मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 

कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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शब्द अक्षरों के बीच गिरा उस आम आदमी की आवाज हो सकती है, जिसे चकाचौंध भरी दुनिया ने चुप कर दिया है, आज हम वही सुन पा रहे हैं जो प्रायोजित होता है, हम वहीं करते हैं, जो हमसे करवाया जाता है और वहीं सुनते हैं जो हमे सुनाया जाता है। जब से हमने शब्दों की टंकार को जेहन में घुसने से रोका है तब से शब्द कविता बनने से इंकार करने लगे हैं। और जब से हम कविता से दूर जा रहे हैं, हम जीना भूलते जा रहे हैं, एक आत्मालोचना की जरूरत आवश्यक होती जा रही है। कविता और उसकी उपयोगिता, समकालीनता आदि को लेकर कई सवाल हैं .....
रति सक्सेना
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मेरा बाप नंगा था
मैने अपने कपड़े उतार उसे दे दिए
जमीन भी नंगी थी/ मैंने उसे
अपने मकान से दाग दिया...
मौसम चाँद लिए फिर रहा था
मैंने मौसम को दाग देकर चाँद को आजाद किया
सारा शगुफ्ता
*
न मैं हँसी, न मैं रोयी
बीच चौराहे जा खड़ी होई
न मैं रूठी, न मैं मानी
अपनी चुप से बाँधी फाँसी
ये धागा कैसा मैंने काता...
गगन गिल
*
दर्शन और तृष्णा
छुअन का गणित हैं
मटमैली , काली,
जहाँ भी देखूँ
अनन्तता,
पारदर्शी, सुथरे
इन्द्रधनुष
लेकिन वहाँ भी संगीत हमेशा
सुबह की कसमें
वापिस लौटती हैं...
वार्ड अबेल

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कविता का स्वरुप ही सत्य की खोज और उसकी प्रतिष्ठा से बनता है। वह मनुष्य के जीवन और प्रकृति के भावपूर्ण संसार का लेखा-जोखा रखती है। संवेदनाओं के जगत का अगर कहीं सही हिसाब है तो कविताओं के यहां! वह लोक-हृदय का सही पता बतलाती है। "कविता और साहित्य जिस भूमि पर काम करते है, वह जीवन के भावनात्मक सत्य के कोमल,कठोर, उर्वर, उदार और व्यापक पहलुओं से बनती है। हमारा यह संबंध और संघर्षमय संसार मनोंभावों और मनोविकारों की क्रिया-प्रतिक्रियाओं से ही अपना रुप ग्रहण करता है जिसमें कविता का हस्तक्षेप सत्य के स्तर पर होता है। वह राजसी और तामसी मनोभावों से टकराती हुई सात्विकता का निर्देश करती है।
सुशील कुमार
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शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो
क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज़ है या
मिट्टी में गिरे हुए खून
का रंग।

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
घोडे से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।
*
वे घर की दीवारों पर नारे
लिख रहे थे
मैंने अपनी दीवारें जेब में रख लीं

उन्होंने मेरी पीठ पर नारा लिख दिया
मैंने अपनी पीठ कुर्सी को दे दी
और अब पेट की बारी थी
मै खूश था कि मुझे मंदाग्नि की बीमारी थी
और यह पेट है
धूमिल

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सविभ्रमसस्मित नयन बंकिम मनोहर जब चलातीं
प्रिय कटाक्षों से विलासिनी रूप प्रतिमा गढ़ जगातीं
प्रवासी उर में मदन का नवल संदीपन जगा कर
रात शशि के चारु भूषण से हृदय जैसे भूला कर

प्रिये आया ग्रीष्म खरतर!

तीव्र जलती है तृषा अब भीम विक्रम और उद्यम
भूल अपना, श्वास लेता बार बार विश्राम शमदम
खोल मुख निज जीभ लटका अग्रकेसरचलित केशरि
पास के गज भी न उठ कर मारता है अब मृगेश्वर

प्रिये आया ग्रीष्म खरतर!

ऋतु संहार
कालिदास
(पिछले अंक से आगे)
अनुदितः रांगेय राघव

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VOL - III/ PART IX

(फरवरी 2008 )

संपादक :  रति सक्सेना


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