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विपक्ष के कवि 'धूमिल'
               प्रस्तुति: सुशील कुमार


सुदामा पांडे 'धूमिल' साठोत्तरी कवियों में सर्वाधिक प्रमुख हैं जो भाषा के जंगल में कविता के वर्जित प्रदेशों की खोज करते हुए अपने प्राणांत तक मानवीय सरोकार के कवि बने रहे। ब्रेन-ट्युमर की हौलनाक नारकीय यातनाओं से गुजरते हुए 10 फरवरी,1975 को नौ बजकर पचास मिनट पर लखनऊ मेडिकल कालेज के बेड न.-2 पर धूमिल ने अपने मजबूत ढांचे को मात्र 40 की वय के भीतर ही हमेशा के लिये छोड़ दिया। उनकी असामयिक मौत से हिन्दी कविता पर मानो वज्रपात हो गया क्योंकि उनकी जोड़ का फ़िर दूसरा कवि अब तक हिंदी ने नहीं जना। उनकी काव्य-शैली की छाप एक पूरे समय की कविता पर है। अपनी अलग शैली बनाने वाले ऐसे कवि इतिहास में बहुत थोड़े ही होते हैं जिन्हें एक पूरी पीढ़ी अपनी अभिव्यक्ति के लिए अनिवार्य समझती हो। शुद्ध कविता के विरोध में अपना एक खास मुहावरा विकसित कर उन्होंने हिंदी-कविता को अपने शब्द दिये। काव्यभाषा की प्रचलित अवधारणा को तोड़कर नये प्रतिमान स्थापित करने के लिए जिस अपरिमित साहस और नये काव्यविवेक की जरुरत होती है, उसका निश्चित प्रमाण धूमिल की कविताएं देती हैं।
काव्यात्मक उर्जा और नैतिक साहस में अद्वितीय पहचान बनानेवाले धूमिल के जीवनकाल में मात्र एक ही काव्यसंग्रह ही प्रकाशित हो पाया- संसद से
सड़क तक, जिसका आतंक आज तक कविता-साहित्य पर अनुभव किया जा सकता है। उनकी दो मरणोत्तर कृतियां भी हैं- 'कल सुनना मुझे' और 'सुदामा पांड़े का प्रजातंत्र'।

धूमिल भावनाओं के स्थान पर गहरे विचार के कवि हैं। यथार्थ की गहराई से टटोल के कारण उनकी कविताएं अर्थ-गुम्फित और कहीं-कहीं वक्र भी हो गयी हैं जिस पर पाठकों को गहन पैठ बनाने के लिये समय-सापेक्ष उनके मन में व्यवस्था के प्रति हिंलोरें लेती अराजकता, उनके जीवन के संघर्ष की जटिलता और उनकी रचना-प्रक्रिया को बारीकी से समझना पड़ेगा और उनकी रचना को कई बार, और मन देकर पढ़ना होगा। उनके मित्र और लब्ध-प्रतिष्ठ समालोचक श्री काशी नाथ सिंह ने लिखा है --"रचना में चली आ रही वायवी, काल्पनिक और व्यक्तिगत भावभूमि को छोड़कर उसने कविता को समसामयिक यथार्थ से जोडा।
उसने कविता को बिंबों की घटाओं से निकाला।
उसने कविता को अमूर्तन के अंधेरे से उबारा।
वह कहता था- "भाषा अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रही है। कुछ हैं जो भाषा को खा रहे हैं।" उसने भाषा को उसकी जिम्मेदारी की जगह तैनात किया। उसने कविता को एक खास तरह की मुंहफट और खुर्राट ज़बान दी।
उसने कहा कि " पहले लोग कहते थे, कविता करेंगे। आज हम कहते हैं, कविता हो या न हो, हम आदमी करेंगे।"अगर धूमिल की उपर्युक्त स्वभावगत आग्रहों को दृष्टिपथ में रखते हुए हम उनकी कविता-लोक से गुजरेंगे तो यथार्थवादी साहित्य का सच्चा और खरा दर्शन कर पायेंगे, तो आइए, इस परिप्रेक्ष्य में उनकी कुछ बेहद चुनिंदा कविताओं को देखें--

धूमिल की कविताएं

रोटी और संसद
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एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूं--
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।

धूमिल की अंतिम कविता जिसे बिना नाम दिये ही वे संसार छोड़ कर चल बसे ।

शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो
क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज़ है या
मिट्टी में गिरे हुए खून
का रंग।

