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रात
जाने लगी तो आसमान बोला..शुभयात्रा
उसके शब्द सुनहरे रंगों में बदल गए,
तने ने मुस्कुरा कर सावन से पूछा.. कैसे हो?
लाल पीले शब्द फूल बन कर खिल उठे
फूलों ने मुँह खोला ही था कि शब्द खुशबू बन फैल गए
शब्द रंग, शब्द खुशबू, शब्द केनवास, शब्द शब्द, कुछ और भी है
शब्दों के अलावा?
शब्द मन, शब्द ब्रह्म, शब्द ब्रह्माण्ड, लेकिन ये शब्द कभी घुँघरू
की तरह घनघनाते हैं तो कभी एक दम चुप्पी साध लेते हैं। शब्द कहाँ
घोड़े जैसे टटकारते हैं और कहाँ शंख से शान्त बैठ जाते हैं,मालूम ही
नहीं पड़ता। कभी जख्म से खून की तरह गिरतें हैं तो कभी जंजीर बन
जिन्दगी से लिपट जाते हैं
लेकिन उनकी चुप्पी में भी जान होती है, क्यों कि अर्थ होता है ना
उनके पास.. जब अर्थ शब्द का साथ छोड़ देता है तो शब्द शोर बन जाते
हैं....या फिर निशब्द...नहीं निशब्दता में भी तो अर्थ होता है, तो
बस शोर ही है जो शब्द और अर्थ को निर्जीव बना देता है।
आज जो शब्द हमारे पास हैं वे अर्थ के सहयोगी हैं या शोर के साथी?
इस शोर का सामना करने की ताकत किसमें है, निश्चय ही ऐसे शब्दों में
जो कूँची से रंग बन कर झड़ते हैं, साजों से संगीत बन बहते हैं और
कागज पर कविता बन उतर पड़ते हैं। शोरगुल की इस दुनिया में कविता
क्या है? कवि धूमिल के शब्दों में कहा जाए तो -
शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो
क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज़ है या
मिट्टी में गिरे हुए खू़न
का रंग ।
लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है ।
शब्द अक्षरों के बीच गिरा उस आम आदमी की आवाज हो सकती है, जिसे
चकाचौंध भरी दुनिया ने चुप कर दिया है, आज हम वही सुन पा रहे हैं
जो प्रायोजित होता है, हम वहीं करते हैं, जो हमसे करवाया जाता है
और वहीं सुनते हैं जो हमे सुनाया जाता है। जब से हमने शब्दों की
टंकार को जेहन में घुसने से रोका है तब से शब्द कविता बनने से
इंकार करने लगे हैं।
और जब से हम कविता से दूर जा रहे हैं, हम जीना भूलते जा रहे हैं,
एक आत्मालोचना की जरूरत आवश्यक होती जा रही है। कविता और उसकी
उपयोगिता, समकालीनता आदि को लेकर कई सवाल हैं हमारे सामने, इन्हीं
सवालों को पर्त दर पर्त खोल रहे है सुशील कुमार, जो इसी अंक से
कृत्या के साथ जुड़े है। साथ ही समकालीन कविता के संकट और उसके
काव्य तत्त्व पर भी बात कर रहे हैं।वे एक अच्छे कवि व आलोचक तथा
जीवट व्यक्तित्व के स्वामी है। (पूरा परिचय देखें-हमसे मिलिए
लिंक में)कृत्या के इस अंक से सुशील कुमार कविता के बारे में अनेक
सवालों को उठाएंगे, पाठकों से निवेदन है कि वे भी बहस का हिस्सा
बने।

शब्दों का जो प्रयोग कवि धूमिल ने किया वह न केवल कविता को अर्थ
देता है, बल्कि आम आदमी की आवाज को नगाड़े सी टटकार देता है। यही
कविता है, और यही शब्द का सही प्रयोग। यही कारण है कि हम इस अंक
में प्रिय कवि के रूप में धूमिल की कविता को ले कर आए हैं, जिसकी
प्रस्तुति भी सुशील कुमार ने की है।
कविता की विविधता इस अंक में भी देखने को मिलेगी। पुरानी कविता के
रूप में हम अगले कुछ अंको तक ऋतु संहार के रांगेय राघव द्वारा किए
खूबसूरत अनुवाद का आनन्द लेंगे।
इस अंक में हमने अपने देश के प्रसिद्ध कलाकार राजा रवि वर्मा के
