कुसुम की कविता


वो लम्हा

वो लम्हा जो
तुम्हारे साथ गुजरा
था वो अच्छा था
वही लम्हा जो फिर इक
बार जी पाते तो अच्छा
था

तुम्हें जब याद करते
है अश्क आखों से झरते
हैं
तुम इन अश्कों को गर
मोती बना लेते तो
अच्छा था

वही हैं चांद तारे
फूल कलियां सब नजारे
हैं
तुम्हारी ही कमी है
इक
जो तुम आते तो अच्छा
था

वो नगमा प्यार का जो
हमने तुमने
गुनगुनाया था
वो नगमा फिर से
हमतुम गुनगुना पाते
तो अच्छा था

दूर जाकर तो जैसे
भूल बैठे हो मुझे
लेकिन
कभी आकर चमन दिल का
खिला जाते तो अच्छा
था

तुमको रूठे हुए भी
कितना असाँ बीत गया
है
तुम वे शिकवे सभी गर
भूल जो पाते तो अच्छा
था

 


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