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जर्मन कवि राइनेर मारिया रिल्के कृत इन कविताओं का अनुवाद अंग्रेजी से हिन्दी में कवि, कथाकार राजी सेठ द्वारा किया गया है। ये कविताएँ रिल्के के पहले काव्य संग्रह Books of Hours के पहले भाग Book of Mankish Life से ली गईं हैं। यहाँ कवि ने अपने को एक मुनि( Monk) मानकर अपनी परिकल्पना के प्रभु को सम्बोधित किया है। ये पाँच कविताएँ उसी शृंखला की हैं।

1

तुम्हारे ही शब्दों को मैंने पढ़ा
तुम्हारे सयाने स्नेही हाथों के संकेतों, के
इतिहास से जाना
आगे आने वाले आकारो को
अपनी बाँहों के घेरे में बाँधते
तुमने ऊची आवाज में कहा - जियो
फिर आहिस्ता से कहा-मरो
ऐसे ही बने रहो
कहते रहे तुम अथक
यही कथन सतत्
हालाँकि कोई मृत्यु नहीं हुई
जब तक हत्या ही नहीं की गई

फिर तुम्हारी इन अविकल आवृत्तियों में से
उभरी एक दरार
चीखती सी पुकार
इन आवाजों को बिखराती चतुर्दिक
जो पहले ही
सदयता से समंजित करते, तुम्हें
व्यक्त कर चुकी थी
रसातल को पुल की तरह पाटते
ले जा रही थी, तुम्हें
आर-पार

अब तक हकलाते हुए वे केवल
तुम्हारे नाम के टुकड़े
बिखेरते रहे


तुम
मेरे पवित्र एकान्त
अपने समृद्ध, स्वच्छ विस्तार में
एक खिले हुए से उपवन
तुमने बन्द कर रखे हैं
अपने स्वर्णद्वार
जिसके बाहर कितनी ही आकाँक्षाएँ
प्रतीक्षारत

दूर है शहर
शहर का गर्दोगुबार
पास बहते सोते का कलरव
इधर से उधर झूमते पेड़ों के शिखर
बनाते मुझे तन्द्रिल

जंगल जंगली है इतना
संसार बृहदाकार
मेरा मन उन्मुक्त
निर्विकार
अलस एकान्त गोदी में
ले रखा है मेरा सिर

क्या तुम जानती हो, मैं
चुपके से सरक लूँगा
कोलाहली परिधि से दूर
खिले ओक के वृक्षों के ऊपर
उगेगा जब झिझका तारा
साँझ के धुधलाए चरागाहों में
खोज निकालूँगा वेराहें, जो
किसी ने अभी तक खूंदी नहीं होंगी
मन में जाग रहा होगा
एक ही स्वप्न
आओ, तुम भी साथ आओ



संसार के सम्राट वृद्ध हैं
उनके कोई वारिस नहीं होंगे
मृत्यु उनके पुत्रों को हड़प चुकी
जब वे छोटे ही थे
निबल कन्याएँ
हल्का सा मुकुट तक संभालने में असमर्थ
जल्दी ही च्युत हुई

भीड़ ने मुकुट को सोने के टुकड़ों में बदल डाला
संसार के उग्र कुटिल स्वामी ने
अपनी इच्छा पूर्ति के लिए
भट्टी में पिघलाया
पर नियति उसकी दासी नहीं थी

गृह विरही धातु
जीवन स्पृश से विहीन
इन टकसालों, चलित चक्कों को
त्यागने के लिए आतुर
वह यंत्रालयों,, तिजोरियों से दूर
टकटकी लगाए खड़े उन पर्वतों की
शिराओं में फिर से बहना चाहती है
जिनकी निकटता में विचरती
वह कभी आई थी



अगर नीरवता हो पूरी, पूर्णतम
अगर सारा बेतरतीब और लगभग
पडोसियों के हास्य के साथ साथ मूक हो जाए
अगर मेरी इन्द्रियों में सरसराता शोर
तुम्हारे लिए
मेरे चौकस बने रहने में बाधा न दे

तब मैं मन ही मन
सहस्रशः तुम्हें चिचारूँगा, और
कगार के बाहर तक बहता हुआ
तुम्हे पा ही लुंगा

फिर एक ठहरे स्मित के बीच
मानों कृतज्ञ भाव से भरकर
तुम्हे दे दूँगा, उन्हें
समस्त जीवों को



लो निकाल लो मेरी आँखें: मैं तब भी तुम्हे देख सकूँगा
बन्द कर दो मेरे कानः तुम्हें सुन सकुँगा
न भी हो पैरः तुम तक पहुँच लूँगा
न रहे जुबानः इच्छा शक्ति निवेदन कर लेगी
तोड़ दो मेरी भुजाएँ: जकड़ लूँगा हृदय से
जैसे जकड़ते हैं हाथ
अवरुद्ष कर दो हृदयः धड़कन मस्तिष्क में धपकेगी
फूंक दोगे मस्तोष्क
रक्त धारा तुम्हें धारन कर लेगी
 

 

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