कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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त्रिलोक महावर

दरख्त जब अशांत हैं

बेजुबान
दरख्तों की भी तो
होती है जान
चोट लगने पर
रोते हैं
रिसते हैं
उनके भी जख्म
देखा है
किसी ने रोते हुए
सिसकते हुए
वादियों में
सुना है उन्हें
गुनगुनाते हुए
हवा के साथ
खिलखिलाते हुए
बेशक करते हैं
प्यार, दर
ख्त भी
सावन की घटाओं से
भीगते हैं
पहली फुहार से
झूमते हैं
पहाड़ों की गोद में
दरख्त जब शांत हैं
तपस्वी हैं
मौनव्रती हैं
गहन साधना में लीन
दरख्त जब अशांत हैं
तूफान हैं
भयंकर तूफान
दरख्त दोस्त हैं
आदमी से कहीं बेहतर
सब कुछ लुटाकर भी
उफ नहीं करते।


( त्रिलोक महावर की अन्य कविताएँ )


हिब्रू कविताएँ (HEBREW POEMS )

इरन तेलगव की कविताएँ
( ERAN TZELGOV)

*
रात
हमने तुम्हारे कदमो की आहट सुनी
तुम्हारी नीली परछाई काँपती रही
जब तक कि मैं सो नहीं गया

रात को तुम्हारी परछाई से जलन हुई
वह तुम्हारे डर की तरह नीली पड़ गई
उसी दिन,जिस दिन तुम गई थी

यदि तुम्हारी परछाई जल होती
मैं उसे घूँट- घूँट पी लेता
सुबह की चाय के प्याले के साथ
बेहद कमजोर
तुम्हारे बिना

(एरेन जेल्गोव की अन्य कविताएँ)
 


नचिकेता

किसलय फूटी

सूखे तरू में किसलय फूटी

बच्चों के लाल अधर जैसी
मुस्काते गुलमोहर जैसी
फूली है संजीवन बूटी

हरियाली की पायल छनकी
अंखुआयीं यादें बचपन की
सपनों की चिर तन्द्रा टूटी

अब जीवन आँखें खोलेगा
मिहनत की जेब टटोलेगा
जो गयी सदा छल से लूटी।

(नचिकेता की अन्य कविताएँ )


श्रीकान्त वर्मा की कविताएँ

डायरी का पन्ना
(26 सितम्बर 1985, बृहस्पतिवार नई दिल्ली)

कुछ का व्यवहार बदल गया। कुछ का नहीं
बदला।
जिनसे उम्मीद थी, नहीं बदलेगा
उनका बदल गया।
जिनसे आशंका थी,
नहीं बदला।
जिन्हें कोयला मानता था
हीरों की तरह
चमक उठे।
जिन्हें हीरा मानता था
कोयलों की तरह
काले निकले।

सिर्फ अभी रुख बदला है, आँखे बदली है,
रास्ता बदला है।
अभी देखो
क्या होता है,
क्या क्या नहीं होता।
अभी तुम सड़कों पर घसीटे जाओगे,
अभी तुम घसिआरे पुकारे जाओगे
अभी एक एक करके
सभी खिड़कियाँ बन्द होंगी
और तब भी तुम अपनी
खिड़की खुली
रखोगे,
इस डर से कि
जरा सी भी अपनी
खिड़की बन्द की तो
बाहर से एक पत्थर
एक घृणा का पत्थर
एक हीनता का पत्थर
एक प्रतिद्वन्दिता का पत्थर
एक विस्मय का पत्थर
एक मानवीय पत्थर
एक पैशाचिक पत्थर
एक दैवी पत्थर
तुम्हारी खिड़की के शीशे तोड़ कर जाएगा
और तुम पहले से अधिक विकृत नजर आओगे
पहले से अधिक
बिलखते- बिसूरते नजर पड़ोगे
जैसा कि तुम दिखना नहीं चाहते
दिखाई पड़ोगे।

यह कोई पहली बार नहीं है
जब तुम्हें मार पड़ी है
कम से कम तीन तो
आज को मिला कर
हो चुके
मतलब है तीन बार,
मार।
और ऐसी मार कि तीनों बार
बिलबिला गया
निराला की कविता याद आती है
"जब कड़ी मारे पड़ीं,
दिल हिल गया।"

(दिल्ली आलोचना जुलाई सितम्बर १९८६ में प्रकाशित)

( श्रीकान्त वर्मा की अन्य कविताएँ)
 


बाबी लूरी ( Bobbi Lurie) की कविता

सफेदी , जिसने सब कुछ फँक लिया

सफेदी , जिसने कि सब कुछ ढँक लिया
अँधी हो रही है

इसने मेरी माँ को भी ढँक लिया है, उनकी तेजस्वी उपस्थिति
गायब हो रही है

*
कब्र के भीतर अँधेरा है, बाहर मिट्टी उपजाऊ और
खूशबू लिए है
माँ को अपने भीतर समा लेने को उतावली भी

एक अजीब से कोमल अहसास ने मुझे जकड़ लिया है

*
(बैचेनी)
(बैचेनी)

प्यार में खतरा खूबसूरती है और खूबसूरती प्यार


( बाबी लूरी की अन्य कविताएँ
  )


रति सक्सेना की कविता


आलिंगनः खत की आखिरी पंक्ति
आलिंगनः मैंने पढ़ा, पहली पंक्ति की तरह
भाल के ऐन ऊपर सिरे के बीचो- बीच
सुलग उठा एक सिरा नीन्द का

आलिंगनः दर्द जाग उठा
आलिंगनः नीन्द बुदबुदाई
आलिंगनः मौत मुस्कुराई

नसनस चटख उठी
मैं खिल उठी कनेर की कली बन
 

(रति सक्सेना की अन्य कविताएँ )
 


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