कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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वार्ड अबेल की कविता ( L.Ward Abel)

प्यानों

दर्शन और तृष्णा
छुअन का गणित हैं
मटमैली , काली,
जहाँ भी देखूँ
अनन्तता,
पारदर्शी, सुथरे
इन्द्रधनुष
लेकिन वहाँ भी संगीत हमेशा
सुबह की कसमें
वापिस लौटती हैं
अपने स्थान पर
झूमती नदियाँ
कभी भी समतल नहीं
हमेशा नीचे की ओर
किसी दिशा की ओर
हमेशा
मौसम के रंग
संध्या को चित्र विचित्र करते

वह सभी पर्दे
उतार देती है
रोशनी जल जाती हैं
वह नग्न चलती है

मुझे बेहद पसंद है प्यानों

(वार्ड एबेल की अन्य कविताएँ)




लिसा जरन की कविता (Lisa Zaran)

तो
हम सीख
रहे हैं,
सीखते
जा रहे
हैं
बर्फ की
कड़ी सतह पर
स्केटिंग
करना
जब कि कोई
चान्द पर से
चिल्ला रहा है
हम प्यार में
पड़ रहे हैं
पर उससे नहीं
किसी और से
जिस का
सब्र मजबूत है
जिसका गुस्सा
पहाड़ सा नहीं है
शेर, अनजानी जगहों
पर जा रहे हैं
तो, हम सीख रहे हैं
प्यार करना
किसी और से
उससे नहीं
उस आदमी के
दिल नहीं
उस आदमी की
आत्मा नहीं

(लिसा जरन की अन्य कविताएँ)
 

गगन गिल की कविता


न मैं हँसी, न मैं रोयी

न मैं हँसी, न मैं रोयी
बीच चौराहे जा खड़ी होई

न मैं रूठी, न मैं मानी
अपनी चुप से बाँधी फाँसी

             ये धागा कैसा मैंने काता
             न इसने बाँधा न इसने उड़ाया

             ये सुई कैसी मैंने चुभोई
             न इसने सिली न उधेड़ी

             ये करवट कैसी मैंने ली
             साँस रुकी अब रुकी

             ये मैंने कैसी सीवन छेड़ी
             आँतें खुल खुल बाहर आई

             जब न लिखा गया न बूझा
             टंगड़ी दे खुद को क्यों दबोचा

             ये दुख कैसा मैने पाला
             इसमें अँधेरा न उजाला


(गगन गिल की अन्य कविताएँ)



सारा शगुफ्ता की कविता

कर्ज

मेरा बाप नंगा था
मैने अपने कपड़े उतार उसे दे दिए
जमीन भी नंगी थी/ मैंने उसे
अपने मकान से दाग दिया
सर्म भी नंगी थी मैंने उसे अपनी आँखे दीं
प्यास को लम्स* दिए
और होंठ को क्यारी में
जाने वाले को बो दिया
मौसम चाँद लिए फिर रहा था
मैंने मौसम को दाग देकर चाँद को आजाद किया
चिता के धुँए से मैंने इनंसान बनाया
और उसके सामने अपना मन रखा
उसका लफज जो उसने अपनी पैदाइश पर चुना
और बोला!
मैं तेरी कोख में एक हैरत देखता हूँ

मेरे बदन से आग दूर हुई
तो मैंने अपने गुबाह ताप लिए
मैं माँ बनने के बाद भी कुँवारी हुई
और मेरी माँ भी कुँवारी हुई
अब तुम कुँवारी माँ की हैरत हो
मैं चिता पर सारे मौसम जला दालूँगी
मैंने तुझमें रूह फूकी
मैं तेरे मौसमों में चुटकियाँ बजाने वाली हूँ
मिट्टी क्या सोवेगी
मिट्टी छाँव सोचेगी,और हम मिट्टी को सोचेंगे
तेरा इनकार मुझे जिन्दगी देता है

हम पेड़ों के अजब सहें
या दुःखों के फटे कपड़े पहनें


(सारा शगुफ्ता की अन्य कविता)



जीतेन्द्र श्रीवास्तब की कविता

उम्मीद भर

मैं खुश हूँ!
लान की दूब पर
बरस गए बादल
मैं खुश हूँ

मैं खुश हूँ!
फूलों की जड़ों तक पहुँच गई नमी
मैं खुश हूँ

मैं खुश हूँ!
किचन गार्डन में लगे सब्जियों के पौधे
अब हरियरा जाएंगे
मैं खुश हूँ

मैं खुश हूँ!
मेरी छोटी सी बेटी
अपनी नन्ही सी अंजुरी में
भर रही है कुछ बून्दें
मिला रही है उसमें रंग
मैं खुश हूँ

मैं खुश हूँ!
कि इस बारिश से तलिक खुश हुए होंगे
पसीने, कर्ज और पस्ती में डूबे
मेरे देश के किसान

मैं खुश हूँ!
बहुत बहुत खुश
ओ बादलों! थोड़ा झुको
मैं छूकर धन्यवाद कहना चाहता हूँ तुम्हें!

देखो उड़ना नहीं
उम्मीद भर बरसना
आखिर यह जीवन का सवाल है!

(जीतेन्द्र श्रीवास्तब की अन्य कविताएँ)


सुशील कुमार की लम्बी कविता

जनतंत्र एक डैश है

सफ़हे पे दर्ज
दो ईस्वीसनों के बीच छोटी लकीर की तरह
पर आंख से एकदम ओझल
यह जनतंत्र
जन और तंत्र के बीच का
सिर्फ़ एक डैश ( - ) है 
(जो समझो, उसके पहिये की कील है)
जिसे जनगण ने उस आदमीनुमा जंतु के हवाले कर दिया है
जो सियार और सांप के हाईब्रीड से
इंसानी मादा की कोख का इस्तेमाल कर पैदा हुआ है
और घुमा रहा है जनतंत्र का पहिया
लगातार उल्टा-पुल्टा, आगे के बजाय पीछे
पर भूख की जगह भाषा पर छिड़ी बहस में जुटे लोग
डैने ताने अपने को फुलाये बैठे हैं कि
उनका लोकतंत्र सरपट दौड़ रहा है
गंतव्य की ओर।


(
सुशील कुमार की कविता आगे)

 


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