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दिनकर जी के जन्म-शती-वर्ष पर विशेष
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द्वंद्व और संघर्ष के कवि :दिनकर
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--प्रस्तुति : सुशील कुमार


हिन्दी साहित्य में रामधारी सिंह 'दिनकर' का प्रादुर्भाव तब हुआ,जब छायावाद ढलान पर था।बीसवीं सदी का तीसरा दशक,सन्1928-29 का समय। पराधीन देश को जीवन,जागरण,प्रेरणा और अदम्य संघर्ष-शक्ति की जरुरत थी। लिहाजा साहित्य में यह् काल सुकोमल,अमुर्त्तन या वायवीय विषय-वस्तुऒं पर रचना का नहीं,स्वाधीनता का भाव जगाने वाली;पराधीनता,शोषण-उत्पीड़न और उपनिवेशवाद के विरोध में मुखर होकर अपनी बात कहने वाली रचना का था। पर यह सब इतना आसान नहीं था।वैचारिक सूत्रों को व्यक्त करने वाली भाषा-शैली भी चाहिए थी और दिल में गुलामी से लड़ने की आग,तभी मुक्ति के स्वर का बिगुल फूंकना संभव था।
सामने की दुनिया से असंतुष्ट होकर अधिकांश कवि रोमांसवाद की पलायनवादी प्रेरणाओं से एकात्म हो रहे थे।या तो वे गुलामी की दुर्दिन से दुखी होकर अंतर्मुखी हो जाना चाहते थे या फ़िर सृजन-सुख की खोज में मुर्दा इतिहास में वापस लौट आना चाहते थे। इस कठिन समय में आधुनिक हिंदी कविता को एक ऐसे कवि की जरुरत थी जो ओजमयी ऋजु भाषा-शिल्प में जन-जण के मन को मथकर उनमें स्वतंत्रता के भाव भर सके,जिसका श्रेय मुख्य रुप से कवि दिनकर को जाता है जिनकी सशक्त लेखनी ने अपनी तेजोमय आह्वान-शक्ति से जनता को ललकार कर विद्रोही स्वर में पराधीन भारत की मुक्ति के गीत गाये।आजा़द भारत में 26जनवरी,1950 के लिये लिखे गये उनकी कविता 'जनतंत्र का जन्म' में भी उनका वही तेवर है जो जनपदीय भारत के आज के परिप्रेक्ष्य भी अत्यंत प्रासंगिक है,आइए, इस कविता को पढ़कर समकालीन कविता के बीज के रुप में उनके प्रगतिशील विचार की सच्चाई को गुनने की कोशिश करें-
जनतंत्र का जन्म
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(26जनवरी,1950ई.)
सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खा़ली करो कि जनता आती है।

जनता?हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाडे-पाले की कसक सदा सहनेवाली,
जब अंग-अंग में लगे सांप हो चुस रहे
तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।
जनता?हां,लंबी - बडी जीभ की वही कसम,
"जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है।"
"सो ठीक,मगर,आखिर,इस पर जनमत क्या है?"
'है प्रश्न गुढ़,जनता इस पर क्या कहती है?"
मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं,
जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में;
अथवा कोई दूधमुंही जिसे बहलाने के
जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में।
लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?
वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है।
अब्दों,शताब्दियों,सहस्त्राब्द का अंधकार
बीता;गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं;
यह और नहीं कोई,जनता के स्वप्न अजय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं।
सब से विराट जनतंत्र जगत का आ पहुंचा,
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तय करो
अभिषेक आज राजा का नहीं,प्रजा का है,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।

आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख,
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।
फावडे़ और हल राजदण्ड बनने को हैं,
धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खा़ली करो कि जनता आती है।
दिनकर की कविताऒं में कहीं भावनाओं के उदग्र स्वर,तो कहीं भावप्रवण,स्निग्ध और कोमल धारा को देखकर कुछ लोगों को दिनकर के छायावाद और प्रगतिवाद के बीच की कडी होने का भरम होता है।परंतु सच्चाई यह है कि दिनकर साहित्य में किसी वाद-विशेष को लेकर कभी चले नहीं।आजीवन अपनी अनुभूति के प्रबल आवेग को स्वच्छंद अभिव्यक्ति प्रदान करने का प्रयास किया।