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
घोडे से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।

लोकतंत्

वे घर की दीवारों पर नारे
लिख रहे थे
मैंने अपनी दीवारें जेब में रख लीं

उन्होंने मेरी पीठ पर नारा लिख दिया
मैंने अपनी पीठ कुर्सी को दे दी
और अब पेट की बारी थी
मै खूश था कि मुझे मंदाग्नि की बीमारी थी
और यह पेट है

मैने उसे सहलाया
मेरा पेट
समाजवाद की भेंट है
और अपने विरोधियों से कहला भेजा
वे आएं- और साहस है तो लिखें,
मै तैयार हूं

न मैं पेट हूं
न दीवार हूं
न पीठ हूं
अब मै विचार हूं।

धूमिल कविताएं नहीं, पंक्तियां लिखते थे। जो भी काम का जुमला उनके कान में पड़ता, उसे टांक लेते और बाद में कविता में 'अमल्गमेट' कर उसे 'चैनेलाइज' कर देते। उनकी मशहूर कुछ सुक्तियां आज भी बहुत शिद्दत से याद की जाती है। आप भी इनमें से कुछ को यहां देखें --

न कोई प्रजा है
न कोई तंत्र है
यह आदमी के खिलाफ़
आदमी का खुलासा
षड्यंत्र है।

कविता
घेराव में
किसी बौखलाये हुए आदमी का
संक्षिप्त एकालाप है।

वह कौन -सा प्रजातांत्रिक नुस्खा है
कि जिस उम्र में
मेरी मां का चेहरा
झुर्रियों की झोली बन गया है
उसी उम्र की मेरी पड़ोस की महिला
के चेहरे पर
मेरी प्रेमिका के चेहरे-सा
लोच है।

मैं सोचने लगता हूं कि इस देश में
एकता युद्ध की और दया
अकाल की पूंजी है।
क्रांति -
यहां के असंग लोगों के लिए
किसी अबोध बच्चे के -
हाथों की जूजी है।

और कहते हैं
सौंदर्य में स्वाद का मेल
जब नहीं मिलता
कुत्ते महुवे के फूल पर
मूतते है

मेरा गुस्सा -
जनमत की चढी हुई नदी में
एक सडा हुआ काठ है।
लन्दन और न्युयार्क के घुन्डीदार तसमों में
डमरु की तरह बजता हुआ मेरा चरित्र
अंगरेजी का 8 है।

बाबू जी ! सच कहूं - मेरी निगाह में
न कोई छोटा है
न कोई बडा है
मेरे लिए, हर आदमी एक जोडी जूता है
जो मेरे सामने
मरम्मत के लिए खडा है

"वह कहता था-यदि कभी कहीं कुछ कर सकती तो कविता ही कर सकती है। धूमिल ने अपनी कविता में शब्दों को सही संदर्भ में रखना शुरु किया-सही जगह पर और लोगों ने देखा कि सही संदर्भ पाकर वे शब्द 'डाइनामाइट' की तरह हुए जा रहे हैं" --काशी नाथ सिंह

जो आदमी के भेस में
शातिर दरिंदा है,
जो हाथों और पैरों से पंगु हो चुका है
मगर नाखून में ज़िन्दा है,
जिसने विरोध का अक्षर-अक्षर
अपने पक्ष में तोड़ लिया है ।

क्या आजादी सिर्फ़ तीन थके हुए रंगों के नाम हैं
जिन्हें एक पहिया ढोता है
या इसका कोई खास मतलब होता है ?

मैंने रोजगार-दफ़्तर से गुज़रते हुए-
नौजवानों को
यह साफ़-साफ़ कहते सुना है-
'इस देश की मिट्टी में
अपने जांगर का सुख तलाशना
अंधी लड़की के आंखों में
उससे सहवास का सुख तलाशना है'
तुमने भी सुना है ?
तुमने क्या सुना ?

इस वक़्त जबकि कान नहीं सुनते हैं कविताएं
कविता पेट से सुनी जा रही है

कविता में जाने से पहले
मैं आपसे ही पूछता हूं-
जब इससे न चोली बन सकती है
न चोंगा ;
तब आपै कहो-
इस ससुरी कविता को
जंगल से जनता तक
ढोने से क्या होगा ?
आपै जबाब दो-
मैं इसका क्या करुं ?
तितली के पंखों में पटाखा बांधकर
भाषा के हलके में
कौन-सा गुल खिला दूं ?

