मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 

कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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शब्द अक्षरों के बीच गिरा उस आम आदमी की आवाज हो सकती है, जिसे चकाचौंध भरी दुनिया ने चुप कर दिया है, आज हम वही सुन पा रहे हैं जो प्रायोजित होता है, हम वहीं करते हैं, जो हमसे करवाया जाता है और वहीं सुनते हैं जो हमे सुनाया जाता है। जब से हमने शब्दों की टंकार को जेहन में घुसने से रोका है तब से शब्द कविता बनने से इंकार करने लगे हैं। और जब से हम कविता से दूर जा रहे हैं, हम जीना भूलते जा रहे हैं, एक आत्मालोचना की जरूरत आवश्यक होती जा रही है। कविता और उसकी उपयोगिता, समकालीनता आदि को लेकर कई सवाल हैं .....
रति सक्सेना
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जरा सोचूँ
सोचूँ बावजूद डर के
सोचूँ बावजूद डरे हुओं के

सोचूँ
डर सिपाही में है या हमारी चोरी में
डर मृत्यु में है या जीने की लालसा में
डर डरा रहे राक्षस में है या खुद हमम
दिविक रमेश
*
तुम मुझे मिलो
तो बस यों मिलो
जैसे दरिया सागर से मिलता है

नदी बन कर मत मिलना, मिट जाओगी
फिर कैसे खोजोगी अपना अस्तित्व!
रविन्दर भट्ठल
*
वे सुन नहीं सकते
हालाँकि वे सुनना चाहते हैं
पेड़ों और हवाओं के गीत
दरियाओं का संगीत
आबी परिंदों की आवाजें
शहंशाह आलम की कविता
शहंशाह आलम

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मुक्तिबोध आगाह करते हैं कि "मनोमय तत्व के संवेदना-पुंजों को प्राप्त करना कवि का आद्य- प्राथमिक-कर्तव्य है।सच तो यह है कि सृजन- प्रक्रिया में कवि निराला जीवन जीता है।उसे उस जीवन को ईमानदारी से ,आग्रह्पूर्वक और ध्यानलीन होकर जीना चाहिए।नहीं तो बीच- बीच में सांस उखड़ जायगी,और उसके फलस्वरुप काव्य में खोंट पैदा होगी।"सृजन -प्रक्रिया के दूसरे क्षण से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण बात है उन जीवन- मूल्यों और जीवन-दृष्टियों का मनस्तत्व के साथ संगम होना।प्रश्न उठता है कि वे जीवनादर्श किसके हैं,जो कि स्वाभाविक प्रश्न है।वह सौंदर्य-प्रतिमान किस वर्ग के सौदर्याभिरुचि ने उत्पन्न किया है? उसका औचित्य, उसकी सीमाएं क्या है? आदि,आदि।
सुशील कुमार
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1)राजनीतिक स्वतंत्रता-
सावधान, जन्मभूमि किसी का चारागाह नहीं है,
घास यहां की पहुंच पेट में कांटा बन जाता है।
-नीम के पत्ते
2)शोषण से स्वतंत्रता-
वे भी यहीं दूध से जो अपने श्वानों को नहलाते हैं,
ये बच्चे भी यहीं,कब्र में दूध-दूध जो चिल्लाते हैं।
-हुंकार
3)वर्ण और जाति से स्वतंत्रता-
अनाचार की तीव्र आंच में अपमानित अकुलाते हैं,
जागो बोधिसत्त्व भारत के हरिजन तुम्हें बुलाते हैं,
जागो विप्लव के वाक्, दंभियों के इन अत्याचारों से,
जागो हे, जागो तप निधान!दलितों के हाहाकारों से।
-रेणुका
दिनकर
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सविभ्रमसस्मित नयन बंकिम मनोहर जब चलातीं
प्रिय कटाक्षों से विलासिनी रूप प्रतिमा गढ़ जगातीं
प्रवासी उर में मदन का नवल संदीपन जगा कर
रात शशि के चारु भूषण से हृदय जैसे भूला कर

प्रिये आया ग्रीष्म खरतर!

तीव्र जलती है तृषा अब भीम विक्रम और उद्यम
भूल अपना, श्वास लेता बार बार विश्राम शमदम
खोल मुख निज जीभ लटका अग्रकेसरचलित केशरि
पास के गज भी न उठ कर मारता है अब मृगेश्वर

प्रिये आया ग्रीष्म खरतर!

ऋतु संहार
कालिदास
(पिछले अंक से आगे)
अनुदितः रांगेय राघव

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VOL - III/ PART X

(मार्च 2008 )

संपादक :  रति सक्सेना


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