चित्रों को लिया है जो आज भी बोलते से प्रतीत होते हैं।
मित्रों! कृत्या अपना तीसरा वर्ष समाप्त कर रही है, आशा है आप लोग
इसके स्तर को ऊपर उठाने में सहायता करेंगे।
शुभकामना सहित-
रति सक्सेना
आगामी विश्व काव्योत्सव के लिए जानकारी प्राप्त करें:-
Kritya2008
बहस
के आगेः-
नवम्बर के अंक में जो बहस चलाई थी, उसकी प्रतिक्रिया में एक पत्र प्रभा
मजूमदार का-
इसमें कोई शक नही
है की आम आदमी की समस्याओ, सरोकारों एवं सम्वेदनाओं से गहरे जुड़े
होने के बावजूद कविता आम आदमी से बहुत दूर है. मगर कविता ही नही
साहित्य, कला या शिक्षा से जुड़े वे तमाम विषय, जो विशुद्ध
अभिव्यक्ति ज्ञान की तलाश मे समय और ऊर्जा की मांग तो करते है, मगर
बदले मे किसी तत्काल लाभ की आशा नही दिलाते. कला ही क्यों, शुद्ध
विज्ञान के विषय, इंजीनियरिंग की मांग के चलते हाशिए पर चले गए है।
सात दिन में अंग्रेजी / कम्प्यूटर या सफलता के गुर सिखाने या
इनस्टैंट निर्वाण दिलाने/ आत्म शांति की आश्वास्ति वाले पैकेज के
दौर में वही कविता लोकप्रिय या हिट हो सकती है जो मानव जीवन की
गुत्थियों/ जटिलताओं को किसी बम्बईया फार्मूले की तरह मनोरंजक बना
कर हल निकालें।
बदलती प्राथमिकताओ के चलते हर मोर्चे पर सफलता के परचम लहराने मे
व्यस्त पढ़ा- लिखा प्रबुद्ध वर्ग हो या अभावों से
जूझता मेहनतकश वर्ग थोड़ी सी फुर्सत पाते ही कुछ ऐसा चाहता है जो
तुरंत हल्का और तनाव रहित कर दे।
बाजार ''ऐसा कुछ ''
बडी तत्परता से उपलब्ध कराता भी है. सच तो यह है की कविता के
सरोकार, सन्दर्भ एवम विमर्श अब बहुत व्यापक हो गये है. अलग- अलग
कार्यक्षेत्रों और अनुभवों को लिये रचनाकरो ने कई पुरानी
वर्जनाओं,सीमाओं एवं मान्यताओं
को तोड़ा है. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, अर्थनीति और पर्यावरण से लेकर
रोटी और छप्पर के लिये संघर्ष भी उतने ही मुखर हुए है।शब्दों कि
लफ्फाजी वाले आरोप अधिकतर रचनाओं के लिये ठीक नही बैठते। जाहिर है
कि कोई भी लगाव/ जुड़ाव या सम्वाद दोहरी प्रक्रिया है। अगर आम आदमी
से जुड़ी कशमकश, सुगबुगाहट और अंतरद्वन्द्वों को वर्णित करती
कविताएं इतनी जटिल है तो वही व्यक्ति शेयर बाजार, इनकम टैक्स,
इंवेस्टमेंट जैसी दुरुह बातें कैसे समझ लेता है. कुछ भी पढने के
लिये समय की कमी का रोना रोने वाला वही इंसान घंटो टी वी या
कम्प्यूटर पर कैसे बैठे रहता है? यह आरोप नही सच्चाई है कि पुस्तक
की बढ़ी कीमत की बात करने वालों को अपने और खर्चो मे कमी करने की
जरूरत नही अनुभव होती।
मैं रचनाकार को उसके दायित्व से मुक्त नही कर
रही हूँ, पर पाठकीयता के अभाव को सही परिपेक्ष्य मे समझना होगा।
स्कूल,होमवर्क,ट्यूशन, प्रतियोगिता परीक्षा के कितने सारे
चक्र
व्यूहों को भेद कर आज हमारे बच्चे इस मनस्थिति मे होते है की
उन्हे टीवी, मोबाइल, कम्प्यूटर गेम जैसी चीजे ही आकर्षित करती है।
कितने माता-पिता उन्हे सोचने/ समझने/ पढने/ अभिव्यक्ति की महत्ता से
परिचित कराते है, इंसान और रोबोट मे अंतर बताते है।
कवि विदूषक नही है न ही उसके पास कोई रेडीमेड फार्मूला है. यह अपने
भीतर की यात्रा है बाहर के समस्त परिवेश के साथ. कविता तो आम/ खास/
पढने/ न पढने वाले सभी के लिये है।
शुभकामनाएं
प्रभा मुजुमदार
पत्र-संपादक
के नाम
KRITYA2007
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