वर्ना तुम कर भी क्या सकते हो
यदि पड़ोस की महिला का एक बटन
तुम्हारी बीबी के ब्लाउज से
(कीमत में) बडा है
और प्यार करने से पहले
तुम्हें पेट की आग से होकर
गुजरना पड़ा है।

कुछ लोग धूमिल की काव्य-प्रतिभा से ईर्ष्या करते हैं, वे उन पर अहमन्य,अश्लीलतावादी, और अतिवादी होने का आरोप लगाते हैं ।

'कविता क्या है ?
कोई पहनावा है ?
कुर्ता- पाजामा है ?'
ना, भाई ना,
कविता-
शब्दों की अदालत में
मुजरिम के कटघरे में खड़े बेकसूर आदमी का
हलफ़नामा है ।'
'क्या यह व्यक्तित्व बनाने की
चरित्र चमकाने की --
खाने-कमाने की--
चीज़ है ?'
'ना, भाई ना,
कविता
भाषा में
आदमी होने की तमीज़ है।'

भाषा उस तिकड़मी दरिंदे का कौर है
जो सड़क पर और है
संसद में और है
इसलिये बाहर आ!
संसद के अंधेरे से निकलकर
सड़क पर आ!
भाषा को ठीक करने से पहले आदमी को ठीक कर।

यद्दपि यह सही है कि मैं
कोई ठंडा आदमी नहीं हूं
मुझ में भी आग है-
मगर वह
भभककर बाहर नहीं आती
क्योंकि उसके चारो तरफ़ चक्कर काटता हुआ
एक 'पूंजीवादी ' दिमाग है

हिंदी साहित्य में अन्य बडे कवियों की तरह धूमिल भी खंडित आलोचना के शिकार हैं,
उनके कृतित्व और व्यक्तित्व पर अभी समग्रता से मूल्यांकन होना बाकी है।

मगर मै जानता हूं कि मेरे देश का समाजवाद
मालगोदाम में लटकती हुई
उन बाल्टियों की तरह है जिस पर 'आग' लिखा है
और उनमें बालू और पानी भरा है।

नहीं-अपना कोई हमदर्द
यहां नहीं है। मैंने एक-एक को
परख लिया है।
मैने हरेक को आवाज़ दी है....
...................................
वे सब के सब तिजोरियों के
दुभाषिये हैं।
वे वकील हैं। वैज्ञानिक हैं।
अध्यापक हैं। नेता हैं। दार्शनिक
हैं। लेखक हैं। कवि हैं। कलाकार हैं।
यानी कि--
कानून की भाषा बोलता हुआ
अपराधियों का संयुक्त परिवार है।

अगर धूमिल की बीमारी से मौत न हुई होती तो आज वे लगभग 65-70 की वय के होते । आप खुद अनुमान लगा सकते हैं कि इस अवधि में क्या-क्या रचते !

मेरे सामने वही चिर-परिचित अंधकार है
संशय की अनिश्चयग्रस्त ठंढी मुद्राएं हैं
हर तरफ़
शब्दभेदी सन्नाटा है।
दरिद्र की व्यथा की तरह
उचाट और कुंथता हुआ। घृणा में
डूबा हुआ सारा का सारा देश
पहले की ही तरह आज भी
मेरा कारागार है।

फ़िर भी धूमिल ने जितना लिखा, वह आज के बडे-बडे कवियों पर भारी है। प्रख्यात मार्क्सवादी समीक्षक नामवर सिंह जी ने उनके व्यक्तित्व को मांजा, महान लोककवि त्रिलोचन जी उनमें भाषिक समझदारी पैदा की, मित्र-गद्यकार काशीनाथ सिंह जी ने उन्हें काव्य के नये अंतरिक्षों से जोडा और दिग्गज समकालीन साहित्य-चिंतक हजारी प्रसाद द्विवेदी जी और प. विद्यानिवास मिश्र जी ने धूमिल में नये काव्य- मूल्यों को आत्मसात कराने में परोक्ष भूमिका निभाई। संभवत: इन्हीं दमदार पृष्ठभूमि के कारण उनकी कविताएं युगबोध की सत्यान्वेषी कविताएं बन पायीं, और वे एक युगांतरकारी कवि, जिसका कद नाज़िम, नेरुदा और ब्रेख्त जैसे बाहरी साहित्यकारों से कम नहीं है। ऐसा कवि धरती पर कभी-कभी ही जन्म लेता है ।

 

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