कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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दिविक रमेश की कविता

सोचूँ

जरा सोचूँ
सोचूँ बावजूद डर के
सोचूँ बावजूद डरे हुओं के

सोचूँ
डर सिपाही में है या हमारी चोरी में
डर मृत्यु में है या जीने की लालसा में
डर डरा रहे राक्षस में है या खुद हममें

सोचू
मरता वह है
डर हमे लगता है
गुनाह वह करता है
काँपते हम हैं

सोंचू
छूट गया डरना
तो क्या होगा डर का

सोंचू
बारिश में भीगने का डर
क्यों भागता है बारिश में भीगकर

सोंचू
क्या होता है हव्वा
जिसे न बच्चा जानता है, न हम!

सोंचू
एक कहानी में है भस्मांकुर
या विजय डर पर!

अच्छा, इना तो सोच ही लूँ
कि जब पिट्टी कर देते हैं हव्वा की
तो क्यों भाग जाता है
सचमुच
बच्चे की आँखौं से हव्वा।
बच्चा बजाता है तालियाँ।

आओ, कभी कभार बिन सोचे
मात्र भगाने की बजाय
कर दें हत्या हव्वा की
क्या हम नहीं चाहते
कि बजाता रहे तालियाँ बच्चा
लगातार..लगातार..

सोचूँ
लेकिन!

(दिविक रमेश की अन्य कविताएँ)



सुदर्शन प्रियदर्शनी की कविता

उजाले

उस दिन
बीच चौराहे पर
उजालों से
मुठभेड़ हो गई

गिले शिकवे
ताने मेंहने
पुरानी दोस्ती
के वास्ते
देते -देते
अन्ततः..

उजालों ने
हार मान ली
और आश्वासन दिया
कि पुरानी दोस्ती
के ढब...

वे कभी कभी
मेरी देहरी
पर आया करेंगे।

(सुदर्शन प्रियदर्शनी की अन्य कविताएँ)
 

अशोक गुप्ता की कविता

रेलवे स्टेशन पर

मैं कम्पार्टमेन्ट के अन्दर हूँ
एक कोहनी खिड़की पर टिकाए
तुम बाहर प्लेटफार्म पर खड़ी हो
मेरी पसन्द की नीली साड़ी पहने

लगता है मैं बारह साल का हूँ
बोर्डिंग स्कूल की ट्रेन में
डरा हुआ गले में दुखती गाँठ लिए
एक भयानक दुःस्वप्न की जकड़ में

तुम ट्रेन चलने का इंतजार कर रही हो
अपनी घड़ी दो बार देख चुकी हो
मैं नजर बचा कर आँसू पौंछता हूँ
वह तुम्हारा इंतजार कर रहा होगा

स्टेशन के बाहर
कि तुम कार में बैठो
और चैन की साँस लेकर कहो
" वह चला गया आखिरकार"

(अशोक गुप्ता की अन्य कविताएँ)


रविन्दर भट्ठल की (पंजाबी)कविता

मुझे मिलो तो....

तुम मुझे मिलो
तो बस यों मिलो
जैसे दरिया सागर से मिलता है

नदी बन कर मत मिलना, मिट जाओगी
फिर कैसे खोजोगी अपना अस्तित्व!

मैं तो एक स्वप्नभरी आँख हूँ
आओ तो सुन्दरतम सपना बन कर आना
खारे नमकीन आँसुओं में तो
शरीर पिघल जाएंगे

मैं तो एक बात हूँ, पहेली सी
हुंकार की तलाश में बैचेन बैठी
तुम जागृत आत्मा के साथ आना
आत्मा, जो राह का साथी बन, मेरे साथ चल पाए

मैं तो दहलीज हूँ
किन्हीं पवित्र पावों की प्रतीक्षा में बिछी बैठी
तुम आओ तो, सधे सुच्चे कदमों आना
मेरा पूरा बदन तुम्हारे कदम चूमेगा

अनुवाद फूलचन्द मानव

 


शहंशाह आलम की कविता

जरूरी पत्रों का खोना

कितने हिंसक होते हैं वे जरूरी पत्र
जो गुम हो जाते हैं हाथों में आने से पहले

जिस तरह जरूरी पत्रों का गुमना
कोई आश्चर्य या अद्भुत अर्थ नहीं रखता
उसी तरह हमारी यंत्रणा भी कोई मायने नहीं रखती उनके लिए

सिर्फ चन्द जरूरी पत्र ही गुम नहीं हो जाते हमारे जीवन से
कुछ दूसरी जरूरी चीजें भी गुम हो जाती हैं
बची रह जाती हैं सड़ांध पैदा करने वाली
इच्छाएँ और उत्तेजनाएँ

रोज कितनी ही विशाल योजनाएँ हमें चकाचौंध करती हैं

सरकारी फरमानों से निकल कर सारी योजनाएँ
गुम हो जाती हैँ आर्थिक संकटों के बीच

गुमने के नाम पर सिर्फ जरूरी पत्र ही नहीं गुमते
हमारे जीवन से हमारे समय से

गुम जाते हैं शब्द
गुम जाते हैं लेटरबाक्स
गुम जाते हैं पेड़
गुम जाते हैं खनिज
गुम जाते हैं पिता
गुम जाते हैं लोगबाग

जाने कितनी कितनी बार जरूरी चीजें खोईं
जाने कितनी कितनी बार जरूरी पत्र खोए।

(शहंशाह आलम की अन्य कविता)


शोभनाथ यादव की कविता

दूरियों में तुम

दूरियों में रहते हो जब तुम
हो जाता हूँ बैचेन मैं!

हो जाती है तब्दील जब
दूरियाँ नजदीकियों में
तो हो जाता हूँ मौन
बिल्कुल मौन मैं
निहारता तुम्हें
महसूसता तुम्हें सिर्फ !

( शोभनाथ यादव की अन्य कविता)


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