जीतेन्द्र श्रीवास्तब


जीतेन्द्र श्रीवास्तब समकालीन युवा कवियों में प्रमुख स्थान रखते हैं। उनकी कविता जीवन की छोटी छोटी चीजों, क्षणों और भावों से इस तरह से जुड़ीं हैं कि बेहद सामान्य सा दिखने वाला बेहद आत्मीय प्रतीत होने लगता है। वे फिलहाल "इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय" से इग्नु से जुड़े हैं।

कृतज्ञता

मेरे लान में
उगा है धतूरा
धतूरे में खिल गए हैं फूल

एक फूल तोड़ता हूँ झुककर
एक स्मृति उतर आती है पलकों से

मैं खुश होता हूँ अपने पर
कि अभी तक भूला नहीं
धतूरा, रेंड़ और बेहया

वैसे इनकों याद रखना
अनिवार्यता नहीं है मेरे जीवन की
पर क्या करूँ अपनी भावुकता का
कहाँ फैंक आऊँ
किस नदी पर
किस पहाड़ पर

मैं कैसे झुठला दूँ इस सच को
कि जब से दिखा है धतूरे का फूल
मुझे याद आ रहे हैं
वे संगी -साथी बचपन के
जिनमें से कुछ तिनसुखिया गए कुछ कलकत्ता
कुछ बम्बई गए कुछ लुधियाना
कुछ लोटे ही नहीं
रोजी ने लील लिया उन्हें

बचपन में हम लोग
लोकाते थे धतूरे का फल
हम लोगों को लोका दिया रोजी रोटी ने

वर्षों बाद
आज मैं छू रहा हूँ धतूरे का फूल
तो छू रहा हूँ अपने दोस्तों को
छू रहा हूँ उनकी हँसी उनके विश्वास को
देख रहा हूँ पीछे मुड़कर
कि हमारे बचपन चाहे कितने ालग रहे हो
पर उनमें कहीं ना कहीं जरूर था धतूरा

धतूरे ने मिटाई थीं
हमारे बीच की दूरिया
इसलिए चाहे किसी को अजीब लगे
चाहे सनकीपन
लेकिन आज मैं झुक रहा हूँ
धतूरे के आगे
अपनी पूरी श्रद्धा
और भावुकता के साथ।

पूस

एक

पड़ रही है कड़ाके की ठण्ड
काँप रहा है हाड़- हाड़
अपने ही मलमूत्र के बीच
काँप रहे हैं गोरू

जिधर देखिए गठरी बने लोग
ताप रहे हैं कौड़ा

अबकी खिचड़ी का स्वाद ले गयीं शीतलहर
गाँठ के पैसे गए दवा- दारू में
और भी जाने हुआ क्या-‍क्या!

दो

दाँत किटकिटाते कहता है लोकई
बाँधों गाँती
बाँधों मफलर
घुसी हवा जो कान में
निकल जाओगे जहान से!
 


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