रता को नहीं खोते, न आदिवासियों की और न
ही जीव जन्तुओं की। आखिरी दिन हम लोगों ने भ्रमण के लिए गए दो खास
जगहें चुनी थी, एक तो भारतीय स्पेस सैन्टर , दूसरा महाकवि आशान की
जन्मभूमि। यूरोप स्पेस विज्ञान की दृष्टि से अग्रगणनीय नहीं है,
यही कारण था कि इस क्षेत्र में वे भारत की उपलब्धि देख कर काफी
प्रभावित थे। रोबर्टो आदि कई कवियों ने स्वीकारा कि उन्होंने यह
कभी नहीं सोचा था कि भारत इस क्षत्र में तना उन्नत है। मुझे याद
आया कि जब कभी राकेट प्रक्षेपण होता है, प्राइवेट टीवी चेनल इसका
उल्लेख तक नहीं करते है। उनकी सूची में नकारात्मक खबरे ज्यादा होती
हैं, शायद हम अपने आप को नकारात्मक रूप में देखना सीख गए हैं। मुझे
अमेरिका का प्रसिद्ध टी वी चैनल "ओपरा" की याद आई, जिसमें भारतीय
दहेज प्रथा पर एक फिल्म दिखाई गई थी,फिल्म इतनी भयानक थी कि वहाँ
उपस्थित सभी लोगों ने कहा कि अच्छा है कि हम भारत में नहीं हैं।
मैं यह जानती हूँ कि वह फिल्म सच्चाई बयान कर रही थी, किन्तु मुझे
यही लगा कि भारत मात्र समस्या तो नहीं है, हम इसके सकारात्मक रूप
को प्रकट क्यों नहीं कर पाते? शायद हम इसके आदि हो गए हैं। आजकल
सकारात्मक छवि के रूप में आध्यात्मिकता की चासनी को भी परोसा जा
रहा है, अचानक सैकड़ों -जारों जगत गुरु की खेती उग आई है। यह भी
विदेशियों की दृष्टि में भारत है। यानी कि जिस तरह कभी भारत
संपेरों और जादूगरों के नाम से जाना जाता था, वही अब आध्यात्मिक
गुणों और नकारात्मक सामाजिक स्थितियों के रूप में विदेशियों के
जेहन में स्थान बना रहा है। यहाँ पर भारत की सकारात्मक
प्रवृत्तियाँ, जैसे कि बौद्धिक योग्यता , अन्तरिक्ष आदि के क्षेत्र
में उन्नत्ति आदि पर्दे के पीछे ओझल हो गई हैं। इस बारे में मेरी
बैल्जियम से आए आर्गो से काफी बहस हुई, वे बार- बार कह रहे थे कि
यूरोप में भारत के नाम पर कोई ध्यान नहीं देता, उसकी कोई पहचान
नहीं है, और मैं बार- बार उन्हे कह रही थी कि यह उनकी मानसिक छोटापन
है, अमेरिका की तकनीकि बोद्धिकता के पीछे भारतीय क्षमता को नकारना
यूरोप की अपनी नकारात्मक सोच है। हो सकता है कि आने वाले वर्षों
में यूरोप को भी भारत से बौद्धिकता आयातित करनी पड़ी।

मैं यह भी जानती हूँ कि असली भारत क्या है, यह तो हम ही नहीं पहचान
रहे हैं, विदेशियों को क्या समझा पाएंगे?
सबसे अजीब बात है हम लोगों की उपनिवेशवादी मानसिकता, इस मानसिकता
के तहत हम चमड़ी के रंग से कुछ ज्यादा ही प्रभावित हो जाते हैं।
मैंने देखा कि न केवल हमारा मीडिया, बल्कि समाज के अन्य लोग भी
सफेद चमड़ी के आसपास घूम रहे थे। इस पर इराक की मेहनाज ने टिप्पणी
भी की थी कि आप भारतीय लोग यूरोपीयों के इतने दीवाने क्यों है? बात
मैं समझ रही थी, किन्तु हर बार घुमा
-फिरा कर अपने देश के पक्ष में
दे देती थी , किन्तु मन ही मन कसमसा भी जाती थी।
कुछ भी हो, इस उत्सव ने मुझे दूसरों की दृष्टि से भारत देखने का
मौका जरूर दिया, शायद यह आत्ममंथन की शुरुआत है मेरे लिए।
रति
सक्सेना
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