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अमित
सिहाग
कंटीली कीकर
अब तक
जितने शहर बदले
जितने घर बदले
पास या दूर
पा ली मैंने कंटील कीकर
कहीं झाड़ सी
कहीं पेड़ सी
नन्हें पत्तों से लदी कीकर!
बारिश में टपकती
सर्दी में ठिठुरती
गरमी में झुलसती
ऊँची खड़ी
नीचे झुकी
जंगल से अड़ी
रास्ते में पड़ी
नुकीले काँटों से सजी
कीकर
जैसी भी हैं
कंटीली ही सही
ईंधन के लिए
बार- बार कटी
सहमी, डरी
पीले फूलों से लदी
मुझे लगी प्यारी
कीकर!
(अमित सिहाग
की अन्य कविताएँ )
लक्ष्मी कण्णन की कविताएँ
आकार लेता हूँ

मैं जल
उस पात्र का आकार लेता हूँ
जिसमें होता हूँ
वक्र और गोल
मिट्टी का घड़ा बन जाता हूँ
लम्बी और पतली बोतल की देह में ढ़ल जाता हूँ
अथवा मेज पर पड़ा गिलास
जिस पात्र में करता प्रवेश
वही वर्ण, वही वेश
मैं हूँ कि देखी तुमने पारदर्शिता
मैं हूँ कि दृश्यमान हुई तरलता
मैं नहीं सा कुछ
फिर भी कितने रूपाकार
इतना आत्महीन
हर पातर से तदाकार
पात्र तोड़कर मुक्त करोगे, तो
प्रवाह बन जाऊँघा
गुड़गुड़ाते, दौड़ते
सूर्य की हीरक झिलमिल को पकड़ूँगा
चिकनी चट्टानों पर भागूँगा तेजी से
भेंटने को अपनी माँ
जो कहीं जाती नदी
तब हम साथ- साथ पिघलेंगे
अपने स्वत्व के सागर में
अशान्त जल श्रंखला से
अनुवादः राजी सेठ
(लक्ष्मी
कण्णन
की
अन्य कविताएँ)
सुदर्शन प्रियदर्शिनी की कविता
ढब

रहस्यों को
जानने का
पहले से ही
गर होता ढब
तो जिन्दगी--
न होती--
निबौरियों का फैलाव...!
(
सुदर्शन
प्रियदर्शिनी की अन्य कविताएँ))
विजय नाहटा की
कविता
यात्रा
--पाँच चित्र
१
एक यात्रा में दीप्त रहती
पुरातन
यात्राओं की कौंध
प्रेत छाया से मंडराते
कुछेक दृश्य बिम्ब
स्मृति कुछ गोपनीय घटनाओं की
किन- किन लोगों के दमकते चेहरे
दर छिटकता जाता दृश्य
दीठ की प्रत्यन्चा से छूटता
अथाह मौन
सन्नाटे के शिलाखण्ड पर स्मृति के निर्मल जल
की तरह बहता अविराम
अनाम अज्ञात दब जाता
सहज सी विस्मृति के मलबे तले
हर यात्रा में
गहरे दर गहरे!
(विजय नाहटा
की अन्य
कविताएँ)
सुहेल अख्तर
की
कविता
एक था पेड़
एक पेड़
एक खुले मैदान में
नीले आकाश के विस्तार मैदान के नीचे
दूर तक फैली हुई
जड़ कठोंर धरती पर
एक बन्दी सरीक
जकड़ा हुआ
बेहद अकेला था वह पेड़
अपने परिवेश में
ऐसा भी नहीं था
कि वह उस मैदान में तन्हा हो
लेकिन निकटतम पेड़ों का झुण्ड
इतना दूर था
कि वह उन से बातें नहीं कर सकता था
उस झुण्ड के पेड़ भी
उस से कोई नाता
नहीं रखना चाहते थे
उसे अपराधी सरीत उन्होंने
पेड़ समाज से बहिष्कृत कर दिया था।
(
सुहेल अख्तर
की कविता-आगे
)
कुसुम की कविता
हवा
पेडो को झकझोरती ऑचल
ऊडाती हे हवा
जाने किसकी याद में
बेचैन लगती है हवा
मनचली हिरणी सी वह भर
भर कुलाचें हंस रही
जाने किससे मिलने को
बेचैन लगती है हवा
किन गुलाबों को
सहलाती सूघती आती है
यह
उनकी खुशबू लेके फिर
मदमस्त लगती है हवा
गुनगुनाती चल रही
भंवरों तितलियों के
संग
फिर नदी के जल में भी
लहरें ऊठाती है हवा
कितना भी रोको उसे पर
रूक नही, पाती है वह
जाने क्या संदेश ले
उडती ही जाती है हवा
याद बादल को जाने
कहां उडा ले जाती है
पलभर को ही सही मन में
पुलक भरती है हवा
( कुसुम की अन्य
कविता )
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