गगन गिल की कविता


गगन गिल चर्चित कवयित्री हैं, हाल में ही उन्होंने कुछ नई तरह की कविताएँ लिखी हैं जिनमे माडर्न आर्ट की तरह अस्पष्ट स्पष्टता है। कविता के बारे में कहने की जगह इन्हे महसूस करना जरूरी है, जो एक विचित्र तरह की बैचेनी दिखा रहीं हैं। यह कविताएँ कवि की पुस्ताक "दिल थपक थपक" से साभार लीं गईं हैं।

निचुड़ा- निचुड़ा

निचुड़ा- निचुड़ा
दिल था
री माँ!

मैला- मैला
डर था
री माँ!

माथा टकता
काग था
री माँ

नीला हो गया
साँस था
री माँ!

             सूंघा सोती को
             नाग ने
             री माँ!

             ले गया
             वो मेरा श्वास था
             री माँ

              अटक गया
              मेरा प्राण था
              री माँ!
 

 जलता- जलता
 जहर था
 री माँ!

ऐंठ मुड़ी
मेरी आँत थी
री माँ!

जड़ उखड़ गया
मेरा मन था
री माँ!

कुचला गया
जो एक साँप था
री माँ!

जल गगन मगन

जल गगन मगन
दुख नगन नगन
आँख जलन जलन
नींद चलन चलन

तारे भगन भगन
सपने अगन अगन
विष जलन जलन
पीर चलन चलन

पांव थकन थकन
प्यास जगन बुझन
हिचकी भरन भरन
माया हिरन हिरन
 


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