( ERAN TZELGOV)
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मैंने अपने सिर में फूल उगाए
आग पंखुड़ियाँ,धुँए के धमाके
आँसू गैस की खुशबू साँसों में
मैं राजा था, राजा हूँ, और राजा होंउंगा
मेरे सिर के सारे खेतों में
मैं महान हूँ
सभी भाइयों से महान
वे पाप काटते हैं
कितना दर्दनाक
कितना खुबसूरत
और मैं
मैंने अपने सिर में फूल उगाएं है
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एक आदमी रात को सोने को जाता है
उसकी गर्ल फ्रैण्ड की हँसी बगल में
और वह कामना करता है
वह मोहब्बत करता है
वह थक जाता है
एक आदमी रात को सोने को जाता है
उस लड़की के आँसू उसके पाँव भिगोते हैं
और वह थकता है
और वह सिकुरता है
और वह मुरझाता है
एक आदमी रात को बाहर जाता है
उस लड़की की हँसी पहाड़ों से टकराती हैं
और वह आदमी, जो रात को घूमने जाता है,
क्या है उसका, उस रात में
उस रात में उसका अपना क्या है?

एक आदमी रात को बाहर जाता है
अपनी रात में
वह है
वही
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धीरे- धीरे
हर बिल्ली
आदी हो जाती है
आदमी की थपथपाहट के
इसके बिना और कोई
रास्ता भी तो नहीं
यही है तो है बीच में है
दूध से भीगे जबड़े
और चिड़िया के टूटे पंखों के
और कभी पहले खोये प्रेमी से टपकते जहर
प्याले से बूट तक दबे पाँव चलने के
वही उबासी!
वहीं चमकती आँखे
सोने के कमरे में कोई आहट
थोड़ा- थोड़ा करके
हर बिल्ली समझ जाती है
कि कैसे होता है यह सब
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बोआजं यानिव की कविता
( BOAZ YANIV)
इस कविता को जोर से पढ़ना चाहिए
एक छोटे कमरे में
जिसमें केवल एक खिड़की हो
जो कि समन्दर की और खुलती हो
(यदि समन्दर न हो तो व्यस्त हाई वे काम चल सकता है)
उमस महसूस करते हुए
शुरुआत से अन्त तक, हर पंक्ति को
उंगली के पौरों पर गिनते हुए
जब तक शोर बह ना जाए

जब तक पन्ने फिसल कर बिखरने ना लगें
दूसरा विचार यह भी है कि
कमरे की जरूरत ही नहीं
समन्दर की भी नहीं
(शायद हाई वे हो)
उमस भी की कोई जरूरत नहीं
न ही उंगलियों के पौरों की
दरअसल कविता ही जरूरी नहीं