इनकी कविताओं में एक ओर प्रेमजनित भावपूर्ण अनुभूतियों का गहरा वेग है तो दूसरी ओर दासता से मुक्ति का विद्रोही स्वर और सामाजिक कुरीतियों-विषमताओं के विरोध का कडा़ तेवर।दोनों ही दिनकर के काव्य की उपलब्धियां मानी गयी हैं क्योंकि राष्ट्रीय-सामाजिक धारा ने उन्हें राष्ट्रकवि का दर्जा दिलाया तो सौम्य-गंभीर चिंतन,भावात्मक प्रकृति और गीतात्मक भाषा-शिल्प से नि:सृत व्यैक्तिक भावधारा ने ज्ञानपीठ के सम्मान से नवाजा।देखने वाली बात यह है कि उनके काव्य में उपर्युक्त दोनों विपरीत ध्रुवों की प्रवृतियां बारंबार दृष्टिगोचर हुईं हैं जिस कारण उनका काव्य-जीवन आदि से अंत तक द्वंद्वों से जूझते रहने की मनोहारी कथा है।इस सहज,किंतु दुर्लभ प्रकृति के कारण उनके काव्य को 'दहकते अंगारों पर इन्द्रधनुषों की क्रीडा़' कहा गया।तभी तो उन्होंने कवि को'शोक की संतान' कहकर एक कविता लिखी-
शोक की संतान
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हृदय छोटा हो,
तो शोक वहां नहीं समाएगा।
और दर्द दस्तक दिये बिना
दरवाजे से लौट जाएगा।
टीस उसे उठती है,
        जिसका भाग्य खुलता है।
वेदना गोद में उठाकर
         सबको निहाल नहीं करती,
जिसका पुण्य प्रबल होता है,
          वह अपने आसुओं से धुलता है।
तुम तो नदी की धारा के साथ
           दौड़ रहे हो।
उस सुख को कैसे समझोगे,
           जो हमें नदी को देखकर मिलता है।
और वह फूल
            तुम्हें कैसे दिखाई देगा,
जो हमारी झिलमिल
             अंधियाली में खिलता है?
हम तुम्हारे लिये महल बनाते हैं
             तुम हमारी कुटिया को
               देखकर जलते हो।
युगों से हमारा तुम्हारा
             यही संबंध रहा है।
हम रास्ते में फूल बिछाते हैं
              तुम उन्हें मसलते हुए चलते हो।
दुनिया में चाहे जो भी निजाम आए,
तुम पानी की बाढ़ में से
             सुखों को छान लोगे।
चाहे हिटलर ही
              आसन पर क्यों न बैठ जाए,
तुम उसे अपना आराध्य
              मान लोगे।
मगर हम?
तुम जी रहे हो,
हम जीने की इच्छा को तोल रहे हैं।
आयु तेजी से भागी जाती है
और हम अंधेरे में
            जीवन का अर्थ टटोल रहे हैं।
असल में हम कवि नहीं,
            शोक की संतान हैं।
हम गीत नहीं बनाते,
            पंक्तियों में वेदना के
                 शिशुओं को जनते हैं।
झरने का कलकल,
पत्तों का मर्मर
और फूलों की गुपचुप आवाज़,
              ये गरीब की आह से बनते हैं।
 द्वंद्व दिनकर के काव्य-जीवन के पग-पग में घटित है,लक्षित है,या कहें कि उनकी भावना और चिंतन का कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं है।यह द्वंद्व ही रचना में भावों का गुंफन पैदा करता है,विषय-वस्तु के प्रत्येक क्षेत्र में भरमाता है और बेचैन करता है।दिनकर का कवि इस गंभीर संकट से जूझता है,उबरता है जिसमें उनकी काव्य-साधना द्वंद्व की चुनौतियों को स्वीकार करती हुई समाधान का पथ भी प्रस्तुत करती है।
 'कुरुक्षेत्र'(1946) एक सर्वाधिक समर्थ अभिव्यक्ति है द्वंद्व की,जो युद्ध और शांति,हिंसा और अहिंसा,प्रवृति और निवृति की जीवन-शैली तथा विज्ञान और आत्मज्ञान की परिणति में निहित है।उसके पूर्व'द्वंद्वगीत'(1940) तो नाम से ही स्पष्ट है।'उर्वशी'(1961) तो अप्सरा और लक्ष्मी,संशययुक्त मानव और संशयरहित देवता एवं काम और अध्यात्म के द्वंद्वों की गाथा है।
 वैसे तो स्वच्छंदतावादी कवियों के यहां स्वातंत्र्य भावना को लेकर संघर्ष साहित्य का एक प्रमुख तत्त्व रहा है किंतु दिनकर के काव्य में इसका फैलाव राजनीतिक,धार्मिक,वैयक्तिक,साहित्यिक यानी हर स्तर पर नगाडे़ की तरह बजते हुए देखा-सुना-अनुभव किया जा सकता है।स्वतंत्रता के लिये संघर्ष का इतना व्यापक परिप्रेक्ष्य ही उनके काव्य की रचनाधर्मिता को राष्ट्रधर्मिता से बहुलांश तक जोड़ देता है जो तत्कालीन अन्य कवियों के यहां नहीं।नीचे कुछ उदाहरणों से यह स्वमेव स्पष्ट हो जायेगा-
1)राजनीतिक स्वतंत्रता-
सावधान, जन्मभूमि किसी का चारागाह नहीं है,
घास यहां की पहुंच पेट में कांटा बन जाता है।
                            -नीम के पत्ते
2)शोषण से स्वतंत्रता-
वे भी यहीं दूध से जो अपने श्वानों को नहलाते हैं,
ये बच्चे भी यहीं,कब्र में दूध-दूध जो चिल्लाते हैं।
                                  -हुंकार
3)वर्ण और जाति से स्वतंत्रता-
अनाचार की तीव्र आंच में अपमानित अकुलाते हैं,
जागो बोधिसत्त्व भारत के हरिजन तुम्हें बुलाते हैं,
जागो विप्लव के वाक्, दंभियों के इन अत्याचारों से,
जागो हे, जागो तप निधान!दलितों के हाहाकारों से।
                                -रेणुका
4)स्त्री-मुक्ति-
भागी थी तुझको छोड़ कभी जिस भय से,
फ़िर कभी न हेरा तुझको जिस संशय से
उस जड़ समाज के सिर पर कदम धरुंगी,
डर चुकी बहुत, अब और न अधिक डरुंगी।
                           -रश्मिरथी
5)वैयक्तिक स्व्तंत्रता-
भय से मुक्ति न मिली,मुक्ति का मोल रहा क्या?
अभय कौन, नर को ही नर से त्रास अगर।
                           -नीलकुसुम
6)धार्मिक स्वतंत्रता-
आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख,
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में खलिहानों में।
                         -नीलकुसुम
7)भाग्यवादी विचारों से मुक्ति-
महाराज उद्दम से विघि का अंक उलट जाता है,
किस्मत का पासा, पौरुष से हार पलट जाता है।
                                -रश्मिरथी
दिनकर जीवन में ही नहीं,साहित्य में भी स्वतंत्रता के पक्षधर थे।उन्होंने साहित्य के आभिजात्य से मुक्ति के लिये काव्य के साधना-पक्ष अर्थात शिल्प के कठोर नियमों के प्रति विद्रोह किया और सायास छंद-योजना की जगह भावानुकूल छंद की योजना को तरजीह दी।उनका विचार था कि नये छंदों से नयी भाव-दशा पकडी़ जाती है जिससे कविता को नयी आयु प्राप्त होती है।हिन्दी साहित्य की इस कलात्मक आजादी के संबंध में दिनकर जी कहना है कि'शुद्ध कलावादियों की भाषा में कहना चाहें तो कह सकते हैं कि रीति काल के बाद की हिन्दी कविता कला की पराजय और जीवन की विजय की कविता थी।'अत: इनके काव्य के कलेवर को प्राचीन शास्त्रीय नियमों से आबद्ध नहीं किया जा सकता।उनके काव्य में भाषागत लोच और रुप- योजना इसलिए परंपरा-समर्थित न होकर विषयानुकूल और सहज है। भावानुकूल सहज छंद का एक उदाहरण यहां भी देखें-
कविता सबसे बडा तो नहीं
          फ़िर भी अच्छा वरदान है।
मगर मालिक की अजब शान है।
जिसे भी यह वरदान मिलता है,
            उसे जीवनभर पहाड़ ढोना पड़ता है।
एक नेमत के बदले
अनेक नेमतों से हाथ धोना पड़ता है!
                     -कविता,'नेमत'से
सरसरी नज़र से देखने पर भी साफ़ है कि दिनकर की काव्यधारा जीवन के द्वंद्व और स्वतंत्रता के लिये संघर्ष की काव्यधारा है जो दिनकर के कवि को किसी - भी साहित्यिक वाद-विशेष में उलझाती नहीं,बल्कि साहित्य के क्लासिक बंधनों से उपर उठकर अपनी अभिव्यक्ति का मार्ग ढूंढती है जो सरल और बोधगम्य है।कविता आज छंद से छूटकर अपने लयात्मक गति और द्वंद्व के साथ जिस रुप में समय के सच को अभिव्यक्त कर रही है,उसके आंदोलन में दिनकर जी की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता ।आज की कविता रुढि़ और परंपरा से पूर्णतया मुक्त है।इसमें किसी कवि-विशेष का अवदान नहीं,बल्कि कविता को इस भावभूमि तक लाने का श्रेय अन्य कवियों के साथ ही रामधारी सिंह 'दिनकर' को भी है जिन्होंने अपने समय को तो शब्द दिये ही,आने वाले समय की कविता के लिये एक पृष्ठभूमि भी तैयार की।